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Mumbai News: 102 साल पुराना बॉम्बे हाउस क्यों है खास? टाटा समूह के बड़े फैसलों से लेकर आवारा कुत्तों के लिए बने केनेल तक जानिए पूरी कहानी

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Alam Ki Khabar | Mumbai News | Business News | 102 साल पुराने बॉम्बे हाउस का इतिहास, निर्माण, वास्तुकला, टाटा समूह के वैश्विक मुख्यालय की भूमिका और आवारा कुत्तों के लिए बने विशेष केनेल की पूरी कहानी पढ़ें।

मुंबई, 14 अगस्त: दक्षिण मुंबई के फोर्ट इलाके में एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत खड़ी है, जिसे देखकर पहली नजर में शायद कोई अंदाजा न लगा पाए कि इसके भीतर भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक के महत्वपूर्ण फैसलों की दुनिया बसती है। यह इमारत है बॉम्बे हाउस, जो 1924 से टाटा समूह का मुख्यालय बनी हुई है। टाटा समूह की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, यह इमारत आज समूह के वैश्विक मुख्यालय के तौर पर काम करती है और यहां टाटा समूह की कई प्रमुख कंपनियों के कार्यालय मौजूद हैं।

बॉम्बे हाउस की कहानी केवल एक कॉरपोरेट ऑफिस की कहानी नहीं है। यह उस दौर की याद भी अपने भीतर समेटे हुए है, जब भारत में औद्योगिक विकास की नींव मजबूत हो रही थी और टाटा समूह का कारोबार लगातार विस्तार कर रहा था।

फोर्ट इलाके में मौजूद है ऐतिहासिक इमारत

बॉम्बे हाउस मुंबई के फोर्ट क्षेत्र में होमी मोदी स्ट्रीट पर स्थित है। यह फ्लोरा फाउंटेन के आसपास के ऐतिहासिक इलाके में आने वाली प्रतिष्ठित इमारतों में शामिल है। आज इसके आसपास मुंबई का व्यस्त कारोबारी क्षेत्र है, लेकिन इमारत की बाहरी संरचना अब भी अपने पुराने स्थापत्य चरित्र को काफी हद तक कायम रखती है।

टाटा समूह के अनुसार, वर्तमान बॉम्बे हाउस से पहले समूह के कार्यालय विक्टोरिया बिल्डिंग और बाद में नवसारी बिल्डिंग्स एंड चैंबर्स में रहे थे। कारोबार बढ़ने के साथ एक बड़े और स्थायी मुख्यालय की जरूरत महसूस हुई।

1920 में खरीदी गई जमीन, 1924 में खुला बॉम्बे हाउस

बॉम्बे हाउस के लिए टाटा समूह ने 1920 में मुंबई नगरपालिका से जमीन के दो प्लॉट खरीदे थे। इनकी कुल जमीन करीब 21,000 वर्ग फुट से अधिक थी। इसके बाद भवन की डिजाइन तैयार करने की जिम्मेदारी प्रसिद्ध वास्तुकार जॉर्ज विटेट को दी गई।

जॉर्ज विटेट मुंबई की कई ऐतिहासिक इमारतों से जुड़े रहे हैं। वे गेटवे ऑफ इंडिया के डिजाइन से भी जुड़े थे और टाटा समूह के कंसल्टिंग आर्किटेक्ट के तौर पर भी काम कर चुके थे। बॉम्बे हाउस की डिजाइन में नियो-क्लासिकल और एडवर्डियन वास्तुकला का प्रभाव दिखाई देता है।

निर्माण जुलाई 1924 में पूरा हुआ और 1 जुलाई 1924 को बॉम्बे हाउस ने अपने दरवाजे खोले। उस समय टाटा समूह में मुख्य रूप से टेक्सटाइल, होटल, स्टील और पावर जैसे कारोबार महत्वपूर्ण थे।

यानी 2026 में यह इमारत 102 साल की हो चुकी है।

मलाड स्टोन ने दी अलग पहचान

बॉम्बे हाउस की बाहरी दीवारों पर इस्तेमाल किया गया पत्थर इसकी पहचान का अहम हिस्सा है। इमारत को मलाड स्टोन से तैयार किया गया था, जो मुंबई की कई पुरानी ऐतिहासिक इमारतों में इस्तेमाल हुआ है।

पत्थर की सतह, समान अनुपात वाली खिड़कियां, सजावटी तत्व और प्रवेश द्वार की बनावट बॉम्बे हाउस को आधुनिक कांच-पत्थर वाली कॉरपोरेट इमारतों से अलग पहचान देती है। टाटा समूह ने अपनी 100वीं वर्षगांठ से जुड़ी जानकारी में भी इसकी ऐतिहासिक वास्तुकला और संरचना को विस्तार से दर्ज किया है।

चार मंजिलों में फैला टाटा का कॉरपोरेट सेंटर

समय के साथ टाटा समूह का विस्तार हुआ तो बॉम्बे हाउस की संरचना में भी बदलाव किए गए। 1941-42 के दौरान इसमें अतिरिक्त मंजिल जोड़ी गई। बाद में यहां बोर्डरूम और चेयरमैन कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण हिस्से विकसित हुए।

आज बॉम्बे हाउस में टाटा समूह की कई प्रमुख कंपनियों और संस्थाओं के कार्यालय हैं। टाटा की आधिकारिक जानकारी के अनुसार यहां टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स, टाटा पावर, टाटा इंडस्ट्रीज, ट्रेंट, टाटा मोटर्स, टाटा संस और टाटा सर्विसेज जैसी संस्थाओं के कार्यालय रहे हैं।

यही वजह है कि बॉम्बे हाउस को सिर्फ एक ऑफिस बिल्डिंग नहीं, बल्कि टाटा समूह के रणनीतिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में देखा जाता है।

2017-18 में पहली बड़ी मरम्मत

लगभग 94 वर्षों तक इस्तेमाल में रहने के बाद बॉम्बे हाउस को पहली बार बड़े स्तर पर पुनर्निर्मित और आधुनिक बनाया गया। टाटा समूह के मुताबिक, यह परियोजना 2017 में शुरू हुई और 2018 में भवन को फिर से खोला गया। पुनर्निर्माण के दौरान ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक कार्यस्थल तैयार किया गया।

नए डिजाइन में खुले और सहयोगात्मक कार्यक्षेत्र, डिजिटल मीटिंग सुविधाएं, साझा जगहें और टाटा समूह के इतिहास को दर्शाने वाली प्रदर्शनी शामिल की गई। ग्राउंड फ्लोर पर टाटा एक्सपीरियंस सेंटर भी बनाया गया, जहां समूह की यात्रा और विरासत को प्रदर्शित किया जाता है।

बोर्डरूम आज भी संभालकर रखा गया

बॉम्बे हाउस के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में उसका ऐतिहासिक बोर्डरूम शामिल है। आधुनिक तकनीक और सुविधाएं जोड़ने के बावजूद इसके पुराने स्वरूप को काफी हद तक सुरक्षित रखा गया। यही वह जगह है जहां टाटा समूह के इतिहास के कई महत्वपूर्ण दौर के फैसलों की गूंज रही है।

ऊपरी मंजिल पर चेयरमैन का कार्यालय भी है। टाटा की ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, जेआरडी टाटा इस कार्यालय का इस्तेमाल करने वाले शुरुआती चेयरमैन थे।

इंसानों के साथ आवारा कुत्तों का भी ठिकाना

बॉम्बे हाउस की सबसे दिलचस्प और मानवीय कहानियों में यहां रहने वाले आवारा कुत्तों की कहानी शामिल है।

दक्षिण मुंबई के इस इलाके में रहने वाले कुत्ते लंबे समय से बॉम्बे हाउस के परिसर में आते रहे हैं। टाटा समूह ने 2018 के नवीनीकरण के दौरान उनके लिए बाकायदा एक विशेष केनेल तैयार कराया। इसमें कुत्तों के आराम करने, पानी पीने और भोजन पाने की व्यवस्था की गई।

टाटा समूह की अपनी सामग्री में भी बॉम्बे हाउस के इन चार-पैर वाले 'निवासियों' का उल्लेख मिलता है। केनेल को इस तरह बनाया गया कि कुत्ते जरूरत के मुताबिक वहां आ-जा सकें।

विरासत और आधुनिकता का संगम

बॉम्बे हाउस की सबसे बड़ी खासियत शायद यही है कि यहां इतिहास और आधुनिकता एक साथ दिखाई देते हैं। बाहर से यह एक सदी पुरानी विरासत इमारत है, जबकि भीतर आधुनिक तकनीक और सहयोगात्मक कार्य संस्कृति के अनुरूप बदलाव किए गए हैं।

टाटा समूह की जानकारी के अनुसार, यह इमारत भारत की उन विरासत इमारतों में भी विशेष स्थान रखती है, जिन्हें पर्यावरणीय और टिकाऊ भवन मानकों के लिए मान्यता मिली है। इसे इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल की प्लेटिनम रेटिंग भी मिली थी।

आज बॉम्बे हाउस के सामने से गुजरने वाला आम व्यक्ति शायद यह न जानता हो कि इस ऐतिहासिक पत्थर की इमारत के भीतर एक ऐसे कारोबारी समूह का मुख्यालय है, जिसका विस्तार दुनिया के कई देशों और अलग-अलग क्षेत्रों तक है।

102 साल बाद भी बॉम्बे हाउस की पहचान सिर्फ उसकी उम्र नहीं है। इसकी असली ताकत वह विरासत है, जिसने बदलते समय के साथ खुद को आधुनिक बनाया, लेकिन अपनी ऐतिहासिक पहचान को बचाए रखा।

विरासत बचाने की सोच ही बॉम्बे हाउस की असली पहचान

किसी भी बड़ी कॉरपोरेट इमारत की पहचान उसके आकार, सुविधाओं या वहां बैठने वाले अधिकारियों से हो सकती है, लेकिन बॉम्बे हाउस का मामला थोड़ा अलग है। यह इमारत टाटा समूह के कारोबारी विस्तार की साक्षी रही है। 1924 में जब यहां काम शुरू हुआ, तब समूह का कारोबार आज की तुलना में बेहद छोटा था। एक सदी के दौरान कारोबार की संख्या, भौगोलिक पहुंच और कंपनियों का विस्तार लगातार बढ़ता गया।

फिर भी सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि आधुनिकीकरण के दौरान पुरानी इमारत को पूरी तरह बदलने के बजाय उसकी मूल पहचान को बचाने की कोशिश की गई। ऐतिहासिक बोर्डरूम, बाहरी पत्थर की संरचना और वास्तुशिल्पीय विशेषताओं को संरक्षित रखते हुए भीतर आधुनिक कार्यस्थल तैयार किया गया।

बॉम्बे हाउस इस बात का उदाहरण है कि विरासत और आधुनिकता को एक-दूसरे का विरोधी मानना जरूरी नहीं। सही योजना के साथ एक पुरानी इमारत नई पीढ़ी की जरूरतों को पूरा कर सकती है।

और शायद यही वजह है कि बॉम्बे हाउस आज भी केवल टाटा समूह का मुख्यालय नहीं, बल्कि मुंबई के औद्योगिक इतिहास का एक जीवित अध्याय माना जाता है।

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