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असम में सियासी जमीन तलाश रहा झामुमो, डिब्रूगढ़ बैठक में हेमंत सोरेन ने दिया बड़ा चुनावी संदेश
- Reporter 12
- 31 Mar, 2026
JMM Assam Election 2026: असम विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर डिब्रूगढ़ में हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में झामुमो की अहम बैठक हुई। जानिए पार्टी की रणनीति, किन इलाकों पर फोकस और क्या है चुनावी प्लान।
रांची/डिब्रूगढ़: असम विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक हलचल धीरे-धीरे तेज होती जा रही है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के साथ अब झारखंड की राजनीति में मजबूत पहचान रखने वाला झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) भी असम में अपनी संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुट गया है। इसी कड़ी में डिब्रूगढ़ में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक ने साफ संकेत दे दिया है कि पार्टी आने वाले चुनाव को सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर नहीं, बल्कि रणनीतिक तरीके से देख रही है।
सोमवार को हुई इस संगठनात्मक बैठक में झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं मौजूद रहकर कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को चुनावी तैयारी का संदेश दिया। बैठक में पार्टी की मौजूदा स्थिति, जमीनी उपस्थिति, संभावित सीटों, सामाजिक समीकरणों और संगठन विस्तार पर विस्तार से चर्चा की गई। इस बैठक का सबसे अहम संकेत यह रहा कि झामुमो अब असम के उन इलाकों में अपनी पैठ बनाना चाहता है, जहां आदिवासी समुदाय, चाय बागान श्रमिक, और झारखंड-बिहार-पश्चिम बंगाल मूल के श्रमिक परिवार बड़ी संख्या में रहते हैं।
असम में क्यों सक्रिय हुआ झामुमो?
असम की राजनीति लंबे समय से जातीय, क्षेत्रीय और पहचान आधारित मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में झामुमो जैसी पार्टी, जिसकी मूल राजनीति आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन, और हाशिए के समुदायों के अधिकार पर आधारित रही है, अब असम में अपने लिए राजनीतिक अवसर तलाश रही है।
दरअसल, असम के कई इलाकों में दशकों से चाय बागानों में काम करने वाले समुदाय रहते हैं, जिनकी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां अब भी बड़ी चुनावी बहस का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं समुदायों के बीच झामुमो खुद को एक वैकल्पिक आवाज के रूप में पेश करना चाहता है। पार्टी को लगता है कि अगर वह इन तबकों के बीच भरोसे का माहौल बना लेती है, तो भविष्य में उसे असम की राजनीति में एक पहचान मिल सकती है।
डिब्रूगढ़ बैठक में क्या हुआ?
डिब्रूगढ़ में हुई इस बैठक को महज एक औपचारिक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे चुनाव पूर्व संगठनात्मक खाका तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। बैठक में असम के अलग-अलग जिलों से आए पार्टी कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और स्थानीय स्तर के नेताओं ने अपनी-अपनी रिपोर्ट रखी।
बताया गया कि किन क्षेत्रों में पार्टी की मौजूदगी है, कहां संगठन को मजबूत करने की जरूरत है, किन इलाकों में जनसंपर्क अभियान चलाया जा सकता है और किन मुद्दों को जनता के बीच ले जाना चाहिए।
हेमंत सोरेन ने बैठक के दौरान साफ कहा कि अगर पार्टी को असम में राजनीतिक जमीन बनानी है, तो सिर्फ नारों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए गांव-गांव, बस्ती-बस्ती और श्रमिक इलाकों तक पहुंचना होगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया कि वे जनता से सीधा संवाद बढ़ाएं और लोगों को यह समझाएं कि झामुमो सिर्फ चुनाव लड़ने नहीं, बल्कि उनके मुद्दों को आवाज देने आया है।
आदिवासी और चाय बागान क्षेत्रों पर खास नजर
इस बैठक की सबसे बड़ी राजनीतिक लाइन यही रही कि झामुमो असम में आदिवासी बहुल क्षेत्रों और चाय बागान बेल्ट को अपनी प्राथमिकता बनाने जा रहा है।
असम में चाय उद्योग से जुड़े लाखों परिवार वर्षों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझते रहे हैं। मजदूरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार सुरक्षा और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे इन इलाकों में बेहद संवेदनशील हैं।
झामुमो की कोशिश है कि वह इन सवालों को सिर्फ भाषण का हिस्सा न बनाए, बल्कि इन्हें संगठन विस्तार का आधार बनाए। पार्टी यह समझ रही है कि अगर इन इलाकों में भरोसेमंद नेटवर्क खड़ा हो गया, तो उसे चुनाव में सीधा लाभ मिल सकता है।
इसी तरह आदिवासी समाज से जुड़े भूमि, पहचान, आरक्षण, स्थानीय प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दे भी पार्टी के एजेंडे के केंद्र में रहेंगे।
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हेमंत सोरेन का संदेश क्या बताता है?
इस बैठक में हेमंत सोरेन की मौजूदगी अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत है। आम तौर पर किसी दूसरे राज्य में पार्टी विस्तार की प्रक्रिया को स्थानीय इकाइयों के भरोसे छोड़ दिया जाता है, लेकिन जब खुद पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री स्तर का नेता वहां पहुंचकर बैठक करे, तो उसका मतलब साफ होता है—पार्टी इसे गंभीरता से ले रही है।
हेमंत सोरेन ने कार्यकर्ताओं से अनुशासन, एकजुटता और निरंतर जनसंपर्क पर जोर दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि असम में पार्टी को किसी तात्कालिक शोर-शराबे की नहीं, बल्कि धैर्य के साथ संगठन निर्माण की जरूरत है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह संदेश इसलिए भी अहम है क्योंकि पूर्वोत्तर की राजनीति में बाहरी दलों के लिए जमीन बनाना आसान नहीं होता। ऐसे में झामुमो अगर अपनी विचारधारा को स्थानीय सामाजिक प्रश्नों से जोड़ने में सफल होता है, तो उसे धीरे-धीरे राजनीतिक जगह मिल सकती है।
क्या सिर्फ संगठन मजबूत करना है या चुनावी दांव भी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या झामुमो असम में सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है, या फिर वह कुछ सीटों पर गंभीर चुनावी दांव भी लगाने की तैयारी में है।
फिलहाल पार्टी की रणनीति से यही संकेत मिल रहा है कि वह पहले संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रही है। लेकिन यह भी साफ है कि अगर कुछ सीटों पर सामाजिक समीकरण और स्थानीय नेटवर्क उसके पक्ष में बनते दिखे, तो वह चुनावी मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटेगी।
असम में ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां श्रमिक, आदिवासी और सामाजिक रूप से उपेक्षित समूह बड़ी संख्या में हैं। अगर झामुमो वहां अपनी पकड़ बना लेता है, तो कुछ सीटों पर वह चुनावी समीकरण को प्रभावित करने वाली ताकत बन सकता है।
क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय का कार्ड
झामुमो की राजनीति का मूल आधार हमेशा से क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक न्याय रहा है। असम में भी पार्टी इन्हीं दो बड़े मुद्दों को अपने विस्तार का आधार बना सकती है।
एक ओर वह आदिवासी और श्रमिक समुदायों की समस्याओं को उठाएगी, दूसरी ओर स्थानीय पहचान, सांस्कृतिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे सवालों को भी सामने रखेगी।
यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि असम में पहचान की राजनीति हमेशा प्रभावशाली रही है। हालांकि यहां झामुमो के सामने चुनौती यह होगी कि वह खुद को बाहरी राजनीतिक प्रयोग के बजाय स्थानीय मुद्दों की विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित करे।
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वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी क्यों रही अहम?
बैठक में मंत्री चमरा लिंडा समेत कई वरिष्ठ नेता और संगठन के प्रमुख कार्यकर्ता मौजूद रहे। यह मौजूदगी सिर्फ औपचारिकता नहीं थी, बल्कि इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि पार्टी का पूरा नेतृत्व असम विस्तार को लेकर एकमत है।
वरिष्ठ नेताओं ने संगठन निर्माण, बूथ स्तर की सक्रियता, स्थानीय संपर्क और समुदाय आधारित पहुंच पर जोर दिया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर पार्टी को परिणाम चाहिए, तो उसे चुनाव से पहले लंबे समय तक लोगों के बीच सक्रिय रहना होगा।
यानी यह बैठक सिर्फ राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे एक संगठनात्मक कार्ययोजना के रूप में भी देखा जा रहा है।
असम में झामुमो के सामने क्या चुनौतियां हैं?
असम में राजनीतिक जमीन बनाना किसी भी बाहरी या सीमित प्रभाव वाले दल के लिए आसान नहीं है। झामुमो के सामने भी कई चुनौतियां हैं—
पार्टी का असम में अभी सीमित जनाधार
मजबूत स्थानीय और राष्ट्रीय दलों की मौजूदगी
क्षेत्रीय पहचान की संवेदनशील राजनीति
संगठन को बूथ स्तर तक ले जाने की कठिनाई
स्थानीय नेतृत्व तैयार करने की जरूरत
इन चुनौतियों के बावजूद पार्टी को भरोसा है कि अगर वह लगातार मेहनत करे और सही समुदायों तक पहुंचे, तो भविष्य में उसका राजनीतिक दायरा बढ़ सकता है।
चुनाव 2026 से पहले क्या दिख सकता है?
आने वाले महीनों में झामुमो की ओर से असम में जनसंपर्क अभियान, संगठन विस्तार कार्यक्रम, स्थानीय बैठकों, और समुदाय आधारित संवाद को तेज किया जा सकता है। पार्टी संभवतः ऐसे इलाकों पर ज्यादा फोकस करेगी, जहां सामाजिक रूप से उपेक्षित वर्गों की संख्या ज्यादा है और जहां क्षेत्रीय असंतोष या प्रतिनिधित्व का सवाल मजबूत है।
अगर यह रणनीति जमीन पर सही ढंग से लागू होती है, तो 2026 का चुनाव झामुमो के लिए सिर्फ एक औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि राजनीतिक परीक्षण का बड़ा मंच बन सकता है।
निष्कर्ष
डिब्रूगढ़ में हुई यह बैठक साफ संकेत देती है कि झामुमो अब असम विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर गंभीर तैयारी में है। पार्टी का फोकस स्पष्ट है—आदिवासी समाज, चाय बागान श्रमिक, क्षेत्रीय पहचान, और संगठन विस्तार।
हेमंत सोरेन की मौजूदगी ने इस बैठक को और ज्यादा राजनीतिक महत्व दे दिया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह रणनीति जमीन पर कितनी तेजी से उतरती है और क्या झामुमो असम में खुद को सिर्फ एक बाहरी दल के रूप में नहीं, बल्कि एक नई सामाजिक-राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित कर पाता है।
फिलहाल इतना तय है कि डिब्रूगढ़ की यह बैठक असम चुनाव 2026 के लिए झामुमो के अभियान की औपचारिक शुरुआत मानी जा सकती है।
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