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भारत में घटती जन्म दर पर बढ़ी चिंता, फर्टिलिटी रेट 1.9 पर पहुंचा, जनसंख्या संतुलन पर सवाल

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भारत का टोटल फर्टिलिटी रेट 1.9 दर्ज किया गया है, जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से कम है। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले दशकों में देश की जनसंख्या वृद्धि धीमी होकर स्थिरता और फिर गिरावट की ओर जा सकती है।

भारत, जिसे लंबे समय तक दुनिया के सबसे युवा और तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में गिना जाता रहा है, अब एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय बदलाव के दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है। हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की रिपोर्ट ने देश की जनसंख्या संरचना को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत की जन्म दर लगातार गिर रही है और अब यह रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है, जिसे भविष्य की जनसंख्या स्थिरता के लिए एक अहम संकेत माना जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत का कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) अब लगभग 1.9 दर्ज किया गया है। इसका अर्थ यह है कि एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन 1.9 बच्चों को जन्म दे रही है। जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए यह दर 2.1 मानी जाती है, जिसे रिप्लेसमेंट लेवल कहा जाता है। जब यह दर लंबे समय तक इससे नीचे रहती है, तो देश की जनसंख्या वृद्धि धीरे-धीरे रुकने लगती है और आगे चलकर इसमें गिरावट की संभावना भी बढ़ जाती है।

देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में इस दर को लेकर स्पष्ट अंतर देखने को मिलता है। शहरी भारत में यह औसत लगभग 1.5 तक पहुंच चुका है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 2.1 के करीब बना हुआ है। इसका अर्थ यह है कि शहरीकरण के साथ परिवार छोटे होते जा रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी अपेक्षाकृत बड़ी परिवार संरचना देखने को मिलती है।

आजादी के समय भारत में औसतन एक महिला पांच से छह बच्चों को जन्म देती थी। उस समय देश तेज जनसंख्या वृद्धि के दौर में था। लेकिन समय के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक स्थिति और सामाजिक सोच में आए बदलावों ने इस दर को लगातार नीचे लाया है। पिछले कुछ दशकों में यह दर धीरे-धीरे घटते हुए अब 1.9 तक पहुंच चुकी है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई सामाजिक और आर्थिक कारकों का परिणाम है। महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ना, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, विवाह की बढ़ती उम्र, जीवन यापन की उच्च लागत और शहरी जीवनशैली की प्राथमिकताएं इस बदलाव के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। छोटे परिवार की अवधारणा अब एक सामान्य सामाजिक प्रवृत्ति बन चुकी है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वाशिंगटन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन के शोध के अनुसार भारत की जनसंख्या अगले कुछ दशकों में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकती है और उसके बाद इसमें गिरावट का रुझान शुरू हो सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार इस सदी के अंत तक भारत की जनसंख्या एक अरब से थोड़ा अधिक रह सकती है, जो वर्तमान रुझानों से अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है।

राज्यों के स्तर पर देखें तो जन्म दर में भारी अंतर देखने को मिलता है। बिहार में यह दर सबसे अधिक लगभग 2.9 दर्ज की गई है, जबकि उत्तर प्रदेश में 2.6, मध्य प्रदेश में 2.4 और राजस्थान में 2.3 के आसपास है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली में यह केवल 1.2 है, जो कई विकसित देशों से भी कम है। केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में यह दर लगभग 1.3 के आसपास दर्ज की गई है।

यह अंतर देश के विकास और सामाजिक ढांचे में असमानता को भी दर्शाता है। जहां एक ओर कुछ राज्य अभी भी रिप्लेसमेंट स्तर के आसपास हैं, वहीं कई राज्य पहले ही उससे नीचे जा चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनसंख्या परिवर्तन पूरे देश में एक समान गति से नहीं हो रहा है।

पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो 1960 में भारत की प्रजनन दर लगभग 5.9 थी। इसके बाद 1970 में यह 5.6, 1980 में 4.8, 1990 में 4.0, 2000 में 3.3, 2010 में 2.6, 2015 में 2.3, 2019 में 2.2 और 2021 में 2.0 तक पहुंची। अब यह 1.9 के स्तर पर स्थिर दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव तुरंत किसी संकट का संकेत नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन है। हालांकि यदि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक जारी रहती है, तो आने वाले दशकों में देश की जनसंख्या संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जिसमें वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ सकता है और युवा आबादी की हिस्सेदारी घट सकती है।

वैश्विक स्तर पर भी यही प्रवृत्ति देखी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार अफ्रीका अभी भी उच्च जन्म दर वाला क्षेत्र बना हुआ है, जबकि यूरोप और एशिया के कई विकसित देशों में यह दर पहले ही काफी नीचे जा चुकी है। कई देशों को अब अपनी जनसंख्या स्थिर रखने के लिए विशेष नीतियां बनानी पड़ रही हैं।

भारत में इस बदलाव के पीछे कई अन्य कारक भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं। शहरीकरण के कारण जीवनशैली में बदलाव, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर उपलब्धता, गर्भनिरोधक साधनों तक पहुंच, देर से विवाह और करियर को प्राथमिकता देने जैसी प्रवृत्तियां जन्म दर को प्रभावित कर रही हैं।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आने वाले समय में यह बदलाव देश की आर्थिक और सामाजिक नीतियों को प्रभावित कर सकता है। श्रम बाजार, पेंशन प्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

फिलहाल भारत एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिसकी दिशा आने वाले समय में देश की विकास नीति और सामाजिक ढांचे को प्रभावित कर सकती है।

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