समस्तीपुर:
आज की राजनीति जहां पद, पावर और प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है, वहीं बिहार की धरती ने एक ऐसा नेता दिया, जिसके लिए सत्ता मंज़िल नहीं, ज़िम्मेदारी थी। जननायक कर्पूरी ठाकुर—एक ऐसा नाम, जिसने अदना और आला के बीच की दीवार गिराने का सपना देखा और उसे अपने जीवन में उतार कर दिखाया। उनकी 102वीं जयंती पर सामने आए किस्से सिर्फ अतीत की याद नहीं हैं, बल्कि मौजूदा राजनीति के लिए एक कठोर सवाल भी हैं।
कर्पूरी ठाकुर कहते थे— “बिहारवासियो उठो, जागो, चलो और बगावत करो।”
यह बगावत सत्ता के लिए नहीं, व्यवस्था की असमानता के खिलाफ थी। समस्तीपुर के छोटे से कर्पूरीग्राम (पितोझिया) से निकलकर बिहार की सत्ता तक पहुंचने वाले कर्पूरी बाबू ने कभी यह नहीं भूला कि वे किस मिट्टी से आए हैं।
नेता नहीं, लोगों के अपने आदमी
डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों से प्रभावित कर्पूरी ठाकुर ने राजनीति को जाति की नहीं, जमीर की कसौटी बनाया। उनकी लड़ाई अमीर-गरीब की खाई के खिलाफ थी, न कि किसी जातीय गणित के पक्ष में। मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे आम लोगों के बीच उसी सहजता से रहे, जैसे कोई साधारण कार्यकर्ता।
उनके पास सरकारी गाड़ी थी, सुरक्षा भी थी, लेकिन अक्सर वे कार्यकर्ताओं के साथ साइकिल पर निकल पड़ते थे। यह सादगी मजबूरी नहीं थी, बल्कि उनकी सोच और विचारधारा का हिस्सा थी। वे मानते थे कि नेता अगर जनता से दूरी बना ले, तो वह जननायक नहीं रह जाता।
साइकिल यात्रा का किस्सा, जो आज भी मिसाल है
समस्तीपुर से पटना तक निकाली गई एक साइकिल रैली आज भी समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय है। समाजवादी नेता और पूर्व विधायक दुर्गा प्रसाद सिंह बताते हैं कि उस रैली में सभी कार्यकर्ता साइकिल से चल रहे थे। कर्पूरी ठाकुर के पास गाड़ी थी, लेकिन उन्होंने उसे किनारे रखा और साइकिल उठाई।
इतना ही नहीं, उजियारपुर के बालमुकुंद सिंह की नई साइकिल देखकर उन्होंने हंसते हुए कहा— “चलो, मुझे भी बैठाकर ले चलो।”
महुआ तक की यह यात्रा किसी प्रचार का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह दिखाने का तरीका था कि नेता और कार्यकर्ता के बीच कोई ऊंच-नीच नहीं होती।
सत्ता में रहकर भी झोपड़ी का जीवन
कर्पूरी ठाकुर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि मुख्यमंत्री बनकर भी सादगी से रहा जा सकता है। वे न कभी पक्का मकान बनवा सके, न ही व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता दी। जिस जगह उनका घर था, वहां बाद में स्मृति भवन बना, लेकिन उनकी झोपड़ी आज भी जीकेपीडी कॉलेज परिसर में प्रतीक के रूप में सुरक्षित है।
समाजवादी नेता बनारसी ठाकुर बताते हैं कि कर्पूरी बाबू झोपड़ी में पैदा हुए और झोपड़ी में ही दुनिया छोड़ गए। यही वजह है कि जनता ने उन्हें ‘जननायक’ कहा—यह कोई सरकारी उपाधि नहीं, बल्कि लोगों के दिल से निकला सम्मान था।
बेटी की शादी और सत्ता से दूरी
कर्पूरी ठाकुर की सादगी का सबसे बड़ा उदाहरण उनकी बेटी की शादी मानी जाती है। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने बेटी की शादी गांव में बेहद सादे तरीके से की। न प्रशासन को भनक लगी, न अधिकारियों को बुलावा गया। बाद में जब अफसरों को पता चला, तो वे हैरान रह गए। आज के दौर में यह घटना किसी कहानी जैसी लगती है, लेकिन यही कर्पूरी ठाकुर का जीवन था।
संघर्ष से समझौता नहीं
राजनीति में सिद्धांतों के लिए संघर्ष करना उनकी पहचान थी। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते हुए उन्हें पद से हटाया गया, जबकि संख्या बल उनके पक्ष में था। इस फैसले से उन्हें पद छिनने का दुख नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ हुए अन्याय की पीड़ा थी। उन्होंने राज्यपाल से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ी—यह दिखाने के लिए कि लोकतंत्र में पद नहीं, प्रक्रिया बड़ी होती है।
आज भी प्रासंगिक क्यों हैं कर्पूरी ठाकुर?
कर्पूरी ठाकुर का जीवन बताता है कि राजनीति सेवा से चलती है, सुविधा से नहीं। उन्होंने कभी जातिवाद को हथियार नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक बराबरी को लक्ष्य बनाया। सत्ता आई-गई, लेकिन उनकी सादगी, ईमानदारी और जनसेवा आज भी लोगों के लिए मानक बनी हुई है।
उनकी 102वीं जयंती पर सामने आए ये किस्से सिर्फ स्मृतियां नहीं हैं, बल्कि आज की राजनीति के लिए आईना हैं। शायद इसी वजह से कर्पूरी ठाकुर पद से नहीं, बल्कि जनता के दिलों में आज भी अमर हैं।