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बिहार में अपराध और राजनीति का गहरा कनेक्शन

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पटना।बिहार में अपराध केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि कई बार इसका राजनीति और स्थानीय सत्ता से भी गहरा रिश्ता जुड़ा पाया जाता है। हत्या, लूट-छिनतई, शराब तस्करी और जमीन विवाद के मामलों में राजनीतिक संरक्षण और दबदबा देखा जाता है, जिससे कार्रवाई धीमी या कमजोर रह जाती है।
ग्रामीण थाना क्षेत्रों में भूमि विवाद, पंचायत-level रंजिश और पुरानी अदावत अक्सर हत्या और गंभीर मारपीट का कारण बनती हैं। कई बार प्रभावित इलाके के नेता या प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव के चलते मुकदमे दर्ज करने में देरी होती है। गवाह डर या दबाव के कारण बयान देने से कतराते हैं, जिससे अपराधियों का हौसला बढ़ता है।
शहरी थाना क्षेत्रों में लूट, वाहन चोरी और साइबर अपराध में भी राजनीतिक कनेक्शन देखने को मिलता है। बाइक गिरोह और स्थानीय गिरोहों को कभी-कभी राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त रहती है। भीड़भाड़ वाले बाजार, रेलवे स्टेशन और एटीएम सेंटर अपराधियों के लिए आसान निशाना बनते हैं।
सीमावर्ती और ग्रामीण थाना क्षेत्रों में शराब तस्करी और अवैध परिवहन में राजनीतिक संरक्षण अपराध को बढ़ावा देता है। इसके कारण पुलिस कार्रवाई धीमी रहती है, और कई बार थाने-वार गश्ती और छापेमारी सीमित प्रभाव डालती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अपराध-राजनीति कनेक्शन के कारण पुलिस की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, जनता का भरोसा कमजोर होता है, और अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। वे कहते हैं कि प्रभावी नियंत्रण के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वतंत्र जांच के साथ-साथ थाना-वार रणनीति और मुखबिर नेटवर्क जरूरी है।
निष्कर्ष
बिहार में अपराध पर नियंत्रण केवल पुलिस तक सीमित नहीं। राजनीति, प्रशासन और समाज का सहयोग अपराध नियंत्रण की असली कुंजी है। बिना इसे ध्यान में रखे कार्रवाई सिर्फ सीमित असर ही डाल सकती है।

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