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Lalu Prasad Yadav: चारा घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, जमानत रद्द करने से इनकार

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Alam Ki Khabar: चारा घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया है। साथ ही हाईकोर्ट को छह महीने के भीतर लंबित अपील पर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया गया है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

नई दिल्ली, 14 जुलाई।चारा घोटाला मामले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें लालू प्रसाद यादव की जमानत रद्द करने और सजा पर लगी रोक हटाने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि लंबे समय से जारी जमानत में इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले के शीघ्र निस्तारण पर जोर देते हुए संबंधित हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपियों की सजा के खिलाफ लंबित अपीलों की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी की जाए। इस आदेश के बाद लालू प्रसाद यादव की जमानत फिलहाल बरकरार रहेगी, जबकि उनकी अपील पर अब तय समय-सीमा के भीतर सुनवाई आगे बढ़ेगी। उल्लेखनीय है कि चारा घोटाला मामले में वर्ष 2018 में लालू प्रसाद यादव को दोषी ठहराया गया था। इसके बाद उन्होंने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जो अब तक लंबित है। अपील पर अंतिम फैसला नहीं होने के कारण वर्ष 2021 में उन्हें जमानत मिली थी। इसी जमानत को रद्द कराने के लिए ईडी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। एजेंसी का तर्क था कि जमानत पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति नहीं जताई। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जमानत जारी रहेगी और न्यायिक प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट निर्धारित समय में अपील का निपटारा करे। इस फैसले को लालू प्रसाद यादव के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है, वहीं अब सभी की नजर हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर रहेगी।

न्यायिक प्रक्रिया में समयबद्ध सुनवाई का महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केवल एक व्यक्ति की जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लंबित आपराधिक अपीलों के समयबद्ध निपटारे की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। न्याय में अनावश्यक देरी न केवल न्यायिक व्यवस्था पर बोझ बढ़ाती है, बल्कि सभी पक्षों के अधिकारों को भी प्रभावित करती है। ऐसे मामलों में शीघ्र सुनवाई न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को मजबूत करती है।

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