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बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण का खेल: नीतीश के बाद अगला मुख्यमंत्री कौन?

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पटना: बिहार की राजनीति में अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, यह सवाल इन दिनों हर चर्चा का केंद्र बन गया है। 20 साल तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार अब राज्यसभा के लिए जाने वाले हैं, जिससे बिहार में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी, इसे लेकर सियासी हलचल तेज है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार में मुख्यमंत्री का चयन सिर्फ राजनीतिक दल या पार्टी लाइन पर नहीं, बल्कि जातीय संतुलन और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर किया जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) की आबादी लगभग 36 प्रतिशत है, जो एक बड़ा वोट बैंक है। इसी वजह से इस वर्ग से नए मुख्यमंत्री का चेहरा आने की संभावना अधिक मानी जा रही है। इसके साथ ही पिछड़ी जातियां, यादव, कुर्मी और महादलित वर्ग भी राजनीतिक समीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं।
इतिहास देखें तो बिहार की शुरुआती राजनीति पर ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जैसे सवर्ण नेताओं का दबदबा था। 1946 में श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर 1961 तक कई ब्राह्मण और भूमिहार नेता मुख्यमंत्री रहे। 1960 के दशक में पिछड़ी जातियों की राजनीति सक्रिय हुई, जब कांग्रेस में गुटबाजी और सामाजिक असंतुलन के कारण पिछड़े वर्गों ने अपनी हिस्सेदारी की मांग शुरू की। राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता पिछड़े समाज को राजनीतिक मंच देने में अहम रहे।
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने यादव-मुस्लिम गठबंधन के जरिए पिछड़ी जातियों की राजनीति को नई दिशा दी। इसके बाद 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और अति पिछड़े वर्ग और महादलित समुदाय को विशेष प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक संतुलन बनाए रखने की रणनीति अपनाई। उन्होंने पंचायतों में आरक्षण, सामाजिक योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के माध्यम से पिछड़े वर्गों को सशक्त किया।
अब सवाल यह है कि नीतीश के बाद अगला मुख्यमंत्री किस जाति और समाज से आएगा। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी को अपने अगली मुख्यमंत्री रणनीति में जातीय समीकरण के साथ-साथ सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन पर भी ध्यान देना होगा। चाय की दुकानों से लेकर गांव-मोहल्लों तक हर जगह यह चर्चा जोरों पर है कि बिहार की कमान अब किस नेता के हाथ में होगी।
बिहार की राजनीति में जाति केवल वोट बैंक का मामला नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण, गठबंधन और सामाजिक संतुलन का अहम हिस्सा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस समीकरण को किस तरह साधते हैं और बिहार के अगले मुख्यमंत्री की पहचान किस सामाजिक वर्ग से होती है।

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