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आर्थिक सर्वे ने खोली बिहार की हकीकत, प्रति व्यक्ति आय में सबसे पीछे, 20 साल की सत्ता पर उठे तीखे सवाल

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पटना: भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने बिहार की अर्थव्यवस्था को लेकर ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची में बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे निचले पायदान पर दर्ज किया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में प्रति व्यक्ति औसत सालाना आय 70 हजार रुपये से भी कम है, जिसने विकास के दावों पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है।इसी पृष्ठभूमि में बिहार विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत सोमवार से हो रही है। सेंट्रल हॉल में राज्यपाल का अभिभाषण होगा और सरकार की ओर से आर्थिक सर्वेक्षण सदन में पेश किया जाएगा। आम बजट से ठीक पहले आए इन आंकड़ों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है।आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक आय के मोर्चे पर बिहार देश का सबसे गरीब राज्य बना हुआ है। यह खुलासा अब केवल सांख्यिकीय बहस नहीं रह गया है, बल्कि पिछले दो दशकों से जारी राजनीतिक नेतृत्व और उसकी नीतियों पर सीधा प्रश्न बन गया है।हालांकि सर्वेक्षण का दूसरा पहलू यह भी बताता है कि बिहार पूरी तरह ठहरा हुआ राज्य नहीं है। वर्ष 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान मूल्य पर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। विकास दर 13.07 प्रतिशत रही, जो देश के 22 राज्यों से अधिक है। इसके बावजूद चिंता इस बात की है कि बिहार अपनी ही पिछली तीन वर्षों की विकास गति को बरकरार नहीं रख सका है। यानी विकास हो रहा है, लेकिन अपेक्षित रफ्तार अब भी दूर है।इन्हीं आंकड़ों को आधार बनाकर राष्ट्रीय जनता दल ने नीतीश सरकार पर जोरदार हमला बोला है। राजद प्रवक्ता शक्ति यादव का कहना है कि जब 20 वर्षों से सत्ता की बागडोर एक ही नेतृत्व के हाथ में रही है, तो हर नाकामी के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराना अब तर्कसंगत नहीं है। उनका सवाल है कि अगर दो दशक बाद भी बिहार देश का सबसे गरीब राज्य बना हुआ है, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।वहीं सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए आंकड़ों को संदर्भ में देखने की बात कर रही है। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार का दावा है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार को अराजकता और पिछड़ेपन से बाहर निकाला गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में राज्य ने महत्वपूर्ण प्रगति की है और आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को समग्र दृष्टिकोण से समझना जरूरी है।आर्थिक सर्वेक्षण ने एक बार फिर बिहार की राजनीति को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ गरीबी का कड़वा सच सामने है, तो दूसरी ओर विकास की संभावनाओं और दावों की लंबी सूची। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ये आंकड़े आने वाले दिनों में चुनावी मुद्दा बनेंगे या फिर यह बहस राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रह जाएगी। लेकिन इतना तय है कि आम जनता के मन में यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या बीस साल में वाकई बिहार की तस्वीर बदली 

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