समस्तीपुर/रोसड़ा: बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा थाना क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया है जहाँ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार संजीव कुमार सिंह, उनके 70 वर्षीय वृद्ध पिता और दो नाबालिग बेटों के खिलाफ दर्ज 'कांड संख्या 385/2020' को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने जाँच के बाद झूठा करार दिया है। बावजूद इसके, पुलिस द्वारा इस मामले को अब तक समाप्त नहीं किया जाना प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाता है।
क्या है पूरा मामला?
दस्तावेजों के अनुसार, 09 दिसंबर 2020 को रोसड़ा थाने में यह प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। आरोप है कि संजीव कुमार सिंह द्वारा क्षेत्र के शराब कारोबारियों के खिलाफ लगातार खबरें लिखने के कारण, एक साजिश के तहत उन्हें और उनके पूरे परिवार को इस केस में घसीटा गया।
हैरान करने वाले तथ्य:
समझौता और इनकार: वादी और प्रतिवादी के बीच 04 जनवरी 2021 को ही न्यायालय में सुलह हो गई थी। यहाँ तक कि वादी ने लिखित रूप में किसी भी साक्ष्य या मेडिकल रिपोर्ट से इनकार कर दिया था।
फर्जी गवाही का दावा:
पुलिस डायरी में जिन गवाहों का जिक्र है, उन्होंने स्वयं शपथ पत्र देकर एसपी समस्तीपुर को बताया है कि पुलिस ने उनसे कभी कोई गवाही ली ही नहीं।
मानवाधिकार आयोग का सख्त रुख:
NHRC ने मामले की गहराई से जांच करने के बाद इसे फर्जी पाया और समस्तीपुर एसपी को 8 सप्ताह के भीतर केस समाप्त करने का निर्देश दिया था।
मंत्री श्रवण कुमार ने भी लिखा पत्र
इस मामले की गूंज अब शासन के गलियारों में भी है। बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्री श्रवण कुमार ने 'पुलिस महानिदेशक (DGP), बिहार' को पत्र लिखकर इस मामले में संज्ञान लेने का निर्देश दिया है। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि पत्रकार संजीव कुमार सिंह और उनके परिवार को झूठे केस में फंसाया गया है और मानवाधिकार आयोग के आदेश के बावजूद कार्रवाई लंबित है।
पत्रकारिता और समाज सेवा का पुरस्कार या प्रताड़ना?
संजीव कुमार सिंह कोई साधारण नाम नहीं हैं। वे 2003 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और दैनिक जागरण व दैनिक हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवा दे चुके हैं। उनकी मौलिक रचना 'मानव जीवन: एक काव्य यात्रा' उनके साहित्यिक योगदान का प्रमाण है। ऐसे व्यक्तित्व और उनके नाबालिग बच्चों (सत्यम कुमार सिंह व शिवम कुमार सिंह) को अपराधी के रूप में दर्ज करना व्यवस्था की एक बड़ी चूक मानी जा रही है।
अंतिम सवाल
जब वादी पीछे हट चुका है, गवाह मुकर चुके हैं, मानवाधिकार आयोग केस को झूठा बता चुका है और सरकार के मंत्री जांच के आदेश दे चुके हैं, तो रोसड़ा पुलिस किसके दबाव में इस केस को 'जस का तस' रखे हुए है? क्या एक निर्दोष परिवार को न्याय के लिए और लंबा इंतजार करना होगा?