नई दिल्ली: सर्दियों के मौसम में छाने वाला घना कोहरा अब नए रूप में वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहा है। दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में कोहरे के बीच खाली घेरे जैसे “फॉग होल” नजर आ रहे हैं। राजधानी के अलावा पंजाब, हरियाणा, उत्तर-पूर्वी राजस्थान, उत्तरी उत्तर प्रदेश और उत्तर-पूर्वी बिहार में भी ऐसे दृश्य देखे गए हैं। विशेषज्ञ इसे तेजी से बढ़ते शहरीकरण, तापमान में स्थानीय बढ़ोतरी और वायु प्रदूषण से जोड़कर देख रहे हैं।
अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार पिछले लगभग दो दशकों से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फॉग होल देखे जा रहे हैं, लेकिन दिल्ली–एनसीआर में इनकी संख्या अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक है। नासा की सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर की गई स्टडी में सामने आया कि एशिया, यूरोप और अमेरिका के घनी आबादी वाले इलाकों में यह प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है, जिसमें दिल्ली सबसे ऊपर है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रदूषण के कारण कोहरे के बनने की स्वाभाविक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इंडो-गंगेटिक प्लेन—जिसमें उत्तर भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश के क्षेत्र शामिल हैं—पहले से ही घने और प्रदूषित कोहरे से जूझ रहे हैं। इसका असर हर साल हवाई उड़ानों, रेल परिचालन और सड़क यातायात पर साफ दिखाई देता है। अब फॉग होल की नई समस्या ने इस संकट को और जटिल बना दिया है।
अध्ययन के अनुसार दिल्ली में केवल दिसंबर और जनवरी के दौरान 90 से अधिक फॉग होल दर्ज किए गए। आकलन बताता है कि शहरी क्षेत्रों में “अर्बन हीट” बढ़ने से कोहरा जल्दी टूट रहा है। यही वजह है कि यूरोप और अमेरिका में लंबे समय से कोहरे की अवधि घट रही है और अब भारत में भी ऐसा ही रुझान दिखने लगा है।
स्काईमेट के मुख्य मौसम विज्ञानी डॉ. महेश पलावत के मुताबिक, घनी आबादी वाले इलाकों में तापमान सामान्य से अधिक रहने और प्रदूषण की मात्रा ज्यादा होने से कोहरा टिक नहीं पाता। फॉग होल खासतौर पर उन स्थानों पर बन रहे हैं, जहां हरियाली कम है और ट्रैफिक, निर्माण कार्य तथा मानवीय गतिविधियां अधिक हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि फॉग होल का सीधा असर स्थानीय प्रदूषण पर भी पड़ता है। जिन क्षेत्रों में ये बनते हैं, वहां स्मॉग ज्यादा देर तक ठहरता है और तापमान अपेक्षाकृत ऊंचा रहता है। इसके विपरीत रिज क्षेत्र, अरावली के आसपास और आया नगर जैसे हरियाली वाले इलाकों में कोहरा देर तक बना रहता है, जबकि साउथ एक्सटेंशन, आरके पुरम और पंजाबी बाग जैसे घने शहरी क्षेत्रों में यह जल्दी छंट जाता है।
वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि इस नए पैटर्न पर गहन शोध की जरूरत है, ताकि शहरी विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जा सके। फॉग होल केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि बढ़ते प्रदूषण और अव्यवस्थित शहरीकरण की चेतावनी भी हैं, जिसे नजरअंदाज करना आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।