:
Breaking News

बिहार में यूसीसी का मुद्दा: बीजेपी सत्ता संभालते ही लागू कर सकती है समान नागरिक संहिता

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

बिहार में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने की तैयारी, बीजेपी अगले सीएम के कंधों पर जिम्मेदारी

बिहार वर्तमान में कई सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों से जूझ रहा है। बढ़ती जनसंख्या घनत्व और घुसपैठ ने राज्य की डेमोग्राफी को बदल दिया है। इन परिस्थितियों में संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है और पलायन की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। अब जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं, ऐसे में पहली बार सत्ता का पूरा नियंत्रण भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के हाथ में होने जा रहा है। सत्ता हस्तांतरण की आहट के बीच राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) की मांग भी जोर पकड़ रही है।

अचानक यूसीसी की चर्चा क्यों?

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नीतीश कुमार के बाद बिहार का मुख्यमंत्री बीजेपी से होगा, इसलिए पार्टी नेता सत्ता परिवर्तन के पहले ही इस मुद्दे को उठाना चाहते हैं। बीजेपी का एजेंडा लंबे समय से यूसीसी पर केंद्रित रहा है। उत्तराखंड और हाल ही में गुजरात में यह कानून लागू किया जा चुका है। इन राज्यों के अनुभव को ध्यान में रखते हुए अब बिहार में भी इस पर चर्चा तेज हो गई है।

यह भी पढ़ें: बिहार में राजनीति और विकास के नए अध्याय⁠�

बीजेपी का पुराना एजेंडा

बीजेपी हमेशा ‘एक देश, एक संविधान, एक निशान’ के नारों के तहत समान नागरिक संहिता की पैरवी करती रही है। 1990 से 2014 तक पार्टी के घोषणापत्र में यूसीसी शामिल रहा, लेकिन गठबंधन की मजबूरी और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी की सरकार ने तीन तलाक बिल पास कर महिलाओं के अधिकार मजबूत किए। इसके बाद उत्तराखंड और गुजरात में यूसीसी लागू किया जा चुका है।

अगले मुख्यमंत्री के कंधों पर जिम्मेदारी

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार में पहली बार बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी सीधे उनके कंधों पर होगी। बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल का कहना है कि यूसीसी का मुख्य उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करना है। इसके तहत शादी, तलाक, संपत्ति और विरासत के मामलों में सभी के लिए समान नियम होंगे।

“बिहार के लिए यूसीसी जरूरी है। कई पर्सनल लॉ में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिला है, जबकि यूसीसी लागू होने पर उन्हें समान अधिकार मिलेगा और महिलाएं सशक्त होंगी। सहयोगी दलों से भी हमें उम्मीद है कि वे सकारात्मक सहयोग करेंगे। आने वाले समय में जनता दल यूनाइटेड के लोग भी समर्थन देंगे।”

— प्रेम रंजन पटेल, प्रवक्ता, बिहार बीजेपी

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया

मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी यूसीसी के पक्ष में नहीं है। प्रवक्ता एजाज अहमद का कहना है कि संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित है। अनुच्छेद 29 और 30 के तहत सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों को अपनी संस्कृति के अनुसार जीने का अधिकार है।

जेडीयू फिलहाल इस पर चुप्पी साधे हुए है। पार्टी की सेक्यूलर छवि के कारण यूसीसी को विवादास्पद माना जाता है। पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा, “इस मुद्दे पर अभी कुछ भी कहना ठीक नहीं है। कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है।”

एनडीए के अन्य सहयोगी दल, जैसे हम और एलजेपी (रामविलास) यूसीसी के पक्ष में हैं, लेकिन वे कहते हैं कि इसे लागू करने से पहले संबंधित पक्ष की चिंता का ध्यान रखा जाना चाहिए।

“समान नागरिक संहिता देश के लिए जरूरी है। जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव की जरूरत नहीं है। अगर बिहार में यह कानून लागू होता है तो हमारी पार्टी इसका समर्थन करेगी।”

— संतोष कुमार सुमन, हम अध्यक्ष सह मंत्री, बिहार सरकार

यह भी पढ़ें: [उत्तराखंड और गुजरात में UCC लागू, बिहार में तैयारी]

विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. संजय कुमार के अनुसार, बिहार जैसे राज्य में समान नागरिक संहिता लागू होना सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बढ़ती जनसंख्या और घुसपैठ को नियंत्रित करने में UCC मददगार साबित हो सकती है। यह कानून महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाएगा और अदालतों में मामलों की गति भी बढ़ेगी।

संविधान और कानून विशेषज्ञ प्रो. डॉ. राजीव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर यूसीसी पर राय दी है। शायरा बानो के मामले में तीन तलाक असंवैधानिक कर दिया गया, जिससे महिलाओं को अधिकार मिले। प्रो. राजीव कहते हैं, “UCC लागू होने से सभी धर्मों के पर्सनल लॉ को एक समान बनाया जाएगा और नागरिकों के बीच कानूनी असमानता खत्म होगी। यह महिला सशक्तिकरण और न्यायपालिका की दक्षता के लिए महत्वपूर्ण कदम है।”

सुप्रीम कोर्ट के मामले

1985 में शाह बानो केस ने यूसीसी पर बहस को शुरू किया। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 44 के आधार पर केंद्र सरकार को सलाह दी कि देश में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। बाद में सरला मुद्गल और जॉन वलामट्टोम केस में भी कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि अलग-अलग पर्सनल लॉ असमानता पैदा कर रहे हैं और समय की जरूरत है कि यूसीसी लागू किया जाए।

यूसीसी क्या है?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुख्य उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू करना है। इसमें विवाह, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार और बच्चे के भरण-पोषण जैसे मामलों को शामिल किया जाता है। इसका लागू होने से महिलाएं कानूनी रूप से अधिक सशक्त होंगी और सामाजिक न्याय मजबूत होगा।

डॉ. राजीव बताते हैं कि कानून धर्म की स्वतंत्रता को खत्म नहीं करता, बल्कि सभी सिविल मामलों में समान अधिकार सुनिश्चित करता है। केंद्र की 2018 की लॉ कमीशन रिपोर्ट ने भी थर्ड जेंडर को विवाह का अधिकार देने की सिफारिश की थी। नए UCC कानून में सभी धर्मों के पर्सनल लॉ का ध्यान रखा जाएगा।

यह भी पढ़ें: [शाह बानो केस और भारतीय न्यायपालिका का UCC पर दृष्टिकोण]

इस तरह बिहार में समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। बीजेपी सत्ता संभालते ही इसे लागू करने की योजना बना रही है, जबकि विपक्ष और कुछ सहयोगी दल इस पर विचार कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम महिला सशक्तिकरण, सामाजिक समानता और न्यायपालिका की दक्षता के लिए जरूरी है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *