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बिहार राज्यसभा चुनाव में बढ़ी सियासी हलचल, पांचवीं सीट के लिए बीजेपी-आरजेडी में कड़ा मुकाबला, पार्टी ने नियुक्त किए केंद्रीय पर्यवेक्षक

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पटना: बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। इस बार मुकाबला साधारण नहीं बल्कि बेहद दिलचस्प हो गया है, क्योंकि पांच सीटों पर छह उम्मीदवार मैदान में हैं और असली टक्कर पांचवीं सीट को लेकर बनती दिखाई दे रही है। इसी सीट को लेकर सत्ताधारी एनडीए और महागठबंधन के बीच जोरदार राजनीतिक रणनीति और जोड़-तोड़ की चर्चा तेज हो गई है। चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी तैयारी को और मजबूत करते हुए बिहार के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर दी है, ताकि पूरी चुनावी प्रक्रिया पर करीबी नजर रखी जा सके।
पार्टी की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के निर्देश पर अलग-अलग राज्यों में राज्यसभा चुनाव की निगरानी के लिए पर्यवेक्षक तैनात किए गए हैं। इस संबंध में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने सोमवार को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि बिहार में होने वाले चुनाव के लिए दो वरिष्ठ नेताओं को केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाया गया है।
बीजेपी ने बिहार के लिए छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हर्ष मल्होत्रा को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी है। दोनों नेताओं का दायित्व रहेगा कि वे चुनाव के दौरान पार्टी की रणनीति को मजबूत करें, विधायकों के बीच समन्वय बनाए रखें और मतदान प्रक्रिया पर नजर रखें। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि किसी भी स्तर पर चूक न हो और एनडीए के सभी उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित हो सके।
दरअसल इस चुनाव में बीजेपी ने दो उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिनमें नितिन नबीन और शिवेश कुमार राम शामिल हैं। राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से नितिन नबीन की जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन असली चुनौती शिवेश कुमार राम के सामने है। उन्हें जीत के लिए कुछ अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी और इसी कारण यह सीट चुनावी गणित का सबसे बड़ा केंद्र बन गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 41 विधायकों का समर्थन आवश्यक होता है। बिहार विधानसभा में एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं। यदि गठबंधन चार सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर लेता है तो उसके पास 38 वोट बचेंगे। ऐसे में पांचवीं सीट जीतने के लिए उसे कम से कम तीन अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। यही वजह है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दल चुनाव को लेकर पूरी तरह सतर्क दिखाई दे रहे हैं।
दूसरी ओर महागठबंधन की तरफ से भी इस सीट को लेकर रणनीति बनाई जा रही है। राष्ट्रीय जनता दल ने अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बनाया है और पार्टी को महागठबंधन के लगभग 35 विधायकों का समर्थन मिलने की उम्मीद है। हालांकि जीत के लिए उन्हें भी छह अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी, जिसके चलते चुनाव का परिणाम पूरी तरह से अन्य दलों के रुख पर निर्भर हो सकता है।
इस चुनाव में छोटे दलों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खासकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के पांच विधायक और बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक किसे समर्थन देते हैं, यह तय करेगा कि पांचवीं सीट पर किसकी जीत होगी। यही कारण है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे इन विधायकों पर खास नजर बनाए हुए हैं।
बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने दावा किया है कि एनडीए के सभी पांच उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित है। उनका कहना है कि गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल मौजूद है और विपक्ष के कुछ विधायक भी संपर्क में हैं। उन्होंने संकेत दिया कि मतदान के दिन क्रॉस वोटिंग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
उधर जेडीयू की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वरिष्ठ नेता रामनाथ ठाकुर मैदान में हैं, जबकि उपेंद्र कुशवाहा भी एक सीट के लिए प्रत्याशी बनाए गए हैं। इन सबके बीच पांचवीं सीट का समीकरण ही इस चुनाव को रोचक बना रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 16 मार्च को होने वाला मतदान बिहार की राजनीति के लिए नया संकेत दे सकता है। विधायकों की रणनीति, छोटे दलों का रुख और संभावित क्रॉस वोटिंग—इन सबके बीच यह चुनाव सिर्फ राज्यसभा की सीटों का नहीं बल्कि बिहार की बदलती सियासी धारा का भी संकेत माना जा रहा है।

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