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सरस्वती पूजा के मंच से उठा सियासी सवाल

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पटना में सरस्वती पूजा का अवसर था, लेकिन जेडीयू कार्यालय का माहौल पूरी तरह राजनीतिक संकेतों से भरा नजर आया। पूजा-पाठ के बीच जो दृश्य सामने आया, उसने बिहार की राजनीति में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया—क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब उत्तराधिकार को लेकर कोई इशारा दे रहे हैं?
पूजा के मंच पर राजनीति की हलचल
शुक्रवार को जेडीयू आईटी सेल कार्यालय में आयोजित सरस्वती पूजा कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे। उनसे पहले वहां उनके बेटे निशांत कुमार और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह मौजूद थे। मंच पर हुई छोटी-सी बातचीत और हल्की मुस्कान ने कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में बड़ी अटकलों को हवा दे दी।
ललन सिंह का इशारा, खामोशी में छुपा संदेश
कार्यक्रम के दौरान ललन सिंह ने निशांत कुमार की पीठ पर हाथ रखते हुए मजाकिया अंदाज में मुख्यमंत्री से कहा—“बोल दीजिए, मानेंगे।” यह एक लाइन भले ही हल्के लहजे में कही गई हो, लेकिन मंच पर मौजूद लोग इसे सीधे राजनीति से जोड़कर देखने लगे। नीतीश कुमार और निशांत कुमार दोनों मुस्कुराए, पर कोई सीधा जवाब नहीं आया। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा सियासी संकेत मानी जा रही है।
निशांत कुमार की मौजूदगी क्यों बनी खास
अब तक राजनीति से दूरी बनाए रखने वाले निशांत कुमार का पार्टी के कार्यक्रमों में लगातार दिखना महज संयोग नहीं माना जा रहा। सरस्वती पूजा जैसे धार्मिक आयोजन में उनकी सक्रिय मौजूदगी और वरिष्ठ नेताओं का साथ दिखना, जेडीयू के भीतर चल रहे नेतृत्व मंथन की ओर इशारा कर रहा है।
निशांत का बयान—साधारण या सोचा-समझा?
कार्यक्रम के बाद निशांत कुमार ने कहा कि वह केवल मां सरस्वती का आशीर्वाद लेने आए हैं, जैसे उनके पिता आए हैं। बयान सरल था, लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राजनीति में कई बार कम शब्द ज्यादा संदेश देते हैं।
जेडीयू में ‘नीतीश के बाद’ की तलाश
जेडीयू में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी का चेहरा कौन होगा। पार्टी में अनुभवी नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन कोई सर्वमान्य उत्तराधिकारी अब तक सामने नहीं आया। ऐसे में निशांत कुमार का नाम बार-बार चर्चा में आना स्वाभाविक है।
परिवारवाद से दूरी या रणनीतिक बदलाव?
नीतीश कुमार की राजनीति की पहचान हमेशा परिवारवाद से दूरी रही है। उन्होंने अब तक अपने बेटे को राजनीति से अलग रखा। अगर भविष्य में निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में आते हैं, तो इसे नीतीश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जाएगा।
संयोग या सॉफ्ट लॉन्च?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा कार्यक्रम एक ‘सॉफ्ट सिग्नल’ भी हो सकता है—न कोई घोषणा, न कोई इनकार। बस इतना भर कि चर्चा शुरू हो जाए। सरस्वती पूजा का मंच धार्मिक था, लेकिन वहां से निकले संकेत पूरी तरह सियासी थे।
अब सवाल यही है—क्या यह सिर्फ एक संयोग था या बिहार की राजनीति में नए अध्याय की आहट? इसका जवाब आने वाले दिनों में नीतीश कुमार की अगली चाल से साफ हो जाएगा।

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