पटना।शंभू गर्ल्स हॉस्टल की उस रात को अब महज एक छात्रा की मौत के रूप में नहीं देखा जा सकता। नीट की तैयारी कर रही जहानाबाद की छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने बिहार की कानून-व्यवस्था, पुलिस जांच और स्वास्थ्य तंत्र—तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ताजा फॉरेंसिक रिपोर्ट ने उस सच्चाई की ओर इशारा किया है, जिसे शुरुआत में देखने से ही परहेज़ किया गया।
फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट में मृतका के अंतर्वस्त्र पर मानव शुक्राणु के अवशेष मिलने की पुष्टि हुई है। यह खुलासा उस शुरुआती दावे को सीधे चुनौती देता है, जिसमें मामले को आत्महत्या या बीमारी से जोड़कर देखा जा रहा था। अब यह मामला संभावित यौन उत्पीड़न की दिशा में गंभीर मोड़ ले चुका है।
पोस्टमार्टम ने पहले ही दिए थे संकेत
इससे पहले पीएमसीएच के मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा था कि यौन हिंसा की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। मृतका के शरीर और निजी अंगों पर मिले चोटों के निशान इस आशंका को और गहरा करते हैं। इन्हीं बिंदुओं को देखते हुए पोस्टमार्टम रिपोर्ट को विशेषज्ञ राय के लिए एम्स पटना भेजा गया था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि नौ दिन बीत जाने के बाद भी एम्स की अंतिम राय अब तक एसआईटी को नहीं मिली है।
एम्स के चिकित्सकों का कहना है कि उन्हें जांच के लिए पूरी मेडिकल फाइल ही उपलब्ध नहीं कराई गई, जिससे समीक्षा अधूरी रह गई। यह लापरवाही सवाल खड़े करती है—क्या जांच को जानबूझकर धीमा किया गया?
शुरुआती जांच पर उठते सवाल
मामले की शुरुआत से ही कई अहम चूक सामने आ रही हैं। घटना के बाद हॉस्टल को तुरंत सील नहीं किया गया, पोस्टमार्टम के आदेश में देरी हुई और शुरुआती बयान ऐसे दिए गए, जिनसे पूरा मामला भटकता नजर आया। पुलिस ने एक समय यह दावा भी किया कि छात्रा की हालत नींद की गोलियां लेने और टाइफायड जैसी बीमारी के कारण बिगड़ी थी। लेकिन पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट ने इन दावों की बुनियाद हिला दी है।
अस्पताल की भूमिका भी जांच के घेरे में
विशेष जांच टीम ने राजेंद्र नगर स्थित एक निजी अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों से दोबारा पूछताछ की है। जांच का केंद्र यह है कि छात्रा के सिर पर लगी चोट अस्पताल लाने से पहले की थी या इलाज के दौरान हुई। साथ ही 6 जनवरी के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं, ताकि अस्पताल परिसर में किसी संदिग्ध गतिविधि की पुष्टि हो सके।
जनता का भरोसा डगमगाया
यह मामला अब सिर्फ कानूनी जांच तक सीमित नहीं रहा। छात्रों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों में भारी आक्रोश है। लोगों का सवाल है—अगर समय रहते सबूत सुरक्षित किए जाते, जांच में पारदर्शिता होती और जल्दबाज़ी में निष्कर्ष न निकाले जाते, तो क्या तस्वीर अलग होती?
परिवार का आरोप है कि शुरू से ही यौन शोषण के एंगल को दबाने की कोशिश हुई और मामले को हल्के में लिया गया। यही वजह है कि अब पुलिस की कार्यशैली और जवाबदेही पर भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है।
आगे क्या?
एसआईटी अब तीन अहम कड़ियों को जोड़ने की कोशिश में जुटी है—
FSL के वैज्ञानिक सबूत,
एम्स की अंतिम मेडिकल राय,
अस्पताल और हॉस्टल से जुड़ी घटनाओं की समयरेखा।
एम्स की रिपोर्ट मिलते ही डीएनए प्रोफाइलिंग के जरिए आरोपियों और संदिग्धों से मिलान की प्रक्रिया तेज की जा सकती है। तब जाकर शायद इस सवाल का जवाब मिलेगा कि शंभू गर्ल्स हॉस्टल की उस रात वास्तव में क्या हुआ था।