पटना:दशकों पुराने जमीन के कागजात, जिन पर कैथी लिपि की लिखावट आम लोगों के लिए पहेली बनी रहती थी, अब परेशानी का कारण नहीं रहेंगे। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने कैथी लिपि में लिखे दस्तावेजों के अनुवाद को लेकर एक व्यवस्थित और पारदर्शी व्यवस्था लागू कर दी है। इसके तहत अब न तो लोगों को मनमाने शुल्क वसूलने वाले अनुवादकों के चक्कर काटने होंगे और न ही सही अनुवाद को लेकर असमंजस रहेगा।
सरकार ने राज्यभर के लिए 29 प्रशिक्षित कैथी लिपि परामर्शदाताओं को सूचीबद्ध किया है, जिनकी सेवाएं सभी जिलों में उपलब्ध कराई जाएंगी। यह व्यवस्था पुराने भूमि अभिलेखों से जुड़े विवादों और प्रशासनिक अड़चनों को दूर करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
सरकार क्यों लाई यह व्यवस्था?
उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि लंबे समय से यह शिकायत सामने आ रही थी कि आम लोगों को कैथी लिपि में लिखे दस्तावेजों के अनुवाद के लिए भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। कई बार गलत या अधूरा अनुवाद जमीन से जुड़े मामलों को और उलझा देता था। इसी को देखते हुए सरकार ने विशेषज्ञों की सेवाएं आम नागरिकों के लिए सुलभ कराने का फैसला लिया है।
उनका कहना है कि इससे न केवल राजस्व मामलों का निपटारा आसान होगा, बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं पर लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा।
कैसे तैयार किए गए परामर्शदाता?
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को भेजे पत्र में बताया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा और भूमि सुधार जन कल्याण संवाद के दौरान यह बात सामने आई थी कि जिलों में कैथी लिपि जानने वाले विशेषज्ञों की भारी कमी है। इसके बाद विभागीय दक्षता परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को पांच दिन का विशेष आवासीय प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 29 परामर्शदाताओं को अधिकृत किया गया है।
कितना देना होगा शुल्क?
सरकार ने अनुवाद शुल्क को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नियम तय कर दिए हैं।
कैथी लिपि से देवनागरी लिपि में अनुवाद के लिए प्रति पृष्ठ 220 रुपये की दर निर्धारित की गई है।
भुगतान केवल ऑनलाइन माध्यम से होगा। नकद भुगतान की अनुमति नहीं दी गई है, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी या मनमानी पर रोक लगाई जा सके।
आम लोगों को कैसे मिलेगा फायदा?
अब कोई भी नागरिक अपने पुराने भूमि दस्तावेजों के अनुवाद के लिए सीधे अधिकृत परामर्शदाताओं की सेवाएं ले सकेगा। जिला प्रशासन और विभागीय कार्यालय भी जरूरत पड़ने पर इन्हीं परामर्शदाताओं से काम लेंगे। इससे न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि अनुवाद की प्रामाणिकता भी सुनिश्चित होगी।
क्यों है यह फैसला अहम?
बिहार में बड़ी संख्या में जमीन से जुड़े दस्तावेज आज भी कैथी लिपि में हैं। सही अनुवाद न होने की वजह से अक्सर विवाद, मुकदमे और देरी की स्थिति बनती रही है। नई व्यवस्था से ऐसे मामलों में पारदर्शिता आएगी और आम नागरिकों को सीधा लाभ मिलेगा।
सरकार का दावा है कि यह पहल जमीन से जुड़े मामलों में वर्षों से चली आ रही उलझनों को सुलझाने में मील का पत्थर साबित होगी।