मुंबई नगर निकाय यानी बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बार भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सभी दलों को पीछे छोड़ दिया और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई। चुनावी मैदान में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की संयुक्त रणनीति कोई कमाल नहीं दिखा सकी, जबकि महायुति ने स्पष्ट बढ़त हासिल कर ली।
ठाकरे भाइयों का दांव नहीं चला
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने पहली बार मिलकर चुनाव लड़ा था। माना जा रहा था कि दोनों की एकजुटता से मराठी वोट बैंक एक तरफ आएगा, लेकिन परिणाम इसके उलट रहे। बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना ने मिलकर बहुमत के आंकड़े को पार कर लिया।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी ने 89 सीटें जीतीं, जबकि शिंदे गुट को 29 सीटें मिलीं। दोनों को मिलाकर महायुति के खाते में 118 सीटें आईं, जो बहुमत के लिए जरूरी 114 से अधिक हैं। वहीं उद्धव गुट को 65, कांग्रेस को 24 और अन्य दलों को सीमित सफलता मिली।
हार के बाद शुरू हुआ आरोप–प्रत्यारोप
चुनावी नतीजों के बाद शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने सीधे डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि यदि शिंदे ने शिवसेना से बगावत न की होती तो मुंबई में बीजेपी का मेयर बनना असंभव था। राउत ने शिंदे की तुलना ‘जयचंद’ से करते हुए उन्हें विश्वासघाती करार दिया।
राउत ने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी हर राज्य में दलों को तोड़कर सत्ता हासिल करती है और यही राजनीति महाराष्ट्र में भी दोहराई गई।
निशिकांत दुबे का पलटवार
राउत के इस बयान पर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने संजय राउत को “नारद मुनि और मंथरा का मिला-जुला रूप” बताते हुए कहा कि उनकी राजनीति केवल भ्रम फैलाने और टकराव बढ़ाने की है। दुबे ने कहा कि जनता ने विकास के नाम पर वोट दिया है, न कि भावनात्मक भाषणों पर।
2022 से चल रही है सियासी तल्खी
संजय राउत और एकनाथ शिंदे के बीच टकराव नया नहीं है। वर्ष 2022 में शिंदे द्वारा शिवसेना के अधिकांश विधायकों के साथ अलग होकर बीजेपी के साथ सरकार बनाने के बाद से यह विवाद लगातार गहराता गया। उद्धव गुट शिंदे को गद्दार बताता रहा है, जबकि शिंदे गुट खुद को असली शिवसेना होने का दावा करता है।
महाराष्ट्र की राजनीति में नया अध्याय
बीएमसी चुनाव के ये नतीजे न केवल मुंबई की सत्ता का समीकरण बदलेंगे, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनाव की दिशा भी तय करेंगे। बीजेपी की बढ़त ने यह साफ कर दिया है कि शहरी मतदाता फिलहाल महायुति के साथ खड़ा है। वहीं उद्धव गुट के लिए यह परिणाम बड़ा झटका माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति और भी गरमाएगी, क्योंकि यह लड़ाई केवल बीएमसी तक सीमित नहीं रहने वाली।