:
Breaking News

Culture News: बिहार का झिझिया लोकगीत क्यों है खास? ब्रह्म बाबा से रक्षा की गुहार लगाती हैं महिलाएं

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार का झिझिया लोकगीत नवरात्र की लोकपरंपरा से जुड़ा है। जानिए छेददार मिट्टी के मटके, ब्रह्म बाबा की मान्यता और इस गीत में छिपे रक्षा व आस्था के संदेश के बारे में।

20 अक्टूबर 2026, Alam Ki Khabar: पटना: बिहार की लोकसंस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनमें गीत, नृत्य और लोकआस्था एक साथ देखने को मिलते हैं। झिझिया भी ऐसी ही एक पारंपरिक लोकविधा है, जो खासकर नवरात्र के दौरान महिलाओं के सामूहिक नृत्य और गीतों के जरिए जीवंत होती है। इस परंपरा में गाया जाने वाला गीत “तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा झिझरी बनइलिअइ हो” लोकदेवता ब्रह्म बाबा के प्रति विश्वास और परिवार की रक्षा की कामना को व्यक्त करता है।


छेददार मटके के साथ किया जाता है झिझिया नृत्य


झिझिया नृत्य में महिलाएं मिट्टी के ऐसे मटके का इस्तेमाल करती हैं, जिसमें छोटे-छोटे छेद बने होते हैं। मटके के भीतर दीपक जलाकर उसे सिर पर रखा जाता है और महिलाएं गीत गाते हुए सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं। मटके से छनकर निकलने वाली रोशनी इस लोकनृत्य को अलग पहचान देती है।


यह परंपरा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ी लोकमान्यताओं में परिवार, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा और बुरी शक्तियों से बचाव की कामना प्रमुख मानी जाती है।


ब्रह्म बाबा पर भरोसे का भाव


झिझिया गीत की पंक्तियों में महिलाएं ब्रह्म बाबा को अपना रक्षक मानकर उनसे सुरक्षा की गुहार लगाती हैं। गीत का भाव है कि झिझरी उन्हीं के भरोसे बनाई गई है और वे अपनी कृपा बनाए रखें। इस तरह लोकगीत के माध्यम से महिलाएं अपनी आस्था और मन की भावनाओं को व्यक्त करती हैं।


बिहार के अलग-अलग इलाकों में लोकगीतों के बोल और प्रस्तुति में स्थानीय अंतर देखने को मिल सकता है। झिझिया की परंपरा भी मौखिक लोकसंस्कृति के जरिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।


सवाल-जवाब के अंदाज में आगे बढ़ता है गीत


इस लोकगीत की एक खासियत इसकी संवादात्मक शैली है। गीत में हरे सुग्गे यानी तोते और भाई के आने के बारे में सवाल किया जाता है। जवाब में सुग्गे के ससुराल से और भाई के मायके से आने की बात कही जाती है। इसके बाद उनके लिए पानी की व्यवस्था से जुड़े सवाल-जवाब आते हैं।


गीत की ये पंक्तियां ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्तों और रोजमर्रा की कल्पनाओं को लोकधुन के साथ जोड़ती हैं। सामूहिक गायन के कारण इसमें शामिल महिलाएं एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाकर नृत्य करती हैं और परंपरा को उत्सव का रूप देती हैं।


लोककथा में बुराई पर अच्छाई की जीत


झिझिया से जुड़ी लोककथाओं में बुरी शक्तियों से रक्षा का प्रसंग भी मिलता है। प्रचलित कथा के एक रूप में डायन और ब्रह्म बाबा का जिक्र आता है, जहां ब्रह्म बाबा को बुरी शक्ति का सामना करने वाले रक्षक के रूप में दिखाया जाता है। ऐसी कथाएं स्थानीय विश्वासों का हिस्सा हैं और इन्हें लोकपरंपरा के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।


बिहार की सांस्कृतिक पहचान है झिझिया


झिझिया गीत और नृत्य बिहार की ग्रामीण सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसमें लोकसंगीत, सामूहिक भागीदारी, पारिवारिक संबंध और धार्मिक आस्था का मेल दिखाई देता है। आधुनिक दौर में भी ऐसी परंपराओं का दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक परिचय पहुंचाना जरूरी है, ताकि क्षेत्रीय लोकगीतों की पहचान बनी रहे।


झिझिया केवल सिर पर दीपक वाला मटका रखकर किया जाने वाला नृत्य नहीं, बल्कि लोकसमुदाय की स्मृतियों, मान्यताओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जुड़ी परंपरा है।


यह भी पढ़ें: बिहार की लोकसंस्कृति, परंपराओं और त्योहारों से जुड़ी अन्य खबरों के लिए Alam Ki Khabar पढ़ते रहें।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *