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बारिश में खुला मैनहोल बना सबसे बड़ा खतरा, हर साल दोहराए जाते हैं हादसे फिर भी नहीं बदलती व्यवस्था

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बारिश के मौसम में खुले मैनहोल और खराब ड्रेनेज व्यवस्था लोगों की जान पर भारी पड़ रही है। जानिए क्यों होते हैं ऐसे हादसे, किसकी जिम्मेदारी बनती है और इन्हें रोकने के लिए क्या कदम जरूरी हैं।

मानसून का मौसम राहत लेकर आता है, लेकिन इसके साथ कई ऐसी चुनौतियां भी सामने आती हैं जो लोगों की जान पर भारी पड़ सकती हैं। इनमें सबसे गंभीर समस्या खुले मैनहोल और जर्जर जलनिकासी व्यवस्था की है। हर साल देश के अलग-अलग शहरों से ऐसी खबरें सामने आती हैं, जहां बारिश के दौरान सड़क पर बहते पानी के बीच लोग खुले मैनहोल का शिकार हो जाते हैं। कई मामलों में लोगों की जान चली जाती है, जबकि कई घायल होकर लंबे समय तक इलाज कराने को मजबूर होते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि शहरी प्रबंधन की गंभीर चुनौती भी है। यदि समय पर मैनहोल को सुरक्षित किया जाए, जलनिकासी व्यवस्था दुरुस्त रखी जाए और नियमित निरीक्षण हो, तो ऐसे अधिकांश हादसों को रोका जा सकता है।

बरसात में जब सड़कें पानी से भर जाती हैं तो मैनहोल दिखाई नहीं देते। कई बार ढक्कन क्षतिग्रस्त होने, चोरी होने या सफाई कार्य के बाद सही तरीके से बंद नहीं किए जाने के कारण बड़ा खतरा पैदा हो जाता है। तेज बहाव में पैदल यात्री, बाइक सवार और कई बार छोटे बच्चे भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।

शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि किसी भी शहर की सुरक्षा केवल चौड़ी सड़कों या ऊंची इमारतों से तय नहीं होती, बल्कि उसकी बुनियादी सुविधाओं की मजबूती से होती है। यदि सीवर, नालियां और मैनहोल सुरक्षित नहीं हैं तो नागरिकों की जान हमेशा जोखिम में रहती है।

नगर निकायों की जिम्मेदारी है कि मानसून शुरू होने से पहले सभी मैनहोल की जांच कर उन्हें सुरक्षित बनाया जाए। जहां मरम्मत की जरूरत हो, वहां तुरंत काम पूरा किया जाए। साथ ही खुले स्थानों पर चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग और रात के समय रिफ्लेक्टर लगाए जाएं ताकि लोग खतरे को आसानी से पहचान सकें।

तकनीकी विशेषज्ञों का सुझाव है कि अब पारंपरिक लोहे के ढक्कनों की जगह मजबूत और लॉकिंग सिस्टम वाले आधुनिक कवर लगाए जाने चाहिए। इससे चोरी की घटनाएं कम होंगी और दुर्घटनाओं की संभावना भी घटेगी। कई देशों में सेंसर आधारित स्मार्ट मैनहोल तकनीक अपनाई जा रही है, जो ढक्कन खुलने पर तुरंत नियंत्रण कक्ष को सूचना भेज देती है।

नागरिकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। यदि किसी क्षेत्र में खुला मैनहोल दिखाई दे तो उसकी सूचना तुरंत नगर निकाय या आपदा नियंत्रण कक्ष को देनी चाहिए। सोशल मीडिया पर केवल तस्वीर साझा करने के बजाय संबंधित विभाग को शिकायत करना अधिक प्रभावी कदम हो सकता है।

स्कूलों में भी बच्चों को मानसून सुरक्षा के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। बारिश के दौरान जलभराव वाली सड़कों से दूर रहने, तेज बहाव वाले रास्तों का उपयोग न करने और अज्ञात रास्तों से बचने जैसी छोटी-छोटी सावधानियां बड़ी दुर्घटनाओं को रोक सकती हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आधुनिक शहरों में स्मार्ट तकनीक के साथ-साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। किसी भी हादसे के बाद केवल जांच और मुआवजे की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, नियमित ऑडिट हो और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराया जाए, तभी ऐसे हादसों में कमी आएगी।

आज जरूरत इस बात की है कि शहरी विकास योजनाओं में नागरिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। यदि प्रशासन, तकनीकी एजेंसियां और आम नागरिक मिलकर जिम्मेदारी निभाएं तो खुले मैनहोल जैसी समस्याओं से होने वाली दुखद घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

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किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा से होती है। हर दुर्घटना के बाद कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन स्थायी समाधान पर तेज़ी से काम होना जरूरी है। सुरक्षित बुनियादी ढांचा ही विकसित शहर की सबसे बड़ी पहचान है।

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