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नीतीश कुमार के बाद बिहार का अगला मुख्यमंत्री: जातिगत समीकरण और EBC वोट बैंक पर सियासी नजर

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पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल हर चर्चा में है—नीतीश कुमार के बाद राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? चाय की दुकानों से लेकर गांव-मोहल्लों तक, लोग अलग-अलग अंदाज में भविष्य के मुख्यमंत्री के नाम पर अनुमान लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से ही होगा, लेकिन बिहार की राजनीति में सिर्फ पार्टी का दबदबा नहीं, बल्कि जातीय समीकरण और सामाजिक संतुलन भी निर्णायक होते हैं।
बिहार में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) लगभग 36 प्रतिशत आबादी रखता है, जो राज्य के सबसे बड़े वोट बैंक में से एक है। इसी कारण माना जा रहा है कि इस वर्ग से नया मुख्यमंत्री निकल सकता है। यह तथ्य बताता है कि बिहार में मुख्यमंत्री का चुनाव जातिगत समीकरणों और राजनीतिक गठबंधनों के आधार पर होता रहा है।
इतिहास देखें तो शुरुआती वर्षों में बिहार की राजनीति पर सवर्ण जातियों का दबदबा रहा। स्वतंत्रता के बाद ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत नेताओं ने लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद संभाला। ब्राह्मण समुदाय से छह मुख्यमंत्री बने, जिनमें बिनोदानंद झा और जगन्नाथ मिश्रा (दो बार) प्रमुख हैं। भूमिहार से पाँच मुख्यमंत्री बने, जैसे श्रीकृष्ण सिंह और भगवत झा आजाद, जबकि राजपूत समाज से तीन मुख्यमंत्री, जिनमें चंद्रशेखर सिंह शामिल हैं।
लेकिन 1990 के बाद मंडल राजनीति के आगमन ने बिहार की सियासी तस्वीर बदल दी। पिछड़ी जातियों और दलित समुदाय की राजनीतिक ताकत बढ़ी। यादव समाज से चार बार मुख्यमंत्री बने—लालू प्रसाद यादव दो बार और राबड़ी देवी दो बार। कुर्मी समाज से नीतीश कुमार कई बार मुख्यमंत्री बने, कुल मिलाकर चार कार्यकाल उनके हिस्से आए। इस बदलाव ने बिहार में जातीय राजनीति को और मजबूत किया।
स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का दबदबा रहा। 1946 में श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री बने और 1961 तक सत्ता में रहे। उस दौर में राजनीति में सवर्ण जातियों का प्रभुत्व था, लेकिन 1960 के दशक में हालात बदलने लगे। कांग्रेस के अंदर गुटबाजी बढ़ी और पिछड़े वर्गों के लोग भी सत्ता में हिस्सेदारी की मांग करने लगे। 1965-66 के सूखे और आर्थिक संकट ने सरकार की लोकप्रियता को कम किया और 1967 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद बिहार में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ और पिछड़े वर्गों के नेता मजबूती से उभरने लगे।
राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने पिछड़े समाज को राजनीति में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सामाजिक न्याय और बराबरी की बातें उठाईं, जिससे पिछड़े वर्गों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी।
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने यादव और मुस्लिम वोटरों का मजबूत गठबंधन बनाकर बिहार की राजनीति में नई दिशा दी। यह पहली बार था जब पिछड़े वर्गों की राजनीति ने सवर्ण वर्चस्व को चुनौती दी। 2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए और उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखा। नीतीश ने विशेष रूप से अति पिछड़े वर्ग (EBC) और महादलित समुदाय की हिस्सेदारी बढ़ाई, पंचायतों में आरक्षण और सामाजिक योजनाओं के माध्यम से इन वर्गों को सत्ता के समीप लाया।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बिहार में अगले मुख्यमंत्री का चुनाव केवल पार्टी लाइन पर नहीं, बल्कि जातिगत समीकरण, सामाजिक गठबंधन और वोट बैंक रणनीति पर आधारित होगा। आने वाले महीनों में यह देखने लायक होगा कि अगला मुख्यमंत्री EBC, पिछड़ा या सवर्ण जाति से किस वर्ग का चेहरा होगा, और किस तरह के गठबंधन उसे सत्ता की कुर्सी तक ले जाएंगे।

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