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मुखियाओं की सुरक्षा पर सदन में सवाल, आर्म्स लाइसेंस को लेकर सरकार पर दबाव

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पटना। बिहार विधानसभा में सोमवार को पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा का मुद्दा केंद्र में रहा। त्रिस्तरीय पंचायत के मुखियाओं को आर्म्स लाइसेंस दिए जाने में हो रही देरी को लेकर राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक आलोक सिंह ने सरकार को घेरा और साफ कहा कि आदेश के एक साल बाद भी जमीनी हालात जस के तस बने हुए हैं।
विधानसभा की कार्यवाही के दौरान आलोक सिंह ने कहा कि मुखिया गांव की प्रशासनिक रीढ़ होते हैं। जमीन विवाद, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, लाभुक चयन और स्थानीय टकराव के कारण वे अक्सर दबाव और धमकियों के घेरे में रहते हैं। कई इलाकों में उन पर हमले तक की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा केवल व्यक्तिगत मसला नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण प्रशासन की मजबूती से जुड़ा सवाल है।
उन्होंने याद दिलाया कि सरकार ने खुद सभी जिलाधिकारियों को मुखियाओं को शस्त्र लाइसेंस देने के निर्देश जारी किए थे, लेकिन आज तक बड़ी संख्या में आवेदन लंबित हैं। विधायक ने इसे प्रशासनिक सुस्ती करार देते हुए कहा कि जब निर्णय सरकार का है, तो फिर फाइलें क्यों अटकी हुई हैं।
इस सवाल पर गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने सदन में जवाब देते हुए कहा कि सरकार मुखियाओं की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह गंभीर है। उन्होंने माना कि आर्म्स लाइसेंस की प्रक्रिया में तकनीकी जांच, पुलिस सत्यापन और सुरक्षा आकलन के कारण विलंब हुआ है, लेकिन अब इस देरी को खत्म करने का फैसला लिया गया है।
गृह मंत्री ने घोषणा की कि सात दिनों के भीतर सभी जिलाधिकारियों को स्पष्ट और सख्त निर्देश जारी किए जाएंगे। इन निर्देशों के तहत मुखियाओं के आवेदनों की जांच प्रक्रिया को तेज किया जाएगा और जहां वास्तविक सुरक्षा खतरा होगा, वहां प्राथमिकता के आधार पर आर्म्स या पिस्टल लाइसेंस दिए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लाइसेंस वितरण में किसी तरह की मनमानी नहीं होगी और पूरे मामले की निगरानी की जाएगी ताकि गलत इस्तेमाल की गुंजाइश न रहे।
सदन में दिए गए इस आश्वासन के बाद माना जा रहा है कि लंबे समय से लंबित मुखियाओं के आर्म्स लाइसेंस का मुद्दा अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है। पंचायत चुनावों की आहट के बीच सरकार भी यह संकेत देना चाहती है कि ग्रामीण स्तर पर काम कर रहे जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अब नजर इस पर है कि सात दिन की समय-सीमा में सरकार अपने वादे को किस हद तक जमीन पर उतार पाती है।

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