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बिहार की जीविका दीदियां अब बनाएंगी इंडक्शन चूल्हा: तकनीक, रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई उड़ान

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पटना: बिहार की ग्रामीण महिलाएं अब सिर्फ स्वयं सहायता समूहों तक सीमित पहचान नहीं रखेंगी, बल्कि तकनीकी उत्पादन और ऊर्जा समाधान के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराएंगी। राज्य की जीविका दीदियां अब इंडक्शन चूल्हा बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। यह पहल न केवल महिलाओं को नई तकनीकी दक्षता देगी, बल्कि ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ और सुविधाजनक ऊर्जा विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में भी बड़ा कदम मानी जा रही है।
अब तक सोलर प्लेट, सोलर लैंप और एलईडी बल्ब निर्माण में अपनी क्षमता साबित कर चुकी जीविका से जुड़ी महिलाएं अब रसोई से जुड़ी एक बेहद उपयोगी तकनीक—इंडक्शन चूल्हा—के निर्माण में प्रशिक्षित की जाएंगी। राज्य सरकार ने इस परियोजना के तहत 7 हजार महिलाओं को प्रशिक्षण देने की योजना बनाई है। इससे न केवल महिलाओं की आमदनी बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि गांवों में तकनीक आधारित आजीविका का नया मॉडल भी विकसित होगा।
इस पहल को बिहार में महिला सशक्तिकरण और स्वच्छ ऊर्जा के एक बड़े अभियान के रूप में देखा जा रहा है। खास बात यह है कि यह योजना सिर्फ उत्पाद निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं को तकनीकी रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की सोच के साथ आगे बढ़ाई जा रही है। इसका उद्देश्य महिलाओं को केवल मजदूर या असेंबली वर्कर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसी प्रशिक्षित तकनीशियन के रूप में तैयार करना है, जो भविष्य में उत्पादन, मरम्मत, सर्विसिंग और छोटे स्तर पर उद्यम संचालन तक की भूमिका निभा सकें।
इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी जीविका वुमेन इनिशिएटिव फॉर रिन्यूएबल एनर्जी एंड सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड, गया को सौंपी गई है। यह संस्था पहले से ही ग्रामीण महिलाओं को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादों के निर्माण और विपणन से जोड़ने का काम कर रही है। अब इसी अनुभव को विस्तार देते हुए इंडक्शन चूल्हा निर्माण को अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।
इस पूरी योजना की सबसे खास बात यह है कि महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए देश के दो प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों—IIT मुंबई और IIT दिल्ली—से जुड़े इंजीनियरों की विशेषज्ञता का सहयोग लिया जाएगा। यानी गांवों की महिलाएं अब सिर्फ हाथ से काम करना नहीं सीखेंगी, बल्कि उन्हें आधुनिक तकनीक, मशीन, डिजाइन, सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कार्यप्रणाली की भी समझ दी जाएगी।
ग्रामीण भारत की पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के लिए यह अवसर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आमतौर पर तकनीकी क्षेत्र को शहरों, इंजीनियरिंग कॉलेजों और बड़े उद्योगों तक सीमित समझा जाता रहा है, लेकिन बिहार की यह पहल इस सोच को बदलने का प्रयास कर रही है। अब गांव की महिलाएं भी तकनीकी उत्पादों के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा सकेंगी और यह संदेश जाएगा कि नवाचार और तकनीक सिर्फ बड़े शहरों की संपत्ति नहीं है।
जीविका के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी हिमांशु शर्मा के अनुसार, इस योजना के लिए उन महिलाओं की पहचान की जा रही है, जिनमें व्यवसायिक समझ, सीखने की इच्छा और तकनीकी कार्यों में रुचि हो। इसका मतलब यह है कि यह कार्यक्रम केवल प्रशिक्षण भर नहीं होगा, बल्कि महिलाओं के भीतर मौजूद नेतृत्व, उद्यमिता और तकनीकी क्षमता को भी आगे लाने का माध्यम बनेगा।
इस प्रशिक्षण के बाद महिलाएं सिर्फ किसी फैक्ट्री की सामान्य कार्यकर्ता नहीं रहेंगी, बल्कि वे कुशल तकनीकी कर्मी के रूप में विकसित होंगी। इससे उनकी आय के नए रास्ते खुलेंगे और वे अपने गांव या आसपास के इलाके में तकनीकी सेवा देने वाली उद्यमी भी बन सकती हैं। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो आने वाले समय में बिहार के ग्रामीण इलाकों में महिला-आधारित इलेक्ट्रॉनिक और ऊर्जा उत्पाद माइक्रो-इंडस्ट्री का एक नया नेटवर्क तैयार हो सकता है।
इस परिवर्तन की नींव कुछ साल पहले ही रखी जा चुकी थी। 6 जनवरी 2020 को “स्वच्छ ऊर्जा-सशक्त महिला” की सोच के साथ गया में एक विशेष कंपनी की स्थापना की गई थी। इस पहल का उद्देश्य था कि ग्रामीण महिलाओं को ऐसे उत्पादों के निर्माण से जोड़ा जाए, जो समाज के लिए उपयोगी हों और महिलाओं की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करें। इसी दिशा में पहले महिलाओं ने सोलर लैंप और सोलर प्लेट्स के निर्माण में उल्लेखनीय काम किया। अब तक 7 हजार से अधिक जीविका दीदियां इस व्यवस्था से जुड़ चुकी हैं और बिहार के विभिन्न हिस्सों में इनके उत्पादों की सप्लाई की जा रही है।
अब इंडक्शन चूल्हा निर्माण को इस सफर का अगला चरण माना जा रहा है। इसका सीधा संबंध ग्रामीण रसोई और घरेलू जरूरतों से है। बिहार के कई गांवों में अब भी खाना पकाने के लिए एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता, रिफिल की दिक्कत, लागत और समय पर सप्लाई जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। ऐसे में इंडक्शन चूल्हा एक वैकल्पिक और अपेक्षाकृत सुविधाजनक साधन बन सकता है—खासकर उन परिवारों के लिए जहां बिजली की उपलब्धता बेहतर हो रही है।
जीविका द्वारा तैयार किए जाने वाले इंडक्शन चूल्हों की एक बड़ी विशेषता यह भी होगी कि वे बाजार में मिलने वाले उत्पादों की तुलना में किफायती हो सकते हैं। चूंकि इनका निर्माण स्थानीय स्तर पर होगा, इसलिए इनके दाम अपेक्षाकृत कम रखे जा सकते हैं। इससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों को सस्ता विकल्प मिलेगा। साथ ही यदि किसी चूल्हे में खराबी आती है, तो उसकी मरम्मत और सर्विसिंग गांव या जिले के स्तर पर ही उपलब्ध कराई जा सकेगी। यह सुविधा ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अक्सर बाहर से खरीदे गए इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की सर्विसिंग कराना मुश्किल और महंगा साबित होता है।
इस योजना को लेकर बाजार में शुरुआती उत्साह भी देखने को मिला है। बिहार दिवस के अवसर पर गांधी मैदान में लगाए गए स्टॉल पर इन इंडक्शन चूल्हों को लेकर लोगों की अच्छी दिलचस्पी देखी गई। जानकारी के अनुसार, वहां तीन दिनों में 10 चूल्हों की बिक्री हुई, जबकि कई लोगों ने पहले से ही एडवांस बुकिंग भी कराई। यह संकेत है कि अगर उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत और सेवा व्यवस्था सही रही, तो इसकी मांग ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में तेजी से बढ़ सकती है।
यह पहल सिर्फ एक उत्पाद तैयार करने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह बिहार में महिलाओं की भूमिका को नई परिभाषा देने की दिशा में उठाया गया कदम है। लंबे समय तक ग्रामीण महिलाएं केवल कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प या घरेलू श्रम तक सीमित मानी जाती रही हैं। लेकिन अब वे ऊर्जा तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बना रही हैं। यह बदलाव बिहार की सामाजिक और आर्थिक संरचना के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
यदि राज्य सरकार और जीविका इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर पाती हैं, तो आने वाले समय में यह सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। इसे देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक रोल मॉडल के रूप में देखा जा सकता है, जहां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को तकनीकी उत्पादन से जोड़ने की संभावनाएं मौजूद हैं।
कुल मिलाकर बिहार की जीविका दीदियां अब आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखने की तैयारी में हैं। सोलर उत्पादों के बाद इंडक्शन चूल्हा निर्माण की दिशा में उनका कदम यह साबित करता है कि यदि सही प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और बाजार उपलब्ध हो, तो ग्रामीण महिलाएं किसी भी क्षेत्र में नई पहचान बना सकती हैं। यह पहल न सिर्फ रोजगार और आय का साधन बनेगी, बल्कि बिहार के गांवों तक स्वच्छ, सस्ती और स्थानीय ऊर्जा तकनीक पहुंचाने का रास्ता भी खोलेगी।

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