छत्तीसगढ़ के एक स्टील प्लांट में हुए भयावह हादसे ने बिहार के गया जिले के एक छोटे से गांव को उजाड़ दिया है। काम की तलाश में घर से करीब 600 किलोमीटर दूर गए छह मजदूर अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। डुमरिया प्रखंड के गोटीबांध गांव में गुरुवार के बाद से चूल्हे ठंडे हैं, गलियां सूनी हैं और हर घर से चीख-पुकार सुनाई दे रही है।
एक गांव, छह अर्थियां
हादसे में जान गंवाने वाले सभी मजदूर गोटीबांध गांव के थे—श्रवण भुइयां (22), राजदेव भुइयां (22), जितेंद्र भुइयां (37), बद्री भुइयां (42), विनय भुइयां (40) और सुंदर भुइयां (40)। इस हादसे ने सबसे गहरा जख्म तब दिया, जब पिता-पुत्र की जोड़ी भी इसकी चपेट में आ गई। जिन हाथों से घर चलना था, वही हाथ अब हमेशा के लिए थम गए।
₹14 हजार महीने का सपना, कीमत जान से चुकाई
गांव के 14 मजदूर एक ठेकेदार के जरिए पहली बार छत्तीसगढ़ गए थे। वादा था—₹14,000 मासिक मजदूरी और खाने की व्यवस्था। गांव में रोजगार के साधन न होने के कारण यह प्रस्ताव उनके लिए उम्मीद की किरण था। लेकिन यह उम्मीद एक हादसे में तब्दील हो गई। छह की मौके पर मौत हो गई, जबकि तीन मजदूर अब भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं।
शादी का कर्ज, मजबूरी का पलायन
सुंदर भुइयां की बेटी खुशबू कुमारी की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। वह बताती है कि पिता ने उसकी शादी के लिए कर्ज लिया था। उसी कर्ज को चुकाने के लिए पहले पिता और फिर भाई छत्तीसगढ़ गए। खुशबू कहती है—अगर पता होता कि कमाने गए पिता और भाई लौटकर नहीं आएंगे, तो शादी भी मंजूर नहीं होती। परिवार के पास न जमीन है, न पक्का घर और न ही किसी सरकारी योजना का सहारा।
हर घर में एक जैसी कहानी
विनय भुइयां के घर का हाल भी अलग नहीं है। उनकी पांच बेटियां और एक बेटा अब बेसहारा हो गए हैं। बुजुर्ग मां बेटे की मौत के सदमे में बोल भी नहीं पा रही। गांव में ऐसे कई घर हैं, जहां छोटे-छोटे बच्चे हैं और कमाने वाला कोई नहीं बचा। किसी के घर में छह महीने की बच्ची है, तो किसी के घर में एक साल का बेटा—जो शायद अपने पिता को कभी याद भी न कर पाए।
गांव में गुस्सा और सवाल
हादसे के बाद गांव में सिर्फ मातम नहीं, बल्कि आक्रोश भी है। ग्रामीण सवाल कर रहे हैं—अगर गांव में रोजगार होता, तो क्या उन्हें बाहर जाना पड़ता? क्या पलायन ही उनकी नियति है? मांझी समाज के लोगों का कहना है कि प्रतिनिधि और मंत्री होने के बावजूद हालात नहीं बदले। जंगल से लकड़ी लाकर गुजर-बसर करने पर भी रोक है, खेतों में मजदूरी के अलावा कोई विकल्प नहीं।
राजनीतिक आश्वासन, मगर भरोसा कमजोर
घटना के बाद केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी गांव पहुंचे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। मुआवजे और जांच की बात कही गई है। लेकिन गांव वालों का कहना है कि मुआवजा कुछ समय का सहारा हो सकता है, स्थायी समाधान नहीं। सवाल अब सिर्फ हादसे का नहीं, बल्कि उस मजबूरी का है, जिसने इन मजदूरों को जान जोखिम में डालने पर मजबूर किया।
पलायन की कीमत कौन चुकाएगा?
गोटीबांध गांव की यह त्रासदी सिर्फ छह मौतों की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां रोज़गार की कमी लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर करती है और कई बार लौटने का मौका भी नहीं देती। आज गांव में हर कोई यही पूछ रहा है—क्या काम की तलाश में जाना गुनाह है, और क्या उसकी सज़ा मौत ही है?