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New York: मोहन भागवत के बयान पर नई बहस, मुस्लिम-सिख-ईसाई समुदायों के लिए ‘समान नागरिकता’ का सवाल फिर सामने

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | मोहन भागवत के न्यूयॉर्क भाषण में मुस्लिमों को लेकर दिए बयान के बाद धार्मिक विविधता, समान नागरिकता और अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को लेकर नई बहस शुरू हुई।

नई दिल्ली, 1 सितंबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में दिए भाषण ने भारत में धार्मिक विविधता, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और अल्पसंख्यक समुदायों की बराबर हिस्सेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि भारत में मुसलमानों के नहीं रहने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति हिंदू नहीं रह सकता। उन्होंने विविधता को स्वीकार करने और अलग-अलग आस्थाओं के सम्मान को भी जरूरी बताया।

भागवत ने अपने 2018 के दिल्ली व्याख्यानों का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय कुछ मुस्लिम लोगों ने उनसे सवाल किया था कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में मुसलमानों के लिए क्या जगह होगी और क्या उन्हें देश से बाहर कर दिया जाएगा। भागवत के मुताबिक, उन्होंने तब भी कहा था कि मुसलमानों को भारत से बाहर करने की सोच हिंदुत्व की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

न्यूयॉर्क के भाषण में उन्होंने भारत की विविधता को देश की विशेषता बताते हुए कहा कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और जीवन पद्धतियों के बावजूद मानवता एक है। उनका संदेश ऐसे समय आया है जब भारत में धार्मिक पहचान और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस लगातार जारी है।

बयान का सकारात्मक पक्ष क्या है?

भागवत के बयान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जिसमें उन्होंने मुस्लिमों को भारत से बाहर करने की सोच को हिंदुत्व की भावना के विपरीत बताया। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि RSS की विचारधारा को लेकर लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में गैर-हिंदू समुदायों की संवैधानिक और सामाजिक स्थिति क्या होगी।

न्यूयॉर्क में भागवत ने विविधता को केवल स्वीकार करने की बात नहीं कही, बल्कि उसे सम्मान और संरक्षण देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके इस संदेश को समर्थक RSS की उस कोशिश के तौर पर देख रहे हैं जिसमें संगठन हिंदुत्व की अपनी व्याख्या को समावेशी और व्यापक रूप में दुनिया के सामने रखना चाहता है।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि किसी भी विचार की वास्तविक परीक्षा उसके सार्वजनिक वक्तव्य से आगे जाकर उसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव में होती है। इसी वजह से भागवत के न्यूयॉर्क बयान को लेकर बहस केवल एक भाषण तक सीमित नहीं है।

मुस्लिम समुदाय के नजरिये से बड़ा सवाल

मुस्लिम समुदाय के नजरिये से इस बयान का स्वागत करने के साथ एक दूसरा सवाल भी उठाया जा सकता है। अगर किसी समुदाय की सुरक्षा या स्वीकार्यता को बहुसंख्यक समाज की धार्मिक सोच से जोड़ा जाए, तो क्या वह संवैधानिक समानता की पूरी तस्वीर पेश करता है?

भारत का संविधान नागरिकता और अधिकारों को किसी धर्म की स्वीकृति पर आधारित नहीं करता। इस नजरिये से मुस्लिम नागरिकों के लिए मुद्दा केवल यह नहीं है कि उन्हें भारत में रहने की अनुमति या सुरक्षा मिले, बल्कि यह भी है कि उन्हें देश के बराबर नागरिक के रूप में देखा जाए।

भागवत ने अपने भाषण में भारत द्वारा अलग-अलग समुदायों को शरण देने की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख किया। आलोचना करने वालों का तर्क है कि भारतीय मुसलमानों को केवल ऐसे समुदाय के रूप में देखना, जिन्हें भारत ने ‘शरण’ दी, इतिहास की व्यापक तस्वीर को सीमित कर सकता है। मुस्लिम समाज का भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई, राजनीतिक और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में लंबे समय से योगदान रहा है।

इसलिए बहस का एक हिस्सा यह है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की भाषा से आगे बढ़कर उन्हें बराबर के नागरिक और राष्ट्र के समान हिस्सेदार के रूप में देखने की भाषा कितनी स्पष्ट होनी चाहिए।

सिख समुदाय को लेकर अलग सवाल

भागवत के न्यूयॉर्क भाषण की उपलब्ध रिपोर्टों में मुस्लिमों और धार्मिक विविधता पर विस्तार से चर्चा मिलती है, लेकिन सिख समुदाय को लेकर कोई समान रूप से स्पष्ट टिप्पणी सामने नहीं आती। यही बिंदु अब एक अलग बहस को जन्म दे रहा है।

सिख समुदाय के इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता और दूसरे समुदायों के अधिकारों की रक्षा की महत्वपूर्ण परंपरा रही है। गुरु तेग बहादुर की शहादत को इसी संदर्भ में अक्सर याद किया जाता है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दिया था, भले ही जिस समुदाय के अधिकार की रक्षा की जा रही थी, वह स्वयं सिख समुदाय नहीं था।

यही कारण है कि सिख समुदाय से जुड़े विमर्श में केवल ‘सुरक्षा’ नहीं बल्कि अपनी अलग धार्मिक पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व की स्वीकृति भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

RSS से जुड़े पुराने विवादों में सिख धर्म को हिंदू धर्म का हिस्सा बताए जाने को लेकर आपत्तियां सामने आती रही हैं। बाद के वर्षों में संगठन की ओर से सिख धर्म को अलग धर्म मानने की बातें भी सामने आईं। इसलिए इस विषय पर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट और बिना किसी शर्त के संवाद को महत्वपूर्ण माना जाता है।

ईसाई समुदाय के लिए भी यही कसौटी

ईसाई समुदाय के संदर्भ में भागवत का संदेश दोस्ती, संवाद और सेवा की भाषा पर केंद्रित रहा। लेकिन यहां भी एक सवाल उठता है कि धार्मिक सद्भाव की बात मंच से कही जाने के बाद उसका प्रभाव जमीनी स्तर पर किस तरह दिखाई देता है।

भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून, धार्मिक स्वतंत्रता और ईसाई संस्थानों से जुड़े विवाद समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय बनते रहे हैं। ऐसे में ईसाई समुदाय के लिए भी यह महत्वपूर्ण सवाल है कि उसे केवल संरक्षण पाने वाले समुदाय के रूप में देखा जाता है या संविधान के तहत समान अधिकार रखने वाले नागरिक समूह के रूप में।

यही अंतर ‘सुरक्षा’ और ‘समानता’ की बहस को अलग करता है।

तीनों समुदायों के सवाल में क्या समानता है?

मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों से जुड़े नजरिये अलग-अलग होने के बावजूद बहस का एक साझा बिंदु सामने आता है। सवाल यह है कि क्या अल्पसंख्यक समुदायों को केवल बहुसंख्यक समाज की उदारता या संरक्षण के भरोसे देखा जाएगा, या उनकी बराबरी को एक स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

किसी समुदाय की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र में नागरिक अधिकार केवल सुरक्षा देने वाले की इच्छा पर निर्भर नहीं होते। संविधान नागरिकों को समान अधिकार देता है और राज्य से अपेक्षा करता है कि वह सभी के साथ समान व्यवहार करे।

इसीलिए भागवत का यह बयान कि मुसलमानों को भारत से बाहर करने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति हिंदू नहीं रह सकता, निश्चित रूप से महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक संदेश है। लेकिन आलोचकों के लिए अगला सवाल यह है कि क्या इसी स्पष्टता के साथ सभी धार्मिक समुदायों के स्वतंत्र अस्तित्व और समान नागरिक अधिकारों की बात भी सार्वजनिक रूप से कही जाएगी।

बहस का असली केंद्र

मोहन भागवत का न्यूयॉर्क भाषण RSS की अंतरराष्ट्रीय पहुंच और संगठन की समावेशी छवि को सामने रखने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। कार्यक्रम से पहले न्यूयॉर्क में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे और कुछ संगठनों ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्ति जताई थी।

ऐसे माहौल में भागवत का मुस्लिमों को लेकर दिया गया बयान निश्चित रूप से चर्चा के योग्य है। लेकिन किसी भाषण का मूल्यांकन केवल एक अच्छे वाक्य से नहीं, बल्कि उसके व्यापक संदेश और उसके बाद होने वाली कार्रवाई से भी किया जाता है।

भारत जैसे बहुधार्मिक देश में सबसे मजबूत संदेश वह होगा जिसमें किसी समुदाय को ‘सुरक्षित’ करने की बात के साथ-साथ यह भी स्पष्ट हो कि हर नागरिक इस देश का बराबर का नागरिक है। किसी की नागरिकता किसी दूसरे समुदाय की सहमति से नहीं आती और न ही किसी धार्मिक पहचान के बदलने से उसके अधिकार कम या ज्यादा होने चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां भागवत के न्यूयॉर्क भाषण से आगे की बहस शुरू होती है—क्या धार्मिक विविधता को केवल स्वीकार किया जाएगा या हर धर्म के अनुयायियों की समान नागरिक हिस्सेदारी को भी उतनी ही स्पष्टता से स्वीकार किया जाएगा?

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