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“सिविल सर्जन पर सवाल, अवैध अस्पताल बेलगाम—कौन लेगा जिम्मेदारी?”

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Amardeep Narayan Prasad

समस्तीपुर जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था इलाज नहीं, बल्कि लापरवाही और भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बनती जा रही है। अवैध रूप से संचालित सैकड़ों निजी अस्पतालों में मरीजों की जान जा रही है, हंगामे हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूरी हो रही है।
ताजा आंकड़े खुद स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल रहे हैं। जिले के 218 निजी अस्पतालों को शो-कॉज नोटिस जारी किया गया, लेकिन केवल 38 अस्पतालों ने ही जवाब देना जरूरी समझा। सवाल यह है कि बाकी अस्पतालों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? जवाब—लगभग शून्य।
बिना निबंधन धड़ल्ले से चल रहे अस्पताल, सिविल सर्जन मौन
जिले में मात्र 143 निजी अस्पताल ही पंजीकृत हैं, जबकि हर प्रखंड और शहर की गलियों में दर्जनों अवैध अस्पताल खुलेआम चल रहे हैं। कई प्रखंड ऐसे हैं जहां एक भी अस्पताल को स्वास्थ्य विभाग से मान्यता नहीं मिली, फिर भी ऑपरेशन, प्रसव और गंभीर इलाज धड़ल्ले से किए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि,जब से वर्तमान सिविल सर्जन ने समस्तीपुर में पदभार संभाला है, तब से अस्पताल प्रबंधन की मनमानी और विभागीय भ्रष्टाचार खुलकर सामने आ रहा है।
शो-कॉज, एफआईआर और सीलिंग की कार्रवाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है, कुछ दिन बाद वही अस्पताल नए नाम से फिर शुरू हो जाते हैं।
लापरवाही से मौतें, लेकिन कार्रवाई ठप
बीते कुछ ही दिनों में कई गंभीर घटनाएं सामने आईं—
20 दिसंबर: कल्याणपुर क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में गर्भवती महिला के इलाज में लापरवाही, गलत जांच और दवा का आरोप, मृत शिशु का जन्म।
24 दिसंबर: मुसरीघरारी थाना क्षेत्र के हरपुर फ्लौथ स्थित अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत, गुस्साए परिजनों का हंगामा।
25 दिसंबर: शहर के सरोजनी गली स्थित निजी अस्पताल में इलाज के दौरान महिला की मौत, डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप।
हर बार हंगामा होता है, प्रशासन पहुंचता है, आश्वासन देता है—और फिर सब शांत।
फर्जी डॉक्टर, नामी बोर्ड और सेहत का छल
जिले में कई ऐसे निजी अस्पताल चल रहे हैं जहां बिना डिग्री वाले लोग डॉक्टर बनकर इलाज कर रहे हैं। बड़े-बड़े बोर्ड, नामी डॉक्टरों के नाम, और अंदर हकीकत पूरी तरह फर्जी।
कई संचालक खुद को MBBS बताते हैं, लेकिन जांच में न डिग्री मिलती है, न वैध कागजात।
कल्याणपुर का मामला इसका ताजा उदाहरण है, जहां फर्जी दस्तावेजों के सहारे अस्पताल चलाया जा रहा था।
शो-कॉज से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा विभाग?
स्वास्थ्य विभाग ने अवैध अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की बात तो की, लेकिन हकीकत यह है कि—
218 को नोटिस
सिर्फ 38 जवाब
महज 8 अस्पताल सील
बाकी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या विभागीय मिलीभगत है?
क्या सिविल सर्जन की कुर्सी जवाबदेही से ऊपर है?
सबसे बड़ा सवाल
जब मरीज मरते हैं, तब हंगामा होता है।
जब हंगामा शांत होता है, तब फाइलें दबा दी जाती हैं।
आखिर कब टूटेगा अवैध निजी अस्पतालों का यह मौत का नेटवर्क?
और कब तय होगी सिविल सर्जन की जिम्मेदारी?
समस्तीपुर में सेहत नहीं, सिस्टम बीमार है — और इलाज अब भी फाइलों में बंद है।

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