बिहार की राजनीति एक बार फिर जमीन के बदले नौकरी मामले को लेकर गर्मा गई है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर चार्जशीट में A-7 के रूप में नामजद भोला यादव को लेकर राजनीतिक हलकों में खलबली मची हुई है। भोला यादव वही नाम हैं जिन्हें लंबे समय से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का सबसे भरोसेमंद सहयोगी और “हनुमान” कहा जाता रहा है।
CBI की जांच में दावा किया गया है कि भोला यादव केवल एक कर्मचारी नहीं थे, बल्कि कथित तौर पर पूरे जमीन-नौकरी सौदे के नेटवर्क की रीढ़ थे। जिस समय लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे, उस दौरान भोला यादव विशेष कार्य अधिकारी (OSD) के तौर पर तैनात थे और इसी पद का इस्तेमाल कर कथित सौदों को जमीन पर उतारा गया।
महुआबाग से गांव-गांव तक फैला नेटवर्क
जांच एजेंसी के अनुसार, पटना से सटे महुआबाग इलाके से इस पूरे तंत्र का संचालन किया जाता था। जमीन चिन्हित करने से लेकर जमीन मालिकों से संपर्क, भरोसेमंद माध्यमों के जरिए रेलवे में नौकरी का लालच देना और फिर पूरा ब्योरा डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज करना—यह सब कथित तौर पर भोला यादव की निगरानी में होता था।
CBI का कहना है कि भोला यादव खुद कई गांवों में जाकर लोगों से मिलते थे और यह संदेश देते थे कि अगर रेलवे में नौकरी चाहिए तो जमीन लालू प्रसाद यादव या उनके परिजनों के नाम ट्रांसफर करनी होगी। कई मामलों में जमीन देने वालों के रिश्तेदारों को ग्रुप-डी की नौकरी मिलने का भी दावा किया गया है।
गवाहों के बयान और डिजिटल सबूत बने आधार
चार्जशीट में कई गवाहों के बयान को अहम बताया गया है। एक गवाह के अनुसार, भोला यादव के गांव पहुंचने से पहले ही लोगों को संकेत मिल जाता था कि सौदा तय है और सवाल-जवाब की कोई गुंजाइश नहीं है। वहीं, एक अन्य गवाह ने दावा किया है कि लालू के कैंप कार्यालय से ही उम्मीदवारों की जानकारी कंप्यूटर में दर्ज करवाई जाती थी, जो बाद में एक्सेल शीट के रूप में बरामद हुई।
CBI को जांच के दौरान हार्ड डिस्क और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी मिले हैं, जिससे एजेंसी का दावा और मजबूत हुआ है कि यह महज आरोप नहीं, बल्कि सुनियोजित प्रक्रिया थी।
गंभीर धाराओं में आरोप, अब नजर अदालत पर
CBI ने भोला यादव के खिलाफ IPC की धारा 420, 120B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप तय करने की सिफारिश की है। जांच एजेंसी का मानना है कि भोला यादव सत्ता के केंद्र में रहकर फैसलों को अंजाम तक पहुंचाने की भूमिका निभा रहे थे।
अब बड़ा सवाल यही है कि भोला यादव सिर्फ आदेश मानने वाले अधिकारी थे या फिर पूरे कथित घोटाले के रणनीतिक संचालक? इसका जवाब अदालत के फैसले में मिलेगा, लेकिन फिलहाल इस मामले ने बिहार की राजनीति में नई हलचल और बहस को जन्म दे दिया है।