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Politics News: ज्ञानेश कुमार विवाद में पीयूष गोयल ने उठाए पुराने सवाल, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका चर्चा में

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद के बीच पीयूष गोयल ने पूर्व चुनाव आयुक्तों की राजनीतिक भूमिका और सरकारी नियुक्तियों पर सवाल उठाए। जानिए टीएन शेषन, एमएस गिल और आरके त्रिवेदी से जुड़े तथ्य।

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका और सेवानिवृत्ति के बाद उनकी नियुक्तियां चर्चा में आ गई हैं। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि पार्टी के शासनकाल में पूर्व चुनाव आयुक्तों को चुनाव लड़ने का टिकट देने और सरकार में मंत्री बनाने जैसे फैसले क्यों लिए गए थे।


13 अक्टूबर को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में गोयल ने टीएन शेषन, एमएस गिल, आरके त्रिवेदी और नवीन चावला के उदाहरण दिए। उनके बयान के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि संवैधानिक पद पर काम करने वाले अधिकारियों के सेवानिवृत्ति के बाद के फैसलों का उनकी निष्पक्षता के संदर्भ में किस तरह मूल्यांकन किया जाना चाहिए।


मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर भी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि बीजेपी विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक हमला बता रही है।


टीएन शेषन ने लड़ा था लोकसभा चुनाव


टीएन शेषन ने दिसंबर 1990 से दिसंबर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में काम किया। उनका कार्यकाल चुनाव आचार संहिता के सख्त पालन और चुनाव आयोग की शक्तियों के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।


पद छोड़ने के बाद शेषन ने राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1997 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा, लेकिन केआर नारायणन से हार गए। इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें गुजरात की गांधीनगर सीट से उम्मीदवार बनाया।


इस चुनाव में उनका मुकाबला बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से हुआ। चुनावी आंकड़ों के अनुसार, आडवाणी को 4,53,229 वोट मिले, जबकि शेषन को 2,64,285 वोट प्राप्त हुए। इस तरह शेषन चुनाव हार गए।


शेषन का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद छोड़ने के बाद सक्रिय चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया। हालांकि, उनके चुनाव लड़ने का तथ्य अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उनके पूर्व कार्यकाल में कोई अनुचित राजनीतिक प्रभाव था।


एमएस गिल बने कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और केंद्रीय मंत्री


एमएस गिल ने दिसंबर 1996 से जून 2001 तक मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी संभाली। उनके कार्यकाल में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम के इस्तेमाल का विस्तार हुआ, हालांकि इसका इस्तेमाल उनके कार्यकाल से पहले शुरू हो चुका था।


सेवानिवृत्ति के बाद गिल कांग्रेस से जुड़े। अप्रैल 2004 में वह पंजाब से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य बने। वर्ष 2008 में उन्हें केंद्र की यूपीए सरकार में युवा मामले और खेल मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया। बाद में उन्होंने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली।


गिल को वर्ष 2000 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था, जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर थे। पीयूष गोयल ने इस सम्मान और बाद में गिल की राजनीतिक भूमिका का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा नहीं होता।


यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि पुरस्कार और नियुक्ति का होना एक तथ्य है, जबकि उन्हें अनुचित राजनीतिक लाभ बताना एक आरोप है। ऐसे आरोपों की पुष्टि के लिए अलग से प्रमाण आवश्यक हैं।


आरके त्रिवेदी को बनाया गया था गुजरात का राज्यपाल


आरके त्रिवेदी ने जून 1982 से दिसंबर 1985 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में काम किया। इसके बाद फरवरी 1986 में उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया।


मुख्य चुनाव आयुक्त का पद छोड़ने और राज्यपाल बनने के बीच लगभग दो महीने का अंतर था। पीयूष गोयल ने इस नियुक्ति का उल्लेख करते हुए कांग्रेस के पुराने फैसलों पर सवाल उठाए।


हालांकि, राज्यपाल के पद पर नियुक्ति और किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ना अलग-अलग परिस्थितियां हैं। दोनों का मूल्यांकन संबंधित नियुक्ति प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।


वीएस रमादेवी भी बनी थीं राज्यपाल


भारत की पहली महिला मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस रमादेवी ने नवंबर 1990 में केवल 15 दिनों तक इस पद पर काम किया था। जुलाई 1997 में उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। बाद में उन्होंने कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली।


उनका उदाहरण बताता है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों को राज्यपाल नियुक्त किए जाने की घटनाएं पहले भी हुई हैं। लेकिन केवल सरकारी पद स्वीकार करने से किसी अधिकारी के राजनीतिक पक्षपात का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।


नवीन चावला को हटाने की हुई थी सिफारिश


पीयूष गोयल ने नवीन चावला का भी उल्लेख किया। वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश की थी। गोपालस्वामी ने उन पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लगाए थे।


हालांकि, सिफारिश के बावजूद चावला को पद से नहीं हटाया गया। वह अप्रैल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने और जुलाई 2010 तक इस पद पर रहे।


इस मामले में सिफारिश और आरोपों को दर्ज तथ्य के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन आरोपों को अपने आप सिद्ध निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।


चुनाव आयुक्तों के लिए प्रतिबंध की मांग क्यों उठी?


पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने वर्ष 2009 में सुझाव दिया था कि चुनाव आयोग के अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी नियुक्तियां स्वीकार करने से रोकने पर विचार किया जाए। उन्होंने राजनीतिक दलों में शामिल होने पर भी एक निश्चित अवधि तक प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया था।


इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य चिंता यह थी कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता के साथ-साथ उसकी निष्पक्ष छवि भी बनी रहनी चाहिए। यदि संवैधानिक पद पर काम करने वाले अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक या सरकारी पद मिलते हैं, तो जनता के मन में संभावित हितों के टकराव को लेकर सवाल उठ सकते हैं।


हालांकि, ऐसे प्रतिबंधों की आवश्यकता और उनकी सीमा तय करना विधायी तथा संवैधानिक बहस का विषय है।


ज्ञानेश कुमार को लेकर क्यों है विवाद?


ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला था। उनके कार्यकाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया।


विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है तथा इससे पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। विपक्ष ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग भी की है।


बीजेपी इन आरोपों को खारिज करती रही है। उसका कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है और विपक्ष इस प्रक्रिया को राजनीतिक मुद्दा बना रहा है।


13 अक्टूबर को पीयूष गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की राजनीतिक भूमिकाओं और सरकारी नियुक्तियों का हवाला देकर कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाए। इस तरह मौजूदा विवाद के साथ चुनाव आयोग के इतिहास को भी राजनीतिक बहस में शामिल कर लिया गया।


निष्पक्षता और जवाबदेही का सवाल


चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची की शुद्धता, चुनाव आचार संहिता का पालन और सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार इसकी प्रमुख जिम्मेदारियां हैं।


पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की राजनीतिक भूमिकाओं और सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियों पर चर्चा इस बड़े सवाल से जुड़ी है कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाए।


इस बहस में राजनीतिक आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। किसी अधिकारी की नियुक्ति, पुरस्कार या चुनाव लड़ने की जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड से जांची जा सकती है, लेकिन उसके पीछे अनुचित राजनीतिक लाभ था या नहीं, इसका निष्कर्ष ठोस प्रमाणों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।


ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद में बीजेपी और विपक्ष दोनों अपने-अपने तर्क सामने रख रहे हैं। अब इस बहस का महत्व इस बात में है कि चुनाव आयोग के कामकाज, मतदाता सूची की प्रक्रिया और संस्थागत निष्पक्षता से जुड़े सवालों का जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर मिले।


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