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Gyanvapi Mathura Sambhal Dispute: ज्ञानवापी, कृष्ण जन्मभूमि और संभल जामा मस्जिद विवाद में मध्यस्थता पर पक्षकारों का इनकार, अब सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई

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Alam Ki Khabar: ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल जामा मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल पर पक्षकारों ने असहमति जताई। सभी पक्ष अदालत के फैसले की मांग कर रहे हैं।

दिल्ली, 13 जुलाई। देश के तीन चर्चित धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में अब समझौते की राह मुश्किल होती नजर आ रही है। वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह भूमि विवाद और उत्तर प्रदेश के संभल जामा मस्जिद मामले में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुझाई गई मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

पक्षकारों का कहना है कि ये मामले केवल दो पक्षों के बीच का विवाद नहीं हैं, बल्कि धार्मिक आस्था, संवैधानिक अधिकार और कानूनी सवालों से जुड़े हुए हैं। इसलिए इनका समाधान आपसी समझौते के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की ओर से हाल में इन मामलों से जुड़े सभी पक्षकारों को एक पहल के तहत मध्यस्थता के जरिए समाधान तलाशने का प्रस्ताव भेजा गया था। इस पहल का उद्देश्य लंबे समय से लंबित मामलों को सहमति के आधार पर निपटाने का प्रयास करना था।

सूत्रों के अनुसार, हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं और संबंधित मस्जिद प्रबंधन समितियों ने अदालत को अपने निर्णय से अवगत कराते हुए कहा कि वे इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहते। दोनों पक्षों का तर्क है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में अंतिम फैसला अदालत के जरिए ही होना चाहिए।

मामलों से जुड़े वकीलों का कहना है कि पूजा स्थलों के अधिकार, ऐतिहासिक दावे और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 जैसे महत्वपूर्ण कानूनी विषय इन विवादों से जुड़े हैं। ऐसे में लोक अदालत या मध्यस्थता के जरिए इनका निपटारा करना उचित नहीं होगा।

ज्ञानवापी विवाद वाराणसी स्थित मस्जिद और मंदिर परिसर से जुड़े दावों को लेकर अदालत में चल रहा है। वहीं मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह परिसर को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद जारी है। संभल जामा मस्जिद मामले ने भी हाल के समय में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा बटोरी है।

दोनों समुदायों के पक्षकारों ने शांतिपूर्ण समाधान की बात जरूर कही है, लेकिन उनका रुख साफ है कि इन मामलों में फैसला न्यायालय के माध्यम से होना चाहिए। पक्षकारों के इस फैसले के बाद अब इन विवादों के विशेष लोक अदालत में पहुंचने की संभावना कम हो गई है।

अब इन मामलों में आगे की दिशा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और न्यायिक फैसलों पर निर्भर करेगी। अदालत के सामने धार्मिक आस्था, कानून और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल मौजूद हैं।

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