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बिहार की गंगा-जमुनी तहजीब की अनोखी मिसाल: 28 साल से रोजा रख रहे सनातनी मुरली मनोहर, आस्था की कहानी कर देगी हैरान

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पटना/डुमरांव। बिहार की मिट्टी हमेशा से अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी सौहार्द के लिए जानी जाती रही है। यहां त्योहार सिर्फ धर्म का नहीं, बल्कि इंसानियत और आपसी जुड़ाव का प्रतीक होते हैं। इसी परंपरा को जीवंत करती एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो न सिर्फ चौंकाती है बल्कि दिल को छू भी जाती है। मुरली मनोहर श्रीवास्तव—एक कट्टर सनातनी परिवार से आने वाले शख्स—पिछले 28 वर्षों से लगातार रमजान में रोजा रख रहे हैं।
बक्सर जिले के डुमरांव निवासी मुरली मनोहर श्रीवास्तव आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वे फिलहाल मुख्यमंत्री आवास पटना में कार्यरत हैं, लेकिन उनकी पहचान अब सिर्फ एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की बन चुकी है, जो धर्म से ऊपर उठकर आस्था को जीता है। खास बात यह है कि वे न केवल रोजा रखते हैं, बल्कि नवरात्र, छठ जैसे हिंदू पर्व भी पूरे विधि-विधान से मनाते हैं।

एक सपना जिसने बदल दी जिंदगी

मुरली मनोहर बताते हैं कि यह सिलसिला किसी परंपरा से नहीं, बल्कि एक अजीब और दिव्य अनुभव से शुरू हुआ। वे कहते हैं कि जब वे अपने गांव में रहते थे, तब एक रात उन्हें सपना आया। सपने में एक अलौकिक चेहरा उनसे पूछ रहा था—“तुम रोजा क्यों नहीं रखते?” उस समय वे इस बात को समझ नहीं पाए। जब उन्होंने यह बात अपनी मां को बताई, तो मां ने कहा कि रोजा रखना कोई गलत बात नहीं है, अगर मन कहे तो जरूर रखना चाहिए।
बस, यहीं से उनकी जिंदगी की दिशा बदल गई। वर्ष 1998 से उन्होंने रमजान में रोजा रखना शुरू किया और तब से लेकर आज तक इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। वे बताते हैं कि एक बार बीमारी के कारण उन्हें कुछ दिनों का रोजा छोड़ना पड़ा था, लेकिन इसके अलावा उन्होंने कभी इस क्रम को नहीं तोड़ा।

न नौकरी बाधा बनी, न लोगों की बातें

आज के दौर में जहां छोटी-छोटी बातों पर लोग अपनी परंपराएं छोड़ देते हैं, वहीं मुरली मनोहर ने व्यस्त जीवन के बावजूद अपनी इस आस्था को कायम रखा है। वे रोजमर्रा के काम के साथ-साथ पूरी सादगी और नियम के साथ रोजा रखते हैं।
हालांकि, इस दौरान उन्हें कई बार लोगों की टिप्पणियों का सामना भी करना पड़ा। खासकर जब वे गांव से बाहर आए और पटना में रहने लगे, तब कई लोगों ने सवाल उठाए। लेकिन उन्होंने कभी इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। उनका साफ कहना है कि “इबादत के लिए किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होती।”

एक साथ रोजा भी, नवरात्र और छठ भी

मुरली मनोहर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वे किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं। वे कहते हैं कि वे पूरी श्रद्धा से नवरात्र का व्रत रखते हैं, छठ महापर्व मनाते हैं और उसी समर्पण के साथ रमजान में रोजा भी रखते हैं। उनके लिए हर पूजा, हर इबादत एक ही दिशा में ले जाती है—ईश्वर की ओर।
वे बताते हैं कि “जब आप सभी धर्मों को समझते हैं, तो अंत में एक ही बात सामने आती है कि ईश्वर एक है। बस उसे पाने के रास्ते अलग-अलग हैं।” उनकी यह सोच समाज को एक बड़ा संदेश देती है।

लेखक भी हैं मुरली मनोहर, कई किताबें लिख चुके

मुरली मनोहर सिर्फ आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि अपने लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने कई विषयों पर किताबें लिखी हैं, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पर लिखी गई उनकी पुस्तक को लेकर हुई। इस किताब के लिए उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हो चुका है।
इसके अलावा वे भोजपुरी भाषा में कुरान का अनुवाद भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर धार्मिक ग्रंथ लोगों की अपनी भाषा में उपलब्ध होंगे, तो वे उसे बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। लगभग 600 पेज का अनुवाद वे पूरा कर चुके हैं। इसके साथ ही उन्होंने वीर कुंवर सिंह और नीतीश कुमार पर भी किताबें लिखी हैं।

धर्म नहीं, इंसानियत सबसे ऊपर

मुरली मनोहर श्रीवास्तव का मानना है कि धर्म का असली मतलब लोगों को जोड़ना है, न कि बांटना। वे कहते हैं कि “अगर दिल साफ है और नीयत अच्छी है, तो चाहे पूजा करें या रोजा रखें—हर इबादत कबूल होती है।”
उनकी यह सोच आज के समय में बेहद प्रासंगिक है, जब समाज को एकजुट रखने की सबसे ज्यादा जरूरत है। वे बताते हैं कि गांव में उन्हें कभी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन शहर में कुछ लोगों ने सवाल जरूर उठाए। फिर भी उन्होंने अपने रास्ते से कभी समझौता नहीं किया।

बिहार की पहचान बनती ऐसी कहानियां

बिहार में एक तरफ जहां सरकार धार्मिक आयोजनों और मेलों के सुचारू संचालन के लिए करोड़ों रुपये की राशि स्वीकृत कर रही है, वहीं दूसरी ओर मुरली मनोहर जैसे लोग अपनी जीवनशैली से यह साबित कर रहे हैं कि असली ताकत आपसी भाईचारे और सम्मान में है।
उनकी कहानी यह बताती है कि आस्था किसी एक दायरे में सीमित नहीं होती। यह दिल से जुड़ी होती है और जब दिल से की जाती है, तो हर इबादत एक जैसी हो जाती है।

एक मिसाल, जो दिलों को जोड़ती है

आज मुरली मनोहर श्रीवास्तव सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सोच बन चुके हैं। उनकी 28 साल की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि अगर इंसान चाहे, तो वह हर दीवार को तोड़कर एक नई मिसाल कायम कर सकता है।
उनकी कहानी न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है—जहां धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत को महत्व दिया जाता है।

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