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वंदे भारत हो या हमसफर, ठहराव की लड़ाई में आगे पप्पू यादव पीछे स्थानीय नेता

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मोहम्मद आलम
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रूसेरा घाट रेलवे स्टेशन की उपेक्षा पर जनता नाराज़, पूर्णिया के सांसद ने उठाई आवाज़ – अपने सांसद-विधायक बने दर्शक
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समस्तीपुर रेल मंडल का रुसेरा घाट रेलवे स्टेशन आज भी बदहाली और उपेक्षा का प्रतीक बना हुआ है। रोज़ाना हजारों लोग यहाँ से सफ़र करते हैं, स्टेशन से सालाना करोड़ों का राजस्व रेलवे की झोली में जाता है, लेकिन सुविधा के नाम पर यात्रियों को निराशा ही मिलती है।

सांसद का बचाव – “हमने एक ही ट्रेन मांगी थी”

स्थानीय सांसद का तर्क है कि उन्होंने रेल मंत्री से केवल एक ट्रेन – अमृत भारत एक्सप्रेस का ठहराव मांगा था और वही चालू किया गया। लेकिन यह तर्क जनता को बेमानी लग रहा है।क्योंकि सच्चाई यह है कि रुसेरा घाट रेलवे स्टेशन से कई महत्वपूर्ण ट्रेनें गुजरती हैं – वंदे भारत, हमसफर, कर्मभूमि, उदयपुर सिटी, मुंबई समर स्पेशल और पूजा स्पेशल।तो सवाल उठता है कि जब इतनी सारी ट्रेनें इस स्टेशन से होकर जाती हैं, तो आखिर सांसद ने सिर्फ़ एक ट्रेन की ही मांग क्यों की?
क्या उन्हें अपने क्षेत्र के लोगों की असली तकलीफ़ों का अंदाज़ा नहीं है, या फिर मुद्दों को अधूरा उठाकर सिर्फ़ “काम करने का दिखावा” करना उनकी राजनीति बन गई है?

पप्पू यादव का प्रहार – “जनता की पूरी मांग”

इसके उलट पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने रेल मंत्री के समक्ष इन सभी ट्रेनों के ठहराव की मांग रखी है। साथ ही स्टेशन को अमृत भारत स्टेशन योजना में शामिल कर आधुनिकरण की बात भी की है।
यानी पप्पू यादव ने जो पहल की है, वह जनता की आवाज़ का संपूर्ण प्रतिनिधित्व करती है, जबकि स्थानीय सांसद का कदम आधा-अधूरा और सिर्फ़ दिखावे भर का लगता है।

जनता का गुस्सा – “क्या हमें अधूरी लड़ाई चाहिए?”

रुसेरा घाट की जनता कह रही है –
“हमारे सांसद ने अगर सिर्फ़ एक ट्रेन की मांग की, तो यह हमारे साथ धोखा है।जब हमारे स्टेशन से इतनी ट्रेनें गुजरती हैं, तो हमें हर ट्रेन का ठहराव चाहिए।सिर्फ़ एक ट्रेन का ठहराव देकर यह दिखाना कि उन्होंने बहुत बड़ा काम कर दिया, असल में जनता की समस्याओं से आँख मूँदना है।”इस पूरे प्रकरण से साफ़ है कि स्थानीय सांसद ने केवल “राजनीतिक खानापूरी” की, जबकि जनता की तकलीफ़ों को दिल्ली तक सचमुच पहुँचाने का काम पप्पू यादव ने किया।अब सवाल सिर्फ़ रेलवे से नहीं, बल्कि जनता के अपने सांसद से भी है –क्या वे आगे आकर बाकी ट्रेनों का ठहराव और स्टेशन के विकास की मांग करेंगे, या फिर पप्पू यादव जैसे बाहरी नेताओं के सहारे ही रुसेरा घाट को अपनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी?

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