:
Breaking News

मुंबई मेयर पर महायुति में पेंच: कहीं कल्याण-डोंबिवली की सौदेबाजी तो नहीं वजह?

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

महाराष्ट्र में महायुति सरकार होने के बावजूद मुंबई के मेयर पद को लेकर भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच खींचतान खुलकर सामने आ गई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे बार-बार कह रहे हैं कि मेयर महायुति का ही बनेगा, लेकिन यह साफ नहीं हो पा रहा कि कुर्सी भाजपा के खाते में जाएगी या शिवसेना के। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि मुंबई की गुत्थी कहीं कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका के गणित से तो नहीं जुड़ी है।
इस समय मुख्यमंत्री फडणवीस दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में हैं, जबकि मुंबई में शिंदे गुट के 29 नवनिर्वाचित पार्षद होटल ताज लैंड्स एंड में डेरा डाले हुए हैं। विपक्ष इसे “रिजॉर्ट पॉलिटिक्स” करार दे रहा है, वहीं शिंदे गुट इसे प्रशिक्षण शिविर बता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बाड़ेबंदी मेयर चुनाव से ठीक पहले ताकत दिखाने और पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शिंदे ढाई-ढाई साल के मेयर के फॉर्मूले पर अड़े हुए हैं? क्या वे बीएमसी की शक्तिशाली स्थायी समिति के अध्यक्ष समेत अहम पदों पर हिस्सेदारी चाहते हैं? और क्या उन्हें यह डर सता रहा है कि उद्धव ठाकरे गुट उनके पार्षदों में सेंध लगा सकता है? फिलहाल शिंदे खुलकर कुछ नहीं बोल रहे और फडणवीस की ही लाइन दोहरा रहे हैं कि मेयर महायुति का बनेगा।
बीएमसी में 227 सीटों में से बहुमत के लिए 114 पार्षद चाहिए। भाजपा के पास 89 और शिंदे शिवसेना के पास 29 पार्षद हैं, यानी गठबंधन के कुल 118 सदस्य होते हैं। संख्या के लिहाज से भाजपा बड़ी पार्टी है और इसी आधार पर वह मेयर पद पर अपना दावा ठोक रही है। लेकिन शिंदे गुट 2022 के उस राजनीतिक उदाहरण का हवाला दे रहा है, जब कम विधायक होने के बावजूद एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने थे।
उधर उद्धव ठाकरे गुट भी खेल बिगाड़ने की रणनीति बना रहा है। चर्चा है कि शिवसेना (यूबीटी) मेयर चुनाव के मतदान से दूर रह सकती है। यदि उसके 65 पार्षद वोटिंग में हिस्सा नहीं लेते तो बहुमत का आंकड़ा घटकर 82 रह जाएगा और ऐसी स्थिति में भाजपा का मेयर आसानी से बन सकता है। संजय राउत के हालिया बयानों ने भी संकेत दिए हैं कि उद्धव गुट कोई चौंकाने वाला फैसला ले सकता है।
मुंबई की राजनीति का सीधा असर कल्याण-डोंबिवली पर भी पड़ना तय है। वहां 122 सीटों वाली महानगरपालिका में बहुमत का आंकड़ा 62 है। शिवसेना के 53 और भाजपा के 50 पार्षद जीते हैं। यहां बड़ी पार्टी शिंदे शिवसेना है, इसलिए मेयर पद पर उसका दावा मजबूत है। यदि मुंबई में शिंदे ने भाजपा को सहयोग नहीं दिया तो कल्याण-डोंबिवली में भाजपा भी वही रुख अपना सकती है, जिससे शिवसेना का सपना टूट सकता है।
सूत्रों के मुताबिक शिंदे गुट 5 साल के कार्यकाल को ढाई-ढाई साल में बांटने, स्थायी समिति अध्यक्ष पद अपने पास रखने और 2:1 के अनुपात में पदों के बंटवारे की मांग कर रहा है। इसी वजह से उसे ‘किंगमेकर’ की भूमिका में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर असली जंग अब नतीजों की नहीं, बल्कि सत्ता की साझेदारी की है। फडणवीस के विदेश से लौटने के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि भाजपा शिंदे की शर्तें मानती है या फिर कोई नया फॉर्मूला निकलता है। तब तक मुंबई के मेयर की कुर्सी महायुति के लिए प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी पहेली बनी रहेगी।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *