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Lifestyle News: शादी-ब्याह में क्यों छा जाता है ‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’, जानिए पंजाबी लोकगीत की दिलचस्प कहानी

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | ‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ पंजाबी लोकगीत और गिद्दा की लोकप्रिय बोली है। जानिए इसके चुलबुले बोल, महिलाओं की नोंक-झोंक और सुरिंदर कौर से जुड़ी इसकी लोकप्रियता की कहानी।

डेस्क, नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026। पंजाबी शादियों में जब ढोलक की थाप शुरू होती है और महिलाएं गिद्दा के लिए एक-दूसरे का हाथ थामती हैं, तो कुछ लोक बोल माहौल में अलग ही रंग भर देते हैं। ‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ भी ऐसा ही लोकप्रिय पंजाबी लोकगीत है, जिसकी चुलबुली शैली और हंसी-मजाक से भरे संवाद आज भी शादी-ब्याह और लेडीज संगीत की महफिल में लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।

यह गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि पंजाब की उस लोक परंपरा की झलक भी देता है, जिसमें महिलाएं रोजमर्रा के जीवन, रिश्तों और घरेलू घटनाओं को गीतों के जरिए मजाकिया अंदाज में पेश करती रही हैं। गीत की खासियत यही है कि इसमें गंभीरता के बजाय हंसी, चुहल और सवाल-जवाब का रंग ज्यादा दिखाई देता है।

गांव के आंगन से शादी के मंच तक पहुंची बोली

पंजाबी लोक संगीत की ‘बोली’ परंपरा बेहद समृद्ध रही है। गांवों में महिलाएं शादी-ब्याह, त्योहारों और दूसरे सामूहिक अवसरों पर एकत्र होती थीं और मौके के हिसाब से छोटी-छोटी बोलियां गाती थीं। इन बोलियों में परिवार के रिश्ते, पति-पत्नी की नोंक-झोंक, ननद-भौजाई की बातचीत और रोजमर्रा की जिंदगी को हास्य के साथ पेश किया जाता था।

‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ भी इसी लोक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। इसके बोलों में घरेलू संदर्भ और शृंगार से जुड़ी फरमाइश को इस तरह पेश किया गया है कि सुनने वालों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

गीत में छिपी है महिलाओं की चुलबुली बातचीत

इस लोकगीत की सबसे बड़ी खासियत इसका संवाद वाला अंदाज है। गीत में एक महिला की फरमाइश को दूसरी महिलाएं सवाल-जवाब और कोरस के जरिए आगे बढ़ाती हैं। इसी वजह से गिद्दा करने वाली महिलाओं को इसमें आसानी से भागीदारी का मौका मिलता है।

गीत में ‘वेलना’ यानी बेलन को लेकर की गई फरमाइश को शृंगार और गहनों से जोड़कर मजाकिया स्थिति बनाई गई है। आगे बातचीत में दूसरी महिला के संदर्भ के जरिए चुहल और नोंक-झोंक का माहौल पैदा होता है।

यही हल्का-फुल्का हास्य इस गीत को आम लोकगीतों से अलग पहचान देता है। इसमें किसी एक पात्र की कहानी सुनाने के बजाय महिलाओं के सामूहिक मनोरंजन और आपसी हंसी-मजाक को केंद्र में रखा गया है।

गिद्दा में क्यों खूब जमता है यह गीत?

गिद्दा पंजाब की महिलाओं का पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसमें तालियों, शरीर की लय और बोलियों के माध्यम से प्रस्तुति दी जाती है। ऐसे में छोटे, चुटीले और सवाल-जवाब वाले गीत गिद्दा के लिए बिल्कुल उपयुक्त होते हैं।

‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ में भी यही खूबियां हैं। गीत की पंक्तियां समूह में दोहराई जा सकती हैं और उनके बीच महिलाएं अपने नृत्य की मुद्राएं बदलती रहती हैं। यही वजह है कि शादी की महफिल में यह गीत शुरू होते ही माहौल जीवंत हो जाता है।

शादी-ब्याह की महफिल में आज भी लोकप्रिय

समय के साथ शादी समारोहों का स्वरूप काफी बदल गया है। पारंपरिक ढोलक की जगह अब डीजे और आधुनिक संगीत ने ले ली है, लेकिन पंजाबी लोकगीतों की लोकप्रियता कम नहीं हुई है।

मेहंदी, संगीत और दूसरे पारिवारिक समारोहों में पुराने लोकगीत आज भी नई पीढ़ी को आकर्षित करते हैं। इनमें खास बात यह है कि इन्हें केवल सुना नहीं जाता, बल्कि परिवार की महिलाएं मिलकर गाती और उन पर नृत्य भी करती हैं।

यही वजह है कि ‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ जैसे लोकगीत आधुनिक शादी समारोहों में भी अपनी जगह बनाए हुए हैं।

सुरिंदर कौर की आवाज ने बढ़ाई पहचान

पंजाबी लोक संगीत की महान गायिका सुरिंदर कौर ने कई पारंपरिक लोकगीतों को अपनी आवाज के जरिए व्यापक पहचान दिलाई। पंजाबी संगीत प्रेमियों के बीच उन्हें ‘पंजाब की कोयल’ के नाम से भी याद किया जाता है।

उनकी गायकी में लोक संगीत की सहजता और पंजाब की मिट्टी की खुशबू महसूस होती थी। पारंपरिक गीतों को लोकप्रिय मंच और रिकॉर्डिंग के माध्यम से बड़े श्रोतावर्ग तक पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ जैसे गीतों की लोकप्रियता में भी पारंपरिक पंजाबी गायन की इसी विरासत की भूमिका रही है।

लोकगीत में रिश्तों की मिठास

पंजाबी लोकगीतों की एक खास खूबी यह है कि वे परिवार और रिश्तों को बहुत सहज तरीके से संगीत में पिरो देते हैं। कभी ननद अपनी भाभी को छेड़ती है तो कभी भाभी देवर या पति को लेकर मजाक करती है।

इस तरह की बोलियों में दिखाई देने वाली नोकझोंक को आमतौर पर गंभीर विवाद के रूप में नहीं देखा जाता। यह पारिवारिक समारोह का हिस्सा होती है और इसका मकसद माहौल में हंसी-खुशी पैदा करना होता है।

‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ भी इसी चुलबुले अंदाज का उदाहरण है, जहां गहने, शृंगार और रिश्तों से जुड़े संदर्भ हास्य के साथ सामने आते हैं।

नई पीढ़ी तक पहुंच रहा लोक संगीत

आज सोशल मीडिया और डिजिटल म्यूजिक प्लेटफॉर्म के दौर में पुराने पंजाबी लोकगीतों को नए अंदाज में प्रस्तुत किया जा रहा है। पारंपरिक बोलियों को आधुनिक संगीत के साथ मिलाकर नए संस्करण तैयार किए जाते हैं, जिन्हें युवा भी पसंद कर रहे हैं।

इसके बावजूद मूल लोकगीतों की खासियत बरकरार है। सामूहिक गायन, तालियां, ढोल की थाप और गिद्दा की पारंपरिक शैली आज भी पंजाबी संस्कृति की पहचान बनी हुई है।

‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ इसी लोक विरासत का एक ऐसा गीत है, जो पीढ़ियां बदलने के बावजूद शादी-ब्याह की महफिल में अपनी जगह बनाए हुए है। इसकी लोकप्रियता बताती है कि लोक संगीत की असली ताकत सिर्फ धुन में नहीं, बल्कि उससे जुड़े सामूहिक आनंद और सांस्कृतिक यादों में भी होती है।

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जनहित टिप्पणी

लोकगीत किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति होते हैं। इनमें बड़े इतिहास की जगह आम लोगों की जिंदगी, रिश्ते, त्योहार और रोजमर्रा की खुशियां दर्ज होती हैं। पंजाब की बोलियों में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है। शादी और पारिवारिक आयोजनों में गाए जाने वाले ऐसे गीत महिलाओं को अपनी बात हास्य और संगीत के जरिए कहने का अवसर देते थे।

‘भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा’ की लोकप्रियता भी इसी परंपरा से जुड़ी है। आज भले ही शादी समारोहों में आधुनिक संगीत का बोलबाला हो, लेकिन जब पारंपरिक लोकगीत बजता है तो परिवार की कई पीढ़ियां एक साथ जुड़ जाती हैं।

ऐसे गीतों को केवल मनोरंजन समझकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। इनके भीतर क्षेत्रीय भाषा, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक जीवन की झलक छिपी होती है। यही कारण है कि आधुनिक दौर में भी पंजाबी लोकगीत और गिद्दा अपनी पहचान बनाए हुए हैं।

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