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अधूरी पटरियों पर टिकी उम्मीदें, छपरा-मुजफ्फरपुर रेलखंड फिर बना जनआवाज़ का मुद्दा

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छपरा से मुजफ्फरपुर को सीधे जोड़ने वाली नई रेललाइन का सपना एक बार फिर इलाके के लोगों की जुबान पर लौट आया है। वर्षों पहले जिस परियोजना की नींव रखी गई थी, वह आज भी अधूरी पड़ी है, लेकिन अब सोशल मीडिया से लेकर गांव-कस्बों की बैठकों तक इसे दोबारा शुरू कराने की मांग तेज होती जा रही है। छपरा के लोग मानते हैं कि यह सिर्फ एक रेलखंड नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के विकास की चाबी है, जो लंबे समय से सरकारी फाइलों में दबकर रह गई।
साल 2007-08 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने छपरा-मुजफ्फरपुर नई रेललाइन का शिलान्यास किया था। उस समय परियोजना को लेकर जबरदस्त उत्साह था। कई इलाकों में जमीन अधिग्रहण हुआ, कई किलोमीटर तक मिट्टी डालकर रेलमार्ग का बेस भी तैयार कर दिया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार उस दौर में काम तेजी से आगे बढ़ रहा था और माना जा रहा था कि कुछ ही वर्षों में इस रूट पर ट्रेनें दौड़ने लगेंगी। लेकिन सत्ता बदली और इसके साथ ही यह परियोजना भी ठंडे बस्ते में चली गई।
आज स्थिति यह है कि करीब 84 से 86 किलोमीटर लंबे इस प्रस्तावित रेलखंड के कई हिस्से अधूरी कहानी की तरह खड़े हैं। कहीं ऊंचा मिट्टी का टीला नदी के बांध जैसा दिखाई देता है, तो कहीं उसी पर मवेशी चरते नजर आते हैं। कई स्थानों पर किसानों ने अस्थायी डेरा डाल लिया है। यह दृश्य हर दिन लोगों को याद दिलाता है कि कभी यहां से ट्रेन गुजरने वाली थी।
छपरा से गरखा, मकेर, सरैया होते हुए मुजफ्फरपुर तक प्रस्तावित इस रेललाइन को लेकर अब युवाओं की भूमिका खास नजर आ रही है। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाकर वे सरकार और जनप्रतिनिधियों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर यह रेलखंड बनता है तो शिक्षा, रोजगार और व्यापार—तीनों के लिए नए रास्ते खुलेंगे। खासकर छपरा और आसपास के इलाकों से मुजफ्फरपुर पढ़ने जाने वाले छात्रों को कम समय और कम किराए में सफर की सुविधा मिलेगी।
रेलखंड के निर्माण से रास्ते में छोटे-छोटे स्टेशनों का निर्माण प्रस्तावित है, जिनके आसपास बाजार, दुकानें और स्थानीय रोजगार के अवसर विकसित होंगे। नई सड़कों और संपर्क मार्गों का जाल भी बनेगा, जिससे ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह परियोजना पूरी होते ही पूरा इलाका विकास की मुख्यधारा से जुड़ जाएगा।
हालांकि सच्चाई यह भी है कि यह परियोजना लंबे समय से फंड की कमी और भू-अधिग्रहण की समस्याओं में उलझी हुई है। अब एक बार फिर से सर्वे और जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही जा रही है, जिससे लोगों की उम्मीदें फिर जागी हैं। सामाजिक कार्यकर्ता आलोक राय का कहना है कि यह रेललाइन सिर्फ दूरी कम नहीं करेगी, बल्कि हजारों लोगों को रोजी-रोजगार का जरिया भी देगी। उन्होंने स्थानीय सांसद राजीव प्रताप रूड़ी और रेल मंत्री से मांग की है कि इस अधूरी परियोजना को दोबारा प्राथमिकता दी जाए।
आज छपरा-मुजफ्फरपुर रेलखंड उन गिनी-चुनी योजनाओं में शामिल है, जो आधी बनी होने के बावजूद लोगों के मन में पूरी तरह जिंदा हैं। इलाके के लोग आज भी उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब इन अधूरी पटरियों पर सचमुच रेल दौड़ेगी और वर्षों से थमी उम्मीदों को नई रफ्तार 

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