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West Bengal Politics: ममता बनर्जी के सामने TMC नाम-चिह्न का संकट, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पश्चिम बंगाल में TMC के नाम और चुनाव चिह्न पर चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले के बाद ममता बनर्जी के गुट को नए नाम और प्रतीक के साथ उपचुनाव लड़ना होगा।

पश्चिम बंगाल, 21 सितंबर 2026, Alam Ki Khabar: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहा विवाद अब नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव के बीच और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को अलग नाम और नया चुनाव चिन्ह मिला है। इसी बीच नंदीग्राम में ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे के नामांकन वापस लेने के बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया है। नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है।

चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले से बदली पार्टी की पहचान

17 सितंबर को चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे संगठनात्मक विवाद को देखते हुए पार्टी के मूल नाम और पारंपरिक चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगा दी। आयोग ने आगामी उपचुनाव को देखते हुए दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह उपलब्ध कराया।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिन्ह दिया गया है। वहीं अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है। यह व्यवस्था फिलहाल अंतरिम है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि चुनाव आयोग ने स्थायी रूप से किसी एक गुट को मूल तृणमूल कांग्रेस का मालिकाना हक दे दिया है।

चुनाव आयोग के सामने मूल नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह को लेकर अंतिम फैसला अभी बाकी है। दोनों गुटों के दावों की प्रक्रिया चुनाव चिह्न संबंधी नियमों के तहत आगे बढ़ रही है।

ममता गुट ने नंदीग्राम में बदला अपना फैसला

नंदीग्राम उपचुनाव में ममता बनर्जी के गुट ने पहले संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन उन्होंने बाद में अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने घोषणा की कि उनका गुट नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करेगा।

ममता बनर्जी ने कहा कि नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला व्यापक विपक्षी एकजुटता के मद्देनजर लिया गया है। रेजीनगर सीट पर अपने गुट की रणनीति को लेकर उन्होंने बाद में निर्णय की बात कही।

नामांकन वापस लेने से पहले संचिता प्रधान डे की पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात भी हुई थी। इसके बाद उनके चुनाव मैदान से हटने को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई।

समर्थन के कुछ ही समय बाद कांग्रेस उम्मीदवार की गिरफ्तारी

नंदीग्राम में ममता बनर्जी की ओर से कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन दिए जाने के बाद मिलन प्रधान की गिरफ्तारी की खबर सामने आई। उन्हें नंदीग्राम से जुड़े पुराने हत्या मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया। यह मामला वर्ष 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन के समय हुई घटना से जुड़ा बताया गया है।

गिरफ्तारी के समय को लेकर कांग्रेस और ममता गुट की ओर से सवाल उठाए गए हैं। वहीं पुलिस कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के तहत बताया गया है। इस घटनाक्रम के बाद नंदीग्राम उपचुनाव का राजनीतिक माहौल और अधिक चर्चा में आ गया है।

करीब तीन दशक पुरानी राजनीतिक पहचान पर संकट

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर की थी। पार्टी ने धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। पार्टी का पारंपरिक चुनाव चिन्ह भी लंबे समय से ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान का हिस्सा रहा है।

1998 के लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक सफर आगे बढ़ता गया। पार्टी ने केंद्र की राजनीति में भी भूमिका निभाई और बाद में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के खिलाफ मुख्य राजनीतिक ताकत के रूप में अपनी जगह बनाई।

2011 में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की और वाम मोर्चे के 34 वर्ष लंबे शासन का अंत हुआ। इसके बाद 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी ने सरकार बनाई।

इसी लंबे राजनीतिक सफर के कारण पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह केवल चुनावी औपचारिकता नहीं बल्कि उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

संगठन पर नियंत्रण को लेकर बढ़ा विवाद

मौजूदा विवाद की जड़ पार्टी के भीतर हुए संगठनात्मक टकराव में है। 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के भीतर एक अलग गुट ने नेतृत्व और संगठनात्मक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। ऋतब्रत बनर्जी इस विरोधी खेमे के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे।

विरोधी गुट ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर अपना दावा पेश किया और राष्ट्रीय कार्यसमिति को लेकर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर ममता बनर्जी के गुट ने इस प्रक्रिया की वैधता पर आपत्ति जताई।

विवाद का एक बड़ा मुद्दा राष्ट्रीय कार्यसमिति के कार्यकाल को लेकर है। विरोधी पक्ष का दावा है कि कार्यसमिति का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका था, जबकि ममता गुट ने पार्टी के नियमों के आधार पर कार्यसमिति के जारी रहने की बात कही।

इसी विवाद के बीच दोनों पक्षों की गतिविधियां चुनाव आयोग तक पहुंचीं और अंततः आगामी उपचुनावों को देखते हुए आयोग ने अंतरिम व्यवस्था लागू की।

अदालत तक पहुंचा संगठनात्मक विवाद

तृणमूल कांग्रेस के संगठन को लेकर विवाद अदालत तक भी पहुंचा। न्यायिक स्तर पर पार्टी की संगठनात्मक गतिविधियों और विशेष अधिवेशन से जुड़े मुद्दों पर आदेश सामने आए। हालांकि चुनाव चिन्ह और पार्टी के आरक्षित नाम को लेकर अंतिम अधिकार चुनाव आयोग की प्रक्रिया से जुड़ा है।

ममता बनर्जी के गुट ने चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को स्वीकार करते हुए नए नाम और चुनाव चिन्ह के साथ उपचुनाव की प्रक्रिया में हिस्सा लेने की तैयारी की, लेकिन साथ ही मूल नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर आयोग के आदेश को चुनौती भी दी है।

मामला अब न्यायिक प्रक्रिया में भी है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग और अदालत दोनों स्तरों पर होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

नंदीग्राम में राजनीतिक समीकरण बदला

नंदीग्राम पहले से ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र रहा है। अब उपचुनाव में ममता गुट के अपने उम्मीदवार को हटाकर कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने के फैसले ने मुकाबले को नया रूप दे दिया है।

ममता बनर्जी ने कहा है कि रेजीनगर को लेकर फैसला बाद में लिया जाएगा। इस तरह फिलहाल नंदीग्राम में ममता गुट की चुनावी भूमिका सीधे उम्मीदवार उतारने के बजाय कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन के रूप में सामने आई है।

इस घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू यह है कि तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस पश्चिम बंगाल में लंबे समय से अलग-अलग राजनीतिक रास्ते पर चुनाव लड़ते रहे हैं। ऐसे में नंदीग्राम में मौजूदा परिस्थितियों के बीच दोनों के बीच समर्थन का यह फैसला राज्य की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।

2029 की राजनीति को लेकर भी चर्चा

ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के फैसले को व्यापक विपक्षी एकजुटता से जोड़कर पेश किया है। इससे आने वाले समय में विपक्षी दलों के बीच संबंधों को लेकर राजनीतिक चर्चा भी तेज हुई है।

हालांकि इस फैसले को भविष्य के किसी निश्चित गठबंधन का अंतिम संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी। रेजीनगर को लेकर ममता गुट का फैसला और आगे की राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी।

असली लड़ाई अब पार्टी की राजनीतिक विरासत की

तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद अब केवल दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव तक सीमित नहीं है। पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह, संगठनात्मक ढांचा, विधायक दल, पार्टी कार्यालय, संपत्ति और कार्यकर्ताओं का नेटवर्क जैसे कई मुद्दे इस संघर्ष से जुड़े हुए हैं।

ममता बनर्जी के लिए चुनौती यह है कि आगामी उपचुनाव में उनके गुट को पारंपरिक नाम और चुनाव चिन्ह के बजाय नई पहचान के साथ मतदाताओं के बीच जाना होगा। वहीं दूसरे गुट के लिए भी अपनी संगठनात्मक दावेदारी को राजनीतिक रूप से स्थापित करना चुनौती होगी।

चुनाव आयोग की मौजूदा व्यवस्था अंतरिम है। इसलिए अभी यह तय नहीं हुआ है कि अंतिम तौर पर मूल पार्टी नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलेगा।

आगे क्या होगा?

अब पूरे विवाद की अगली दिशा दो स्तरों पर तय होगी। पहला, चुनाव आयोग पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अंतिम प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ाता है। दूसरा, ममता बनर्जी के गुट की ओर से दायर कानूनी चुनौती पर अदालत में क्या निर्णय सामने आता है।

इस बीच 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव तत्काल राजनीतिक परीक्षा का मैदान बने हुए हैं। नंदीग्राम में ममता गुट के कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने के फैसले और पार्टी की नई चुनावी पहचान के कारण इस उपचुनाव पर पूरे राज्य की नजर है।

तृणमूल कांग्रेस की करीब तीन दशक पुरानी राजनीतिक पहचान से जुड़ा यह विवाद फिलहाल अंतरिम चरण में है। आने वाले चुनावी और कानूनी घटनाक्रम ही यह स्पष्ट करेंगे कि यह केवल उपचुनाव तक सीमित अस्थायी व्यवस्था रहती है या पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में लंबे समय तक असर डालती है।

Editorial: नाम और चुनाव चिन्ह की लड़ाई से आगे बढ़ा तृणमूल विवाद

राजनीतिक दलों के लिए संगठन और चुनावी पहचान दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। तृणमूल कांग्रेस के मामले में नाम और चुनाव चिन्ह का विवाद इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि पार्टी की स्थापना से लेकर पश्चिम बंगाल में सत्ता तक पहुंचने के सफर में इनकी पहचान लगातार जुड़ी रही है।

फिलहाल चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के लिए अंतरिम व्यवस्था की है और अंतिम फैसला अभी बाकी है। ऐसे में नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव केवल चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं रह गए हैं। इन चुनावों के साथ पार्टी के संगठन, राजनीतिक पहचान और भविष्य की दिशा से जुड़े सवाल भी जुड़े हुए हैं।

आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की अंतिम प्रक्रिया और न्यायिक सुनवाई से यह तस्वीर और स्पष्ट होगी।

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