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Supreme Court News: Adani से जुड़े PKCL-RRVUNL विवाद में बड़ा बदलाव, जस्टिस अरुण मिश्रा की जगह जस्टिस एस.के. कौल बने आर्बिट्रेटर

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Alam Ki Khabar | Supreme Court News | Adani News | Rajasthan News | अडानी से जुड़ी PKCL और RRVUNL के बीच आर्बिट्रेशन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस एस.के. कौल को नया आर्बिट्रेटर नियुक्त किया।

डेस्क, नई दिल्ली, 9 अगस्त। आलम की खबर: अडानी समूह से जुड़ी कंपनी पारसा कांटा कोलियरीज लिमिटेड (PKCL) और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के बीच चल रहे आर्बिट्रेशन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। शीर्ष अदालत ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा की जगह पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस.के. कौल को नया आर्बिट्रेटर नियुक्त करने का आदेश दिया है। यह फैसला दोनों पक्षों के बीच सहमति बनने के बाद हुआ।

मामला कोयले के विकास, खनन और परिवहन से जुड़े लंबे समय के कारोबारी समझौते से संबंधित है। PKCL अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और RRVUNL का संयुक्त उपक्रम है। इस संयुक्त उपक्रम में अडानी एंटरप्राइजेज की हिस्सेदारी 74 प्रतिशत और RRVUNL की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत बताई गई है। दोनों पक्षों के बीच हुआ समझौता लगभग 30 साल की अवधि से जुड़ा है।

ताजा विवाद उस समय महत्वपूर्ण हो गया, जब RRVUNL ने जस्टिस अरुण मिश्रा को आर्बिट्रेटर बनाए जाने पर आपत्ति जताई। निगम का कहना था कि जस्टिस मिश्रा पहले ही 2019 में इन्हीं पक्षों के बीच एक अलग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक रूप से सुनवाई कर चुके हैं। ऐसे में बाद के विवाद में उनकी आर्बिट्रेटर के तौर पर नियुक्ति को लेकर निष्पक्षता का सवाल उठ सकता है।

हालांकि PKCL ने इस आपत्ति का विरोध किया। कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव बनर्जी ने अदालत में कहा कि जिस पुराने मामले का हवाला दिया जा रहा है, उसमें फैसला जस्टिस मिश्रा ने नहीं लिखा था। उनका कहना था कि पुराने मामले को आधार बनाकर आर्बिट्रेटर बदलने की मांग उचित नहीं है।

2019 का विवाद फिर क्यों आया सामने?

PKCL और RRVUNL के बीच विवाद नया नहीं है। वर्ष 2019 में भी दोनों पक्षों के बीच एक अलग कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। उस समय मामला कोयले की कीमत में बदलाव, निर्धारित लागत और एस्क्रो खाते में रखी रकम से जुड़े दावों पर केंद्रित था।

उस मामले में राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ PKCL ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। तत्कालीन सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एम.आर. शाह की पीठ के सामने हुई थी। पीठ ने PKCL की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया था।

2019 की उस सुनवाई की सूचीबद्धता को लेकर भी उस समय सवाल उठे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर गर्मी की छुट्टियों के दौरान अडानी से जुड़े मामलों की सूचीबद्धता पर आपत्ति जताई थी। PKCL और RRVUNL से संबंधित मामला भी उस सूची में शामिल था।

दवे ने अपनी आपत्ति में यह मुद्दा उठाया था कि मामला नियमित क्रम से हटकर सुनवाई के लिए कैसे आया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी पीठ ने मामले में अपील की अनुमति दी थी और बाद में छुट्टियों के दौरान सुनवाई के लिए मामलों की सूची तैयार की गई।

इसी पुराने मामले को RRVUNL ने अब जस्टिस मिश्रा की आर्बिट्रेटर के रूप में नियुक्ति के विरोध का आधार बनाया।

राजस्थान हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

मौजूदा आर्बिट्रेशन विवाद में जस्टिस अरुण मिश्रा की नियुक्ति को लेकर RRVUNL ने आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बावजूद राजस्थान हाई कोर्ट की एक पीठ ने जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया।

इसके बाद RRVUNL ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और नए आर्बिट्रेटर की नियुक्ति की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और स्थिति को देखते हुए दूसरे पूर्व न्यायाधीश की नियुक्ति का विकल्प सामने रखा।

शुरुआत में PKCL की ओर से इस बदलाव को लेकर सहमति नहीं थी। कंपनी ने पुराने मामले और वर्तमान आर्बिट्रेशन के बीच अंतर बताते हुए जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति को बनाए रखने का पक्ष रखा।

दूसरी ओर RRVUNL की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि 2019 का मामला और मौजूदा विवाद पूरी तरह अलग होने के बावजूद दोनों के बीच महत्वपूर्ण संबंध है। दोनों मामलों में पक्षकार वही हैं और विवाद उसी अनुबंध से जुड़े अलग-अलग पहलुओं से संबंधित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि वह किसी पूर्व न्यायाधीश को ऐसी स्थिति में नहीं रखना चाहती, जहां उनकी निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा हो। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई और जस्टिस एस.के. कौल के नाम पर सहमति बनी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सहमति को अपने आदेश में दर्ज किया और जस्टिस कौल को नया आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया। इस तरह अब PKCL और RRVUNL के बीच मौजूदा आर्बिट्रेशन प्रक्रिया जस्टिस एस.के. कौल के सामने आगे बढ़ेगी।

हालांकि अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि RRVUNL की ओर से जस्टिस मिश्रा को हटाने के लिए जिस आधार का इस्तेमाल किया गया था, वह कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं था। यानी अदालत ने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति अपने आप में कानून के खिलाफ थी।

फिर भी दोनों पक्षों की सहमति से नया आर्बिट्रेटर नियुक्त किए जाने के बाद विवाद का यह पहलू फिलहाल समाप्त हो गया है।

मूल विवाद किस बात को लेकर है?

मूल विवाद PKCL और RRVUNL के बीच कोयले की आपूर्ति और उससे जुड़ी लागत व्यवस्था से संबंधित है। संयुक्त उपक्रम के माध्यम से कोयले के विकास, खनन और परिवहन का काम किया जाना था।

लंबी अवधि वाले ऐसे अनुबंधों में लागत, कीमत, परिवहन खर्च और भुगतान व्यवस्था में बदलाव होने पर विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी तरह PKCL और RRVUNL के बीच भी अलग-अलग समय पर वित्तीय और संविदात्मक दावों को लेकर कानूनी विवाद सामने आए।

2019 के मामले में कीमत बढ़ने, निर्धारित लागत और एस्क्रो खाते में रखी गई रकम से संबंधित दावे अदालत के सामने आए थे। अब वर्तमान आर्बिट्रेशन में भी अनुबंध से जुड़े अलग विवादों पर निर्णय होना है।

इसलिए जस्टिस एस.के. कौल की नियुक्ति को मूल विवाद पर फैसला नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आर्बिट्रेटर को लेकर उठे विवाद का समाधान किया है। PKCL और RRVUNL के बीच मूल कारोबारी और संविदात्मक मुद्दों पर आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया आगे जारी रहेगी।

निष्पक्षता को लेकर क्या सवाल उठा?

RRVUNL की ओर से अदालत में उठाया गया मुख्य सवाल यह था कि यदि कोई पूर्व न्यायाधीश पहले उन्हीं पक्षों के बीच किसी विवाद पर न्यायिक रूप से विचार कर चुका है, तो क्या बाद में उसे उन्हीं पक्षों के बीच एक अलग विवाद में आर्बिट्रेटर बनाया जाना उचित होगा।

यह सवाल आर्बिट्रेशन में निष्पक्षता की धारणा से जुड़ा है। किसी प्रक्रिया में सिर्फ वास्तविक निष्पक्षता ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि पक्षकारों को यह भरोसा भी होना चाहिए कि प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से चल रही है।

हालांकि RRVUNL की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि उसकी आपत्ति का उद्देश्य जस्टिस अरुण मिश्रा पर किसी तरह का आरोप लगाना नहीं था। उसका तर्क एक व्यापक कानूनी प्रश्न से जुड़ा था।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने दोनों पक्ष अंततः दूसरे पूर्व न्यायाधीश की नियुक्ति पर सहमत हो गए। इसलिए इस व्यापक कानूनी प्रश्न पर अदालत ने कोई अंतिम फैसला देने की आवश्यकता नहीं समझी।

अब आगे क्या होगा?

जस्टिस एस.के. कौल की नियुक्ति के बाद अब आर्बिट्रेशन की कार्यवाही आगे बढ़ेगी। मूल अनुबंध, कोयले की खनन और ढुलाई से जुड़े दायित्व, लागत तथा संबंधित वित्तीय दावों पर आर्बिट्रेशन प्रक्रिया में विचार किया जाएगा।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश किसी पक्ष के मूल दावे को सही या गलत ठहराने वाला फैसला नहीं है। अदालत ने मुख्य रूप से आर्बिट्रेटर की नियुक्ति से जुड़े विवाद को दोनों पक्षों की सहमति से सुलझाया है।

लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद में अब नजर इस बात पर रहेगी कि जस्टिस एस.के. कौल के सामने आर्बिट्रेशन की कार्यवाही किस दिशा में आगे बढ़ती है और PKCL तथा RRVUNL के बीच अनुबंध से जुड़े विवादों का समाधान किस तरह निकलता है।

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लंबे अनुबंधों में विवाद और निष्पक्ष आर्बिट्रेशन की अहमियत

बड़े ऊर्जा और खनन प्रोजेक्ट वर्षों तक चलने वाले अनुबंधों पर आधारित होते हैं। ऐसे समझौतों में शुरुआती समय की परिस्थितियां और कुछ साल बाद की परिस्थितियां एक जैसी नहीं रहतीं। कोयले की कीमत, खनन लागत, परिवहन खर्च, सरकारी नीतियां और न्यायिक फैसलों में बदलाव का सीधा असर परियोजनाओं की आर्थिक गणना पर पड़ सकता है।

PKCL और RRVUNL का विवाद इसी चुनौती का उदाहरण है। जब सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियां लंबे समय के लिए किसी परियोजना में साझेदारी करती हैं, तो अनुबंध में हर संभावित परिस्थिति को पहले से शामिल करना आसान नहीं होता। परिणामस्वरूप बाद में कीमत, लागत और भुगतान से जुड़े विवाद सामने आ सकते हैं।

ऐसे मामलों में आर्बिट्रेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका उद्देश्य यह है कि कारोबारी विवादों का समाधान विशेषज्ञ और अपेक्षाकृत प्रभावी प्रक्रिया के जरिए किया जाए। लेकिन इसके लिए आर्बिट्रेटर पर दोनों पक्षों का भरोसा होना भी जरूरी है।

मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति से जस्टिस एस.के. कौल को नया आर्बिट्रेटर नियुक्त कर एक व्यावहारिक रास्ता निकाला है। अब सबसे बड़ी उम्मीद यही होगी कि मूल विवाद व्यक्तिगत या संस्थागत टकराव के बजाय दस्तावेजों, अनुबंध की शर्तों और कानून के आधार पर आगे बढ़े।

इस तरह के मामलों में अंतिम समाधान सिर्फ संबंधित कंपनियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं से जुड़े होने के कारण पारदर्शिता और जवाबदेही के लिहाज से भी इसकी अहमियत बढ़ जाती है।

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