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Cricket News: 5,000वें वनडे तक पहुंचा क्रिकेट, 55 साल में बदल गई 50 ओवर के खेल की पूरी तस्वीर

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Alam Ki Khabar | Cricket News | ODI Cricket | 5,000वें वनडे के साथ वनडे क्रिकेट ने इतिहास रच दिया। 1971 में शुरू हुए इस फॉर्मेट ने 55 साल में रंगीन जर्सी, डे-नाइट मैच, DRS, DLS और पावरप्ले जैसे कई बड़े बदलाव देखे।

स्पोर्ट्स डेस्क, 8 अगस्त। क्रिकेट के इतिहास में वनडे फॉर्मेट ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। शुक्रवार को स्कॉटलैंड और कनाडा के बीच मुकाबले के साथ अंतरराष्ट्रीय वनडे मैचों की संख्या 5,000 तक पहुंच गई। ऐतिहासिक मुकाबले में स्कॉटलैंड ने कनाडा को 9 रन से हराकर इस खास मैच को अपने नाम कर लिया।

वनडे क्रिकेट का सफर हालांकि किसी लंबी योजना के तहत शुरू नहीं हुआ था। 5 जनवरी 1971 को ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर खेला गया मुकाबला मूल रूप से एक टेस्ट का विकल्प था। बारिश के कारण टेस्ट मैच का अधिकांश हिस्सा खराब हो गया था और दर्शकों को निराश लौटने से बचाने के लिए सीमित ओवर का मैच कराया गया।

यही प्रयोग आगे चलकर क्रिकेट के सबसे लोकप्रिय प्रारूपों में शामिल हो गया।

आज वनडे में 50 ओवर की एक पारी होती है, लेकिन इसकी शुरुआत 40-40 ओवर से हुई थी। शुरुआती वर्षों में अलग-अलग देशों में ओवरों की संख्या भी अलग रही। कहीं 35 ओवर तो कहीं 45 या 55 ओवर के मुकाबले खेले गए। पहले दो विश्व कप भी 60-60 ओवर के थे।

धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 50 ओवर का प्रारूप मानक बनता गया और 1996 विश्व कप के बाद इसे वैश्विक स्तर पर स्थायी पहचान मिली।

पैकर युग ने बदल दिया वनडे का रंग

वनडे के विकास में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर की वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट का बड़ा योगदान रहा। 1977 के बाद क्रिकेट में ऐसे बदलाव दिखाई देने लगे, जिन्हें उस दौर में काफी क्रांतिकारी माना गया।

रंगीन कपड़े, फ्लडलाइट में मुकाबले और सफेद गेंद जैसे प्रयोग इसी दौर से जुड़े हैं। दिन-रात के मैचों ने वनडे को दर्शकों के लिए और आकर्षक बनाया। रात में लाल गेंद को देखने में होने वाली परेशानी के कारण सफेद गेंद का इस्तेमाल शुरू हुआ।

1992 का विश्व कप इस बदलाव का बड़ा पड़ाव बना। पहली बार किसी ICC विश्व कप में रंगीन जर्सी, सफेद गेंद और डे-नाइट मैच का इस्तेमाल एक साथ हुआ।

इसके बाद वनडे क्रिकेट की पहचान टेस्ट क्रिकेट से अलग होती चली गई।

बल्लेबाज और गेंदबाज के बीच संतुलन के लिए बदलते रहे नियम

वनडे क्रिकेट में रोमांच बढ़ाने के साथ-साथ नियमों में लगातार बदलाव किए गए। फील्डिंग प्रतिबंध इसी प्रक्रिया का हिस्सा थे।

1979 के एक मुकाबले में इंग्लैंड के कप्तान माइक ब्रियरली ने आखिरी गेंद पर लगभग पूरी फील्ड को सीमा रेखा के पास लगा दिया था। इसके बाद सीमित संख्या में फील्डरों को घेरे के अंदर रखने की व्यवस्था पर जोर बढ़ा।

1992 विश्व कप में फील्डिंग प्रतिबंधों को औपचारिक रूप से लागू किया गया। इसके बाद पावरप्ले की व्यवस्था आई और समय-समय पर इसके नियमों में बदलाव होते रहे।

इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य यह था कि बल्लेबाजों को रन बनाने का मौका मिले और गेंदबाजों के लिए भी मुकाबला पूरी तरह एकतरफा न हो।

बारिश ने दिए क्रिकेट को DLS जैसे नियम

वनडे क्रिकेट में मौसम हमेशा से बड़ी चुनौती रहा। बारिश के कारण मैच छोटा होने पर विजेता तय करने के लिए शुरुआती वर्षों में अलग-अलग तरीके अपनाए जाते थे।

कभी रनरेट देखा जाता था तो कभी पहले की पारी के स्कोर के आधार पर नतीजा निकालने की कोशिश होती थी। लेकिन इन तरीकों में कई बार विवाद की स्थिति पैदा हुई।

आखिरकार गणितीय मॉडल पर आधारित डकवर्थ-लुईस पद्धति सामने आई। बाद में इसमें बदलाव किए गए और यह Duckworth-Lewis-Stern यानी DLS सिस्टम के रूप में इस्तेमाल होने लगी।

आज बारिश से प्रभावित सीमित ओवरों के मैच में लक्ष्य तय करने के लिए DLS दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्रिकेट नियमों में शामिल है।

‘सुपर सब’ का प्रयोग हुआ, लेकिन टिक नहीं पाया

वनडे क्रिकेट में खिलाड़ियों को मैच के दौरान बदलने का प्रयोग भी किया गया। 2005 में ‘सुपर सब’ नियम के जरिए टीमों को अतिरिक्त खिलाड़ी इस्तेमाल करने का मौका दिया गया।

इंग्लैंड के विक्रम सोलंकी इस नियम के तहत मैदान पर उतरने वाले पहले खिलाड़ियों में शामिल रहे। लेकिन इस प्रयोग में कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आईं और इसे ज्यादा समय तक जारी नहीं रखा जा सका।

आज फ्रेंचाइजी क्रिकेट में इम्पैक्ट प्लेयर जैसे नियमों पर बहस होती है, लेकिन सीमित ओवर क्रिकेट में मैच के दौरान खिलाड़ी बदलने का प्रयोग नया नहीं है।

टाई से सुपर ओवर तक पहुंचा वनडे

वनडे में मैच टाई होने पर विजेता तय करने का तरीका भी कई बार बदला। अलग-अलग दौर में विकेटों की संख्या और दूसरे मानकों का इस्तेमाल किया गया।

2011 विश्व कप के बाद नॉकआउट मुकाबलों में सुपर ओवर की व्यवस्था को जगह मिली। 2019 विश्व कप फाइनल में इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच मुकाबला टाई होने के बाद बाउंड्री काउंट नियम को लेकर जबरदस्त बहस हुई।

इसके बाद नियम में बदलाव किया गया। अब टाई की स्थिति में सुपर ओवर के जरिए विजेता तय करने की व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई है।

सफेद गेंद के साथ फिर बदला नियम

सफेद गेंद ने वनडे क्रिकेट को नया रूप दिया, लेकिन इसके साथ एक समस्या भी सामने आई। गेंद कुछ समय बाद जल्दी पुरानी होने लगी। एक समय ऐसा आया जब एक पारी में दो नई गेंदों के इस्तेमाल की व्यवस्था की गई।

इससे बल्लेबाजों को फायदा मिलने लगा और गेंद के पुराना होने के बाद मिलने वाली रिवर्स स्विंग का प्रभाव कम हुआ। गेंदबाजों की चिंताओं को देखते हुए बाद में नियम में फिर बदलाव किया गया।

2025 से गेंदबाजी टीम को पारी के बाद के हिस्से में इस्तेमाल की जा रही गेंदों में से किसी एक पुरानी गेंद को चुनने की सुविधा दी गई। इसका उद्देश्य गेंदबाजों को पुरानी गेंद से मिलने वाली स्विंग का विकल्प देना है।

55 साल में बल्लेबाजी का अंदाज भी बदला

वनडे क्रिकेट के आंकड़े बताते हैं कि बल्लेबाजी का तरीका पिछले पांच दशकों में काफी आक्रामक हुआ है।

शुरुआती 1,000 वनडे में पहली पारी का औसत स्कोर करीब 213.9 रन था। पिछले 1,000 मैचों में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 249.97 रन हो गया।

300 से ज्यादा रन बनाना भी कभी बड़ी उपलब्धि माना जाता था। लेकिन अब वनडे में 300 प्लस स्कोर लगातार देखने को मिलते हैं। पिछले 1,000 मैचों में ही 300 से अधिक के 321 स्कोर दर्ज हुए हैं। इनमें 86 बार टीमों ने 350 रन का आंकड़ा भी पार किया।

बल्लेबाजी औसत और स्ट्राइक रेट में भी लगातार वृद्धि हुई है। शुरुआती दौर में जहां छक्के अपेक्षाकृत कम देखने को मिलते थे, वहीं आधुनिक वनडे में बड़े शॉट खेलना बल्लेबाजी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

T20 के दौर में भी वनडे की अहमियत कायम

2007 में T20 विश्व कप की शुरुआत और उसके बाद दुनिया भर में फ्रेंचाइजी लीगों के विस्तार ने क्रिकेट कैलेंडर को बदल दिया। द्विपक्षीय वनडे सीरीज की संख्या कई जगह कम हुई, लेकिन बड़े ICC टूर्नामेंटों में वनडे का महत्व बना हुआ है।

वनडे विश्व कप और चैंपियंस ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंट अब भी खिलाड़ियों और टीमों के लिए प्रतिष्ठा का बड़ा मंच हैं।

T20 की तेजी और टेस्ट क्रिकेट की परंपरा के बीच वनडे ने खुद को संतुलित प्रारूप के रूप में बनाए रखा है। इसमें रणनीति के लिए पर्याप्त समय भी है और मैच के भीतर तेजी से बदलाव की गुंजाइश भी।

5,000वां वनडे: एक प्रयोग से क्रिकेट इतिहास तक

शुक्रवार को स्कॉटलैंड और कनाडा के बीच खेला गया मुकाबला केवल एक और वनडे नहीं था। यह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट इतिहास का 5,000वां वनडे मैच था।

स्कॉटलैंड ने इस ऐतिहासिक मुकाबले में कनाडा को 9 रन से हराया और 5,000वें वनडे की जीत दर्ज करने वाली टीम बन गई।

55 साल पहले बारिश से प्रभावित टेस्ट की भरपाई के लिए शुरू हुआ सीमित ओवर का प्रयोग आज 5,000 अंतरराष्ट्रीय मैचों का सफर पूरा कर चुका है। इस दौरान क्रिकेट ने रंगीन जर्सी से लेकर सफेद गेंद, डे-नाइट मुकाबले, पावरप्ले, DRS, DLS और सुपर ओवर तक का सफर तय किया।

वनडे का इतिहास दरअसल क्रिकेट के लगातार बदलते रहने की कहानी भी है। यह फॉर्मेट हर दौर की जरूरत के हिसाब से अपने नियम बदलता रहा और इसी वजह से आज भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसकी अलग पहचान बनी हुई है।

वनडे क्रिकेट के सफर के बड़े पड़ाव

1971: पहला वनडे ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया।

1977: वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट के जरिए रंगीन जर्सी और डे-नाइट क्रिकेट जैसे प्रयोगों को बढ़ावा मिला।

1979: विश्व कप के शुरुआती संस्करणों में 60 ओवर का प्रारूप रहा।

1987: विश्व कप में पहली बार 50 ओवर का प्रारूप अपनाया गया।

1992: रंगीन जर्सी, सफेद गेंद और डे-नाइट मैच का बड़ा दौर शुरू हुआ।

1997: डकवर्थ-लुईस पद्धति का इस्तेमाल शुरू हुआ।

2005: सुपर सब का प्रयोग किया गया।

2011: विश्व कप नॉकआउट में सुपर ओवर व्यवस्था को जगह मिली।

2025: पुरानी गेंद के इस्तेमाल से जुड़ा नियम बदला गया।

2026: स्कॉटलैंड-कनाडा मुकाबले के साथ 5,000 अंतरराष्ट्रीय वनडे पूरे हुए।

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क्रिकेट के इतिहास, वनडे, टेस्ट और T20 से जुड़ी खास रिपोर्ट Alam Ki Khabar पर पढ़ें।

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