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समस्तीपुर का वीर सपूत शहीद, जम्मू-कश्मीर में मुठभेड़ के दौरान सीताराम राय ने दी सर्वोच्च बलिदान

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बिहार के समस्तीपुर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को गमगीन कर दिया है, लेकिन साथ ही गर्व से भी भर दिया है। जिले के मोरवा प्रखंड के लोदीपुर गांव निवासी भारतीय सेना के जवान सीताराम राय आतंकियों के साथ मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए। जैसे ही उनके शहादत की सूचना गांव पहुंची, हर आंख नम हो गई और हर दिल में अपने वीर सपूत के प्रति सम्मान उमड़ पड़ा।
बताया जा रहा है कि यह घटना जम्मू-कश्मीर में चल रहे एक सर्च ऑपरेशन के दौरान हुई। सेना को आतंकियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी, जिसके बाद जवानों की टीम इलाके में तलाशी अभियान चला रही थी। इसी दौरान अचानक मुठभेड़ शुरू हो गई और देश की रक्षा करते हुए सीताराम राय ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
शहादत की यह खबर जैसे ही परिवार तक पहुंची, घर में कोहराम मच गया। परिजनों के अनुसार, रात करीब 11 बजे उनकी पत्नी सुमन राय के पास सेना की ओर से फोन आया, जिसमें बताया गया कि सीताराम राय को ऑपरेशन के दौरान गोली लगी है। यह सूचना सुनते ही परिवार चिंता में डूब गया, लेकिन कुछ ही देर बाद जब उनके शहीद होने की पुष्टि हुई, तो पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
इस घटना को और भी मार्मिक बना देने वाली बात यह है कि शहादत से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपनी पत्नी से वीडियो कॉल पर बातचीत की थी। पत्नी सुमन राय ने बताया कि बुधवार सुबह उन्होंने फोन कर कहा था कि वे ड्यूटी पर जा रहे हैं और जल्द ही घर लौटेंगे। उस समय किसी को यह अंदाजा भी नहीं था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी। अब वही वीडियो कॉल परिवार के लिए अंतिम याद बनकर रह गई है।
सीताराम राय का जीवन संघर्ष और जिम्मेदारियों से भरा रहा। वे वर्ष 2002 में भारतीय सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। अपने करीब दो दशकों के सैन्य जीवन में उन्होंने कई कठिन अभियानों में हिस्सा लिया और हर बार साहस और समर्पण के साथ देश की सेवा की। उनके साथियों के अनुसार, वे बेहद अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ जवान थे, जो हर परिस्थिति में आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाते थे।
परिवार की बात करें तो उनके पीछे पत्नी, दो बेटे और एक बेटी हैं। उनके बड़े बेटे अनुज दोनों पैरों से दिव्यांग हैं, जिससे परिवार की जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं। इसके बावजूद सीताराम राय ने कभी अपने कर्तव्य से पीछे हटने का विचार नहीं किया। वे हमेशा परिवार और देश दोनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समान रूप से निभाते रहे।
शहीद के पिता सूरज राय ने बताया कि उनका परिवार बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आता है। उन्होंने ठेला चलाकर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया और कठिन परिस्थितियों में परिवार को संभाला। जब सीताराम को सेना में नौकरी मिली, तो पूरे परिवार को एक नई उम्मीद मिली। उन्होंने अपने कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी उठाई और सभी का सहारा बने।
गांव में शहादत की खबर फैलते ही शोक की लहर दौड़ गई। लोदीपुर गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों से भी लोग शहीद के घर पहुंचने लगे। हर कोई उनके परिवार को ढांढस बंधा रहा है और उनके बलिदान को सलाम कर रहा है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि सीताराम राय ने न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे गांव और जिले का नाम रोशन किया है।
स्थानीय लोगों के बीच गर्व और दुख का मिला-जुला माहौल है। एक ओर जहां अपने बेटे को खोने का दर्द है, वहीं दूसरी ओर इस बात का गर्व भी है कि उसने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। लोग कह रहे हैं कि ऐसे वीर सपूत ही देश की असली ताकत होते हैं।
प्रशासन की ओर से भी शहीद को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने की तैयारी की जा रही है। परिजनों के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। गांव के लोग अपने वीर सपूत के अंतिम दर्शन के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
यह घटना एक बार फिर यह याद दिलाती है कि देश की सीमाओं पर तैनात जवान किस तरह हर पल अपनी जान जोखिम में डालकर हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। जब हम अपने घरों में सुरक्षित होते हैं, तब वे कठिन परिस्थितियों में दुश्मनों का सामना कर रहे होते हैं।
सीताराम राय की शहादत केवल एक परिवार का नुकसान नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा।
आज पूरा बिहार और देश उनके इस सर्वोच्च बलिदान को नमन कर रहा है। उनके साहस, समर्पण और देशभक्ति की गाथा हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेगी।

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