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Music News: ‘लैंबॉर्गिनी’ की धुन के पीछे छिपा है सदियों पुराना पंजाबी लोकगीत ‘चिट्टा कुक्कड़’, जानिए इसकी कहानी

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | ‘चिट्टा कुक्कड़’ पंजाबी लोक संस्कृति का लोकप्रिय गीत है, जिसकी पारंपरिक धुन ने आधुनिक पॉप संगीत में भी अपनी पहचान बनाई।

नई दिल्ली, Alam Ki Khabar। पंजाबी संगीत की धुन सुनते ही लोगों के कदम थिरकने लगते हैं। आधुनिक दौर में पंजाबी पॉप और भांगड़ा ने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में अपनी खास पहचान बनाई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ बेहद लोकप्रिय पंजाबी धुनों की जड़ें आधुनिक संगीत से कहीं ज्यादा पुरानी हैं? ऐसा ही एक नाम है ‘चिट्टा कुक्कड़’, जो पंजाब की पारंपरिक लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

‘चिट्टा कुक्कड़’ को पंजाब के लोकप्रिय लोकगीतों में गिना जाता है। ग्रामीण इलाकों में इसे खासकर शादी-ब्याह और खुशी के अवसरों पर गाने की परंपरा रही है। इस गीत की सटीक उत्पत्ति और इसे सबसे पहले किसने लिखा या गाया, इसे लेकर निश्चित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि लोक परंपरा में यह गीत पीढ़ियों से एक-दूसरे तक पहुंचता रहा है।

इस लोकगीत की सबसे खास बात इसके सरल लेकिन भावपूर्ण बोल हैं। गीत में ग्रामीण जीवन, प्रेम और शादी के माहौल की तस्वीर दिखाई देती है। ‘चिट्टा कुक्कड़’ यानी सफेद मुर्गे का जिक्र पंजाब के ग्रामीण परिवेश से जुड़ा हुआ माना जाता है। गांवों में सुबह मुर्गे की बांग रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही है। सफेद रंग को पवित्रता से जोड़कर देखा जाता है, जबकि मुंडेर पर बैठा मुर्गा गांव के पारंपरिक माहौल को सामने रखता है।

शादी के संदर्भ में इस गीत का भाव एक नई शुरुआत से भी जुड़ जाता है। विवाह के मौके पर गीत के जरिए दूल्हा-दुल्हन के बीच प्रेम, हंसी-मजाक और हल्की-फुल्की नोकझोंक को भी व्यक्त किया जाता है। लड़की के दुपट्टे के रंग और उसके प्रति युवक के आकर्षण का जिक्र गीत को और अधिक रोमांटिक और चंचल बना देता है।

‘चिट्टा कुक्कड़’ की गायकी को टप्पा शैली से जोड़ा जाता है। टप्पा गायकी में तेज लय, छोटे बोल और चंचल अंदाज प्रमुख होते हैं। इसमें गीत को बहुत ज्यादा खींचकर गाने के बजाय छोटे-छोटे बोलों को तेजी और लय के साथ पेश किया जाता है। यही कारण है कि इस तरह की लोकधुन सुनते ही माहौल में उत्साह पैदा हो जाता है।

पंजाब के लोक संगीत की यही खासियत रही है कि साधारण शब्दों और तेज लय के माध्यम से प्रेम, रिश्तों, ग्रामीण जीवन और उत्सव को बेहद प्रभावी तरीके से व्यक्त किया जाता है। समय के साथ इन पारंपरिक धुनों ने आधुनिक संगीत को भी प्रभावित किया है।

साल 2018 में लोकप्रिय हुआ पंजाबी पॉप सॉन्ग ‘लैंबॉर्गिनी’ भी इसी कड़ी में चर्चा में आता है। इस गाने में ‘चिट्टा कुक्कड़’ की पारंपरिक टप्पा धुन की झलक सुनाई देती है। आधुनिक संगीत के साथ पुराने लोक संगीत का मेल कर इसे नए दौर के श्रोताओं के लिए अलग अंदाज में पेश किया गया।

‘लैंबॉर्गिनी’ में आधुनिक बीट और पॉप अंदाज के साथ रैप का इस्तेमाल भी किया गया। इससे पारंपरिक धुन को युवा पीढ़ी के बीच एक नया रूप मिला। बहुत से लोग इस गाने पर थिरकते रहे, लेकिन उन्हें शायद यह जानकारी नहीं रही कि इसकी धुन का संबंध पंजाब की पुरानी लोक परंपरा से है।

दरअसल, लोक संगीत की यही खूबसूरती है कि वह समय के साथ अपना रूप बदलता रहता है, लेकिन उसकी मूल धुन और सांस्कृतिक पहचान लंबे समय तक कायम रहती है। पंजाब के लोकगीतों में गांव, खेत, रिश्ते, प्रेम, विवाह और रोजमर्रा की जिंदगी की झलक मिलती है। यही कारण है कि आधुनिक संगीतकार भी कई बार पारंपरिक धुनों को नए संगीत संयोजन के साथ पेश करते हैं।

‘चिट्टा कुक्कड़’ से ‘लैंबॉर्गिनी’ तक का सफर इस बात का उदाहरण है कि सदियों पुरानी लोक परंपरा आधुनिक पॉप संस्कृति में भी अपनी जगह बना सकती है। एक तरफ यह गीत पंजाब के ग्रामीण और पारंपरिक जीवन की याद दिलाता है, तो दूसरी तरफ आधुनिक संगीत में इसका इस्तेमाल नई पीढ़ी को उसी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम करता है।

आज जब पंजाबी संगीत पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रहा है, ऐसे में इसके पीछे मौजूद लोक परंपराओं को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आधुनिक गानों की चमक-दमक के पीछे कई ऐसी पुरानी धुनें हैं, जिन्हें गांवों में पीढ़ियों से गाया जाता रहा है।

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पुरानी लोकधुनों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ने से एक तरफ नए श्रोताओं तक पहुंच आसान होती है, वहीं दूसरी तरफ सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में भी मदद मिलती है। ‘चिट्टा कुक्कड़’ इसी लोक विरासत की एक मिसाल है। इसलिए अगली बार जब ‘लैंबॉर्गिनी’ जैसी धुन सुनकर आपके कदम थिरकें, तो यह याद रखना दिलचस्प होगा कि उसके पीछे पंजाब की पुरानी लोक संस्कृति की आवाज भी सुनाई देती है।

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