बिहार में जब भी किसी सनसनीखेज या हाई-प्रोफाइल अपराध की जांच CBI को सौंपने की बात होती है, तो आम लोगों के मन में एक साथ दो भाव उभरते हैं—उम्मीद और आशंका। उम्मीद इस बात की कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सच तक पहुंचेगी, और आशंका इस डर की कि कहीं यह मामला भी वर्षों तक फाइलों में उलझकर रह न जाए। पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत और उसकी CBI जांच की सिफारिश ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर फिर से वही पुराने सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका सामना राज्य एक दशक पहले नवरुणा कांड के दौरान कर चुका है।
शंभू गर्ल्स हॉस्टल की घटना अब सिर्फ एक छात्रा की असमय मौत का मामला नहीं रह गई है। यह बिहार की पुलिसिंग, शुरुआती जांच की गंभीरता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता की कसौटी बन चुकी है। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने इस मामले की तुलना सीधे नवरुणा कांड से करते हुए नीतीश सरकार पर हमला बोला है। उनका कहना है कि जैसे नवरुणा के हत्यारों तक CBI नहीं पहुंच पाई, वैसे ही इस छात्रा के मामले में भी सच्चाई दब सकती है और कुछ समय बाद यह केस भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
तेजस्वी यादव के बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जांच किस एजेंसी को दी जाए, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या इस बार जांच सच तक पहुंचने की नीयत से होगी या फिर यह मामला भी वर्षों तक तारीखों, रिपोर्टों और अंतहीन प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाएगा। बिहार के लोग इसलिए भी चिंतित हैं क्योंकि नवरुणा कांड आज भी न्याय व्यवस्था पर एक गहरे दाग की तरह मौजूद है।
नवरुणा कांड: एक दशक पुराना जख्म 18 सितंबर 2012 की रात मुजफ्फरपुर के जवाहरलाल रोड पर रहने वाले अतुल्य चक्रवर्ती के घर सब कुछ सामान्य था। लेकिन अगली सुबह उनकी 12 वर्षीय बेटी नवरुणा रहस्यमय तरीके से गायब मिली। कमरे की खिड़की की ग्रिल कटी हुई थी, जिससे यह साफ था कि यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित अपहरण था। उस समय मुजफ्फरपुर में जमीन माफियाओं का दबदबा था और नवरुणा का परिवार अपनी कीमती पैतृक जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था। इसी वजह से शुरुआत से ही शक की सुई भू-माफियाओं और रसूखदार लोगों की ओर गई।
करीब दो महीने बाद, 26 नवंबर 2012 को नवरुणा के घर के पास बहने वाले नाले की सफाई के दौरान एक मानव कंकाल बरामद हुआ। पुलिस ने दावा किया कि यह नवरुणा का कंकाल है, लेकिन परिवार ने इस दावे को मानने से इनकार कर दिया। मामला जब CBI तक पहुंचा तो DNA जांच से कंकाल के नवरुणा का होने की पुष्टि हुई। इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल आज तक अनुत्तरित है—नवरुणा की हत्या किसने की और उसका शव नाले तक कैसे पहुंचा?
यह मामला इतना बड़ा बन गया कि सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देना पड़ा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोर्ट के निर्देश पर 14 फरवरी 2014 को केस CBI को सौंपा। शुरुआती उम्मीद थी कि अब सच सामने आएगा, लेकिन वर्षों बीत गए। CBI ने सैकड़ों लोगों से पूछताछ की, भू-माफियाओं को गिरफ्तार किया, ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट का हवाला दिया, लेकिन ठोस नतीजा नहीं निकला। सुप्रीम कोर्ट ने करीब दस बार CBI को अतिरिक्त समय दिया, फिर भी एजेंसी किसी निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी।
इस केस में तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे। उस समय मुजफ्फरपुर के IG रहे गुप्तेश्वर पांडेय का नाम भी जांच के दायरे में आया। नवरुणा के माता-पिता ने आरोप लगाया कि वे भू-माफियाओं से मिले हुए थे। हालांकि गुप्तेश्वर पांडेय ने हमेशा इन आरोपों को नकारते हुए कहा कि उन्होंने खुद CBI से कहा था कि उनसे भी पूछताछ की जाए। बावजूद इसके, सच्चाई कभी पूरी तरह सामने नहीं आई।
2018 में CBI ने सुप्रीम कोर्ट से अंतिम छह महीने का समय मांगा। जांच के दौरान सात आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन न तो पुख्ता सबूत जुट पाए और न ही चार्जशीट दाखिल हो सकी। नतीजा यह हुआ कि सभी आरोपी जमानत पर रिहा हो गए। आखिरकार नवंबर 2020 में CBI ने मुजफ्फरपुर की विशेष अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। एजेंसी ने माना कि तमाम प्रयासों और इनाम की घोषणा के बावजूद वह कातिलों तक नहीं पहुंच सकी। यह वह मोड़ था, जहां न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा गहराई से डगमगा गया।
NEET छात्रा की मौत और आज का बिहार अब पटना में NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की संदिग्ध मौत ने उसी पुराने डर को फिर से जगा दिया है। विपक्ष का आरोप है कि बिहार में पुलिस की शुरुआती जांच अक्सर कमजोर रहती है, सबूत समय पर सुरक्षित नहीं किए जाते और बाद में CBI जांच महज औपचारिकता बनकर रह जाती है। तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर साफ शब्दों में कहा है कि CBI जांच कई बार ‘डेड एंड’ साबित होती है, जहां रसूखदार अपराधी बच निकलते हैं और पीड़ित परिवार सिर्फ तारीखों के चक्कर में फंसकर रह जाता है।
नवरुणा कांड से लेकर आज तक एक बात समान रही है—शुरुआती ढिलाई और जवाबदेही की कमी। नवरुणा के पिता अतुल्य चक्रवर्ती आज भी न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। उनका दर्द यह सवाल बनकर खड़ा होता है कि क्या पटना की उस NEET छात्रा के परिवार को भी यही रास्ता अपनाना पड़ेगा?
यह मामला अब सिर्फ एक छात्रा की मौत का नहीं, बल्कि बिहार की न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। सवाल यह है कि क्या इस बार जांच सच में अंजाम तक पहुंचेगी या फिर एक और बेटी का मामला फाइलों में दफन होकर रह जाएगा। पूरे बिहार की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा या इस बार न्याय व्यवस्था भरोसा जीत