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पटना में साइबर ठगी का बड़ा खुलासा: 12 हजार के लालच में गरीब महिलाओं के खाते बने ‘म्यूल अकाउंट’, बैंक कर्मियों पर भी शिकंजा

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पटना। राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में साइबर अपराध का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां गरीब और ग्रामीण महिलाओं को सरकारी योजनाओं का झांसा देकर बड़े पैमाने पर ठगी का जाल बिछाया गया। इस संगठित गिरोह ने महिलाओं को 12-12 हजार रुपये दिलाने का सपना दिखाकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए और उन्हीं खातों का इस्तेमाल साइबर अपराध से कमाई गई रकम को ट्रांसफर करने और निकालने के लिए किया।
यह पूरा मामला पटना के बख्तियारपुर और सलेमपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां पुलिस जांच में एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जानकारी के अनुसार, ठगों ने सुनियोजित तरीके से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को निशाना बनाया। उन्हें बताया गया कि सरकार की ओर से शौचालय निर्माण, घर की मरम्मत और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता दी जा रही है, जो सीधे बैंक खाते में भेजी जाएगी। इसी बहाने महिलाओं को बैंक में खाता खुलवाने के लिए प्रेरित किया गया।
गिरोह की चालाकी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस काम को अंजाम देने के लिए एक सामाजिक माहौल तैयार किया। बख्तियारपुर इलाके के एक मैरिज हॉल में भोज का आयोजन किया गया, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाओं को बुलाया गया। इसी कार्यक्रम के दौरान ठगों ने मौके का फायदा उठाकर सैकड़ों बैंक खाते खुलवा दिए। बताया जाता है कि करीब 100 से अधिक खाते इस तरीके से खोले गए।
जांच में सामने आया है कि ये खाते अलग-अलग बैंकों की शाखाओं में खोले गए, जिनमें प्रमुख रूप से बैंक ऑफ इंडिया की बख्तियारपुर और सलेमपुर शाखा तथा इंडियन ओवरसीज बैंक की शाखा शामिल हैं। इस पूरे मामले में बैंक के कुछ कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ठगी का यह खेल बिना अंदरूनी सहयोग के संभव नहीं था।
पुलिस को जब साइबर ठगी से जुड़े कई मामलों में इन खातों का लिंक मिला, तब जाकर पूरे मामले का खुलासा हुआ। सलेमपुर थाना की साइबर टीम ने जांच शुरू की और धीरे-धीरे इस गिरोह की परतें खुलने लगीं। जांच के दौरान यह पाया गया कि खाता खोलने की प्रक्रिया में कई अनियमितताएं बरती गईं। एक ही आवेदन पत्र में अलग-अलग हस्तलिपि का इस्तेमाल, मोबाइल नंबरों में काट-छांट और अलग-अलग रंग की स्याही का प्रयोग इस बात का संकेत था कि दस्तावेजों में हेरफेर किया गया है।
खाताधारक महिलाओं से उनकी तस्वीर, आधार कार्ड और फिंगरप्रिंट लेकर केवाईसी की प्रक्रिया पूरी की गई, जिससे खाते पूरी तरह वैध दिखाई दें। लेकिन इन खातों के संचालन की जानकारी महिलाओं को नहीं थी। उनके नाम पर खाते तो खुले, लेकिन उन खातों में आने-जाने वाले पैसों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि इन खातों का इस्तेमाल ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में किया जा रहा था। यानी साइबर अपराध के जरिए जो रकम ठगी जाती थी, उसे इन खातों में ट्रांसफर किया जाता और फिर अलग-अलग शहरों में एटीएम के जरिए निकाल लिया जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में खाताधारक महिलाओं को यह तक पता नहीं चलता था कि उनके खाते में लाखों रुपये का लेन-देन हो रहा है।
इस गिरोह की गतिविधियां सैदपुर, मुरादपुर और सुंदरपुर जैसे गांवों में अधिक सक्रिय थीं। गांव-गांव जाकर महिलाओं को योजनाओं का लाभ दिलाने का भरोसा दिलाया जाता और उन्हें बैंक ले जाकर खाते खुलवाए जाते। इस पूरे नेटवर्क में कुछ स्थानीय लोगों की भी भूमिका सामने आई है, जिन्होंने महिलाओं को भरोसा दिलाने और उन्हें तैयार करने का काम किया।
जांच के दौरान पुलिस ने इस मामले में कुछ नामों की पहचान की है, जिनमें एक महिला सीता कुमारी की भूमिका अहम बताई जा रही है। उसने ग्रामीण महिलाओं को इस योजना के लिए राजी करने में मुख्य भूमिका निभाई। इसके अलावा अवध राय, कुमारी देवी और विभा देवी के नाम भी सामने आए हैं, जो इस नेटवर्क का हिस्सा बताए जा रहे हैं।
इस मामले की सच्चाई तब सामने आई जब कई महीनों तक महिलाओं को उनके खातों में किसी तरह की सरकारी सहायता राशि नहीं मिली। संदेह होने पर जब वे बैंक पहुंचीं, तो उन्हें बताया गया कि उनके खातों में संदिग्ध लेन-देन के कारण ट्रांजेक्शन पर रोक लगा दी गई है। यह सुनकर महिलाएं हैरान रह गईं और उन्होंने तुरंत पुलिस से संपर्क किया।
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए जांच को आगे बढ़ाया और अब तक तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में एक बैंक कर्मचारी धीरेंद्र कुमार भी शामिल है, जिसकी भूमिका इस पूरे नेटवर्क में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसके अलावा चंदन कुमार और अवध राय को भी हिरासत में लिया गया है। सभी आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
पुलिस अब इस मामले में बैंक शाखा प्रबंधकों की भूमिका की भी जांच कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या यह केवल कुछ कर्मचारियों की करतूत थी या इसमें उच्च स्तर पर भी मिलीभगत शामिल है। नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर इन खातों से जुड़े 100 से अधिक मामले दर्ज पाए गए हैं, जिनमें करोड़ों रुपये की ठगी की आशंका जताई जा रही है।
यह घटना न केवल साइबर अपराध के बढ़ते खतरे को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे जागरूकता की कमी और भरोसे का फायदा उठाकर अपराधी गरीब और असहाय लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। प्रशासन और पुलिस के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि ऐसे गिरोहों पर सख्ती से कार्रवाई की जाए और लोगों को इस तरह के झांसे से बचने के लिए जागरूक किया जाए।
फिलहाल पुलिस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की कोशिश में जुटी है और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

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