:
Breaking News

रोसड़ा में पुलिस-पत्रकार विवाद: रिपोर्टिंग के दौरान आरोप-प्रत्यारोप, दोनों पक्षों का पक्ष सामने

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

समस्तीपुर | विशेष रिपोर्ट
समस्तीपुर जिले के रोसड़ा थाना परिसर में 26 जनवरी को झंडा तोलन कार्यक्रम के दौरान एक सोशल मीडिया पत्रकार के साथ कथित बदसलूकी और धमकी का मामला सामने आया है। पत्रकार पलटन सहनी, जो “पलटन लाइव खबर” के संचालक हैं, ने थाने के एक पुलिस अधिकारी पर सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और फोटो-वीडियो डिलीट कराने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है। हालांकि पुलिस प्रशासन ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है।
पत्रकार पलटन सहनी के अनुसार, उन्हें थानाध्यक्ष के आमंत्रण पर रोसड़ा थाना परिसर में आयोजित गणतंत्र दिवस के झंडा तोलन कार्यक्रम की रिपोर्टिंग के लिए बुलाया गया था। कार्यक्रम के दौरान वे फोटो और वीडियो कवरेज कर रहे थे। इसी दौरान थाना में पदस्थापित एएसआई सुभाष चंद्र मंडल ने कथित तौर पर उन्हें सार्वजनिक रूप से धमकाया और कहा कि यदि उन्होंने फोटो व वीडियो डिलीट नहीं किया तो उन्हें थाने में बंद कर दिया जाएगा। पत्रकार का कहना है कि इस व्यवहार से उनका मान-सम्मान आहत हुआ और वे मानसिक रूप से भयभीत हो गए।
पत्रकार ने इस संबंध में थाने को लिखित शिकायत देकर कहा है कि वे अपने पेशेगत दायित्व का निर्वहन कर रहे थे और किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया गया था। उन्होंने मामले में उचित कार्रवाई की मांग की है।
वहीं इस पूरे मामले पर रोसड़ा थानाध्यक्ष लाल बाबू कुमार ने पत्रकार द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। थानाध्यक्ष का कहना है कि झंडा तोलन कार्यक्रम के दौरान रिपोर्टिंग पूरी तरह सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल में हुई तथा किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा किसी पत्रकार को धमकाने या अपमानित करने जैसी कोई घटना नहीं हुई।
एएसआई सुभाष चंद्र मंडल ने भी अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि उन्होंने किसी पत्रकार के साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया और पूरे मामले को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
इस घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर आरोप और प्रतिक्रियाएं तेजी से वायरल हुईं, जिससे जिले में पुलिस-पत्रकार संबंधों को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में पुलिस और पत्रकार—दोनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक ओर पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाती है, वहीं पत्रकार समाज के सामने सच लाने का काम करता है। लेकिन जब इन दोनों के बीच अविश्वास या टकराव की स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ता है।
जानकारों के मुताबिक पुलिस-पत्रकार विवाद के पीछे कई कारण होते हैं, जिनमें रिपोर्टिंग के दौरान अनावश्यक रोक-टोक, कानून की जानकारी की कमी या गलत व्याख्या, वर्दी के अधिकार और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच स्पष्ट सीमा रेखा का अभाव तथा सोशल मीडिया के दौर में खबरों के तुरंत वायरल होने का दबाव प्रमुख हैं। कई बार पुलिस इसे अपने काम में हस्तक्षेप मानती है, जबकि पत्रकार इसे सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं।
कानूनी जानकारों के अनुसार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जिसके तहत पत्रकार सार्वजनिक कार्यक्रमों और घटनाओं की रिपोर्टिंग कर सकते हैं, वहीं पुलिस को भी कानून-व्यवस्था और सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार प्राप्त है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब पत्रकार को बिना वैध कारण रोका जाता है या पुलिसकर्मी अपने अधिकार से आगे बढ़कर व्यवहार करते हैं।
पूर्व पुलिस अधिकारियों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में संतुलन और संवाद बेहद जरूरी है। पुलिस को यह समझना होगा कि पत्रकार दुश्मन नहीं, बल्कि सूचना का माध्यम हैं, वहीं पत्रकारों को भी मर्यादा, सुरक्षा नियम और संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि जिलों में पुलिस-मीडिया समन्वय बैठक नियमित हो, रिपोर्टिंग को लेकर स्पष्ट एसओपी बने और किसी विवाद की स्थिति में वरिष्ठ अधिकारी तत्काल हस्तक्षेप करें, ताकि मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने से पहले ही तथ्यात्मक रूप से सुलझाया जा सके।
फिलहाल रोसड़ा थाना का यह मामला आरोप और खंडन के बीच है और अब निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि सच्चाई क्या है। लेकिन इतना तय है कि पुलिस और पत्रकार के बीच टकराव बढ़ना आम लोगों के भरोसे को कमजोर करता है, इसलिए अहंकार नहीं, बल्कि कानून और संवाद को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *