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भारत की अर्थव्यवस्था पर तेल, महंगाई और कमजोर मानसून का खतरा, वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षा में चेतावनी

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वित्त मंत्रालय की मई आर्थिक समीक्षा में भारत की अर्थव्यवस्था पर तेल, महंगाई और कमजोर मानसून को प्रमुख जोखिम बताया गया है। रिपोर्ट में वैश्विक झटकों के बीच घरेलू मजबूती को भी रेखांकित किया गया है।

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर वित्त मंत्रालय की ओर से जारी मई की मासिक आर्थिक समीक्षा में निकट भविष्य के लिए मिश्रित लेकिन सतर्क संकेत दिए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक आर्थिक झटकों के बावजूद देश के घरेलू आर्थिक बुनियादी ढांचे मजबूत बने हुए हैं, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों, कमजोर मानसून और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों को प्रमुख जोखिम के रूप में देखा जा रहा है।

आर्थिक मामलों के विभाग की इस समीक्षा में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी लचीलेपन की स्थिति में है, लेकिन बढ़ती लागत और बाहरी दबावों के कारण आगे चुनौतियां बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर चल रहे संघर्ष और अस्थिर परिस्थितियों ने आर्थिक माहौल को और जटिल बना दिया है।

वित्त मंत्रालय के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता भारत की आयात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम है। खासकर पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण तेल आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है, जिसका सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में महंगाई को लेकर भी स्पष्ट चेतावनी दी गई है। इसमें कहा गया है कि खुदरा और थोक महंगाई के बीच बढ़ता अंतर चिंता का विषय है। खुदरा महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित दिख रही है, लेकिन थोक महंगाई में तेज बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि उत्पादन स्तर पर लागत बढ़ रही है, जिसका असर आने वाले समय में उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई लगभग 3.48 प्रतिशत दर्ज की गई, जो भारतीय रिजर्व बैंक के लक्ष्य के भीतर है। हालांकि इसी अवधि में थोक महंगाई बढ़कर 8.3 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो अर्थव्यवस्था में लागत दबाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

वित्त मंत्रालय की समीक्षा में यह भी कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित वृद्धि तथा कमजोर मानसून की स्थिति खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। इससे ग्रामीण मांग और समग्र खपत पर असर पड़ने की संभावना है।

औद्योगिक क्षेत्र को लेकर रिपोर्ट में मिश्रित तस्वीर सामने आई है। सीमेंट, इस्पात और बिजली उत्पादन जैसे क्षेत्रों में मजबूती बनी हुई है, जो औद्योगिक गतिविधियों के लचीलेपन को दर्शाता है। हालांकि कुछ अन्य क्षेत्रों में सुस्ती के संकेत भी देखे गए हैं।

वित्त मंत्रालय ने कहा कि विदेशी निवेश के मोर्चे पर भारत ने मजबूत प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2026 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 94.5 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है, जो निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा बाजारों में किसी भी बड़े व्यवधान का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की बाधा भारत के आयात और मूल्य स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुमान के अनुसार, इस वर्ष मानसून सामान्य से थोड़ा कमजोर रह सकता है और लगभग 92 प्रतिशत दीर्घकालिक औसत वर्षा होने की संभावना है। यह स्थिति कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है और वैश्विक तेल कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत में महंगाई का नया दौर देखने को मिल सकता है। खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित मांग पर इसका सीधा असर होगा।

फिलहाल वित्त मंत्रालय ने स्थिति को “लचीला लेकिन सतर्क” बताया है। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था मजबूत आधार पर खड़ी है, लेकिन बाहरी और आंतरिक जोखिमों पर लगातार निगरानी जरूरी है।

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