पटना: खेती, पेयजल और बाढ़—तीनों चुनौतियों से जूझते बिहार में अब जल प्रबंधन को लेकर सरकार का नजरिया बदलता दिख रहा है। बजट 2026 के जरिए जल संसाधन और लघु जल संसाधन विभाग ने यह साफ कर दिया है कि पानी को अब तात्कालिक राहत के रूप में नहीं, बल्कि स्थायी समाधान के तौर पर देखा जा रहा है। ‘जल-जीवन-हरियाली’ अभियान से लेकर कोसी, गंडक और गंगा जैसी नदियों पर चल रही परियोजनाएं इस बात का संकेत हैं कि बिहार पानी को बोझ नहीं, विकास का आधार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सरकार ने ‘हर खेत तक सिंचाई का पानी’ पहुंचाने के संकल्प को जमीन पर उतारने के लिए 15 हजार करोड़ रुपये से अधिक की बड़ी परियोजनाओं को हरी झंडी दी है। कोसी-मेची लिंक परियोजना से लेकर गंगा और सोन नदी के पानी को जलाशयों तक पहुंचाने की योजनाओं का मकसद दोहरा है—एक ओर बाढ़ के खतरे को कम करना, तो दूसरी ओर सूखाग्रस्त और जल-संकट वाले इलाकों में हरियाली लौटाना।
जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत अब तक 163 योजनाओं को प्रशासनिक स्वीकृति दी जा चुकी है। इन योजनाओं का असर जमीन के नीचे भी दिखने लगा है। भूगर्भ जल के पुनर्भरण में सुधार दर्ज किया गया है, जबकि आहर-पईन और तालाबों की मेढ़ों पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से हरित क्षेत्र बढ़ा है। इससे जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन को भी मजबूती मिली है।
खेती को सीधा फायदा देने के लिए मुख्यमंत्री निजी नलकूप योजना को भी गति मिली है। अब तक 35 हजार अनुदान आधारित नलकूप लगाए जा चुके हैं, जिससे करीब 1.75 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिल रही है। वहीं ‘हर खेत तक सिंचाई का पानी’ योजना के तहत 2025-26 में स्वीकृत सात नई परियोजनाओं से 3,730 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता बढ़ने के साथ भूजल स्तर में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
जल संसाधन विभाग के अनुसार चयनित 604 योजनाओं में से अधिकांश को पूरा कर 1.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई बहाल की जा चुकी है। इसके अलावा 774 अन्य योजनाओं के जरिए 5.46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई पुनर्स्थापन का काम जारी है। यह आंकड़े बताते हैं कि सरकार अब सिर्फ नई योजनाएं नहीं, बल्कि पुराने और जर्जर सिंचाई तंत्र को भी फिर से सक्रिय करने पर ध्यान दे रही है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत कोसी-मेची लिंक परियोजना के पहले चरण का काम शुरू हो चुका है। इस परियोजना से अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार के करीब 2.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिलेगा, साथ ही बाढ़ के प्रभाव में भी कमी आने की उम्मीद है। यह इलाका लंबे समय से बाढ़ और जलभराव की दोहरी मार झेलता रहा है।
पेयजल और शहरी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए गंगा और सोन नदी के पानी को जलाशयों और शहरों तक पहुंचाने की योजनाएं भी बजट का अहम हिस्सा हैं। बांका और मुंगेर में गंगा के अधिशेष जल को बदुआ और खड़गपुर जलाशयों तक ले जाने की योजना पर काम चल रहा है। जमुई में बरनार जलाशय और पश्चिमी गंडक नहर प्रणाली के पुनर्स्थापन से लाखों हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिलने की उम्मीद है।
गंगा जल आपूर्ति योजना के दूसरे चरण में नवादा और बिहारशरीफ को गंगा जल देने के लिए मधुबन जलाशय का निर्माण किया जा रहा है। वहीं सोन नदी से औरंगाबाद, डिहरी और सासाराम को पेयजल उपलब्ध कराने की योजना भी तेजी से आगे बढ़ रही है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में गिरते भूजल स्तर पर दबाव कम करना है।
बिहार के जल प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए विश्व बैंक ने भी सहयोग का हाथ बढ़ाया है। 4,415 करोड़ रुपये की ‘बिहार जल सुरक्षा एवं सिंचाई आधुनिकीकरण परियोजना’ को मंजूरी मिल चुकी है, जिसके तहत नहर तंत्र को डिजिटल और आधुनिक बनाया जाएगा। इससे पानी के वितरण में पारदर्शिता और दक्षता दोनों बढ़ेंगी।
बाढ़ नियंत्रण को लेकर भी सरकार ने समय से पहले तैयारी शुरू कर दी है। मानसून 2026 से पहले नदियों के किनारे बसे गांवों की सुरक्षा के लिए 447 करोड़ रुपये की 216 कटाव निरोधक योजनाएं तैयार की गई हैं। सरकार का लक्ष्य मार्च 2029 तक इन सभी बड़ी परियोजनाओं को पूरा कर बिहार को जल-संपन्न और बाढ़-सुरक्षित राज्य की श्रेणी में लाना है।
कुल मिलाकर बजट 2026 यह संदेश देता है कि बिहार में पानी अब सिर्फ संकट नहीं रहा। सरकार इसे एक सुव्यवस्थित सिस्टम में बदलने की कोशिश कर रही है, जहां सिंचाई, पेयजल और बाढ़ नियंत्रण एक-दूसरे से जुड़े हुए हों और राज्य की खेती, अर्थव्यवस्था व पर्यावरण—तीनों को मजबूती