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UGC के प्रस्तावित कानून ने खोला नया सियासी मोर्चा, छात्रों से लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं तक में असंतोष

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लखनऊ/पटना/जयपुर:
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रस्तावित नए कानून ने देश के कई राज्यों में शिक्षा से आगे निकलकर सामाजिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान समेत कई राज्यों में इस कानून को लेकर जिस तरह का विरोध सामने आ रहा है, उसने सरकार और सत्तारूढ़ दल के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
शुरुआत छात्रों के असंतोष से हुई, लेकिन अब यह आंदोलन सामाजिक संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक फैल चुका है। उत्तर प्रदेश के मेरठ, हापुड़, अमेठी जैसे जिलों में विरोध के स्वर लगातार तेज हो रहे हैं। हापुड़ के सिंभावली क्षेत्र के बक्सर गांव में विरोध का अनोखा तरीका देखने को मिला, जहां कई घरों के बाहर पोस्टर लगाकर भाजपा नेताओं से चुनावी दौर में गांव न आने की अपील की गई। इन पोस्टरों में खुद को एकजुट बताते हुए समुदाय विशेष की नाराजगी खुलकर सामने आई है।
भाजपा के भीतर भी दिखी दरार
UGC कानून को लेकर विरोध अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा। अमेठी जिले में सत्तारूढ़ भाजपा को अंदरूनी झटका लगा है। भेंटुआ ब्लॉक के कोरारी हीरशाह गांव स्थित बूथ संख्या 7 के बूथ अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने अपने पद से इस्तीफा देकर असहमति सार्वजनिक कर दी। उन्होंने मंडल अध्यक्ष को भेजे संदेश में साफ कहा कि प्रस्तावित कानून उनके सामाजिक और नैतिक मूल्यों के विपरीत है।
अखिलेश सिंह का कहना है कि यह कानून समाज में नई रेखाएं खींचने का काम करेगा, जिसे वह स्वीकार नहीं कर सकते।
कानून के किस प्रावधान पर सबसे ज्यादा आपत्ति
विरोध का मुख्य कारण UGC के नए मसौदे में Opportunity Cell को अनिवार्य बनाए जाने और उसके दायरे को बढ़ाने से जुड़ा है। अब तक यह व्यवस्था अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए लागू थी, लेकिन नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी ‘जातिगत भेदभाव’ की श्रेणी में शामिल कर दिया गया है।
जनरल कैटेगरी के छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों का तर्क है कि OBC वर्ग पहले से ही आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ ले रहा है। ऐसे में उन्हें भी समान श्रेणी में रखना शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा कर सकता है। उनका कहना है कि यह फैसला योग्यता आधारित शिक्षा प्रणाली को कमजोर करेगा।
शिक्षा से राजनीति तक फैलता विवाद
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस कानून पर व्यापक संवाद और संशोधन नहीं हुआ, तो इसका असर आने वाले समय में सिर्फ विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहेगा। जिस तरह ग्रामीण इलाकों से लेकर पार्टी संगठन के भीतर तक विरोध के स्वर उठ रहे हैं, उससे यह साफ है कि मामला अब सामाजिक समीकरणों और चुनावी राजनीति से भी जुड़ता जा रहा है।
UGC कानून को लेकर बढ़ता यह विरोध सरकार के लिए एक संकेत है कि शिक्षा सुधार से जुड़े किसी भी फैसले में समाज के सभी वर्गों की आशंकाओं को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

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