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कानपुर में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़, दो साल से चल रहा था खेल

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कानपुर के आहूजा हॉस्पिटल में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, विदेशी महिला का भी हुआ था ऑपरेशन।

कानपुर के आहूजा हॉस्पिटल में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, विदेशी महिला का भी हुआ था ऑपरेशन।

कानपुर में अवैध अंग प्रत्यारोपण के एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। शहर के केशवपुरम इलाके में स्थित आहूजा हॉस्पिटल पर आरोप है कि वहां पिछले करीब दो वर्षों से बिना अधिकृत अनुमति के किडनी ट्रांसप्लांट किए जा रहे थे। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त जांच में यह बात सामने आई है कि अस्पताल में न सिर्फ स्थानीय बल्कि दिल्ली, मेरठ, नोएडा और एनसीआर से भी मरीजों और डोनरों को लाकर ऑपरेशन किए जाते थे। मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था, निजी अस्पतालों की निगरानी और मेडिकल नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि इसी साल मार्च की शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका की एक महिला का भी यहां कथित रूप से किडनी प्रत्यारोपण किया गया था। जांच एजेंसियों के मुताबिक यह ऑपरेशन भी नियमों को दरकिनार कर किया गया। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट किए जाने की सूचनाएं काफी समय से मिल रही थीं। इसके बाद क्राइम ब्रांच, एलआईयू और खुफिया इकाइयों को सक्रिय किया गया और स्वास्थ्य विभाग को भी अलर्ट पर रखा गया।

जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, यह स्पष्ट होता गया कि मामला किसी एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा था। यह नेटवर्क मरीजों की पहचान से लेकर डोनर तलाशने, अस्पताल में भर्ती कराने, ऑपरेशन कराने और बाद में उन्हें दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करने तक की पूरी व्यवस्था संभालता था। जांच में सामने आया कि इस रैकेट में जुड़े लोग बड़ी सावधानी से काम करते थे और हर स्तर पर सबूत मिटाने की कोशिश की जाती थी।

अस्पताल के पास नहीं थी ट्रांसप्लांट की अनुमति

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. हरिदत्त नेमी ने स्पष्ट किया कि आहूजा हॉस्पिटल को किडनी ट्रांसप्लांट या यूरोलॉजी संबंधी जटिल सर्जरी की कोई अधिकृत अनुमति नहीं थी। अस्पताल में सामान्य नर्सिंग होम और आईसीयू जैसी सुविधाएं जरूर मौजूद थीं, लेकिन गुर्दा प्रत्यारोपण जैसी विशेष प्रक्रिया के लिए आवश्यक लाइसेंस, विशेषज्ञ टीम और संस्थागत स्वीकृति उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में यहां इस तरह के ऑपरेशन होना अपने आप में बेहद गंभीर मामला माना जा रहा है।

स्वास्थ्य विभाग की पड़ताल में यह भी सामने आया कि ऑपरेशन के लिए बाहर से डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को बुलाया जाता था। सर्जरी टीम अपने साथ जरूरी उपकरण भी लेकर आती थी। अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में मौजूद दो टेबलों का इस्तेमाल प्रत्यारोपण प्रक्रिया में किया जाता था। इससे यह संकेत मिलता है कि पूरी तैयारी पहले से होती थी और ऑपरेशन सुनियोजित ढंग से कराए जाते थे।

देर रात होता था ऑपरेशन, स्टाफ को दे दी जाती थी छुट्टी

जांच का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया अक्सर देर रात या तड़के सुबह तीन से चार बजे के बीच कराई जाती थी। यह वह समय चुना जाता था जब अस्पताल में सामान्य गतिविधि बेहद कम होती है और अधिकतर मरीज व उनके परिजन सो रहे होते हैं। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को मिले इनपुट के मुताबिक, जिस दिन ट्रांसप्लांट होना होता था, उस दिन अस्पताल के नियमित स्टाफ को छुट्टी दे दी जाती थी।

सर्जरी के दौरान केवल चुनिंदा लोग मौजूद रहते थे, जिनमें बाहर से आए डॉक्टर और पैरामेडिकल टीम शामिल होते थे। ऑपरेशन पूरा होने के बाद मरीज और डोनर को अलग-अलग स्थानों पर शिफ्ट कर दिया जाता था ताकि किसी को संदेह न हो। जांच में यह भी सामने आया है कि इस दौरान अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे भी बंद कर दिए जाते थे। यही वजह है कि पुलिस को अस्पताल के भीतर की सीधी वीडियो फुटेज नहीं मिल सकी।

हालांकि, आसपास लगे कैमरों और दूसरे स्थानों के फुटेज से कुछ अहम सुराग मिले हैं। जांच एजेंसियों को एंबुलेंस की आवाजाही और मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने से जुड़ी तस्वीरें और मूवमेंट मिले हैं, जिन्हें अब साक्ष्य के तौर पर जोड़ा जा रहा है।

ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों को दूसरे अस्पतालों में भेजा जाता था

जांच में यह भी सामने आया कि ऑपरेशन के बाद मरीजों और डोनरों को कानपुर के अलग-अलग नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों में शिफ्ट किया जाता था। कुछ मामलों में उन्हें दिल्ली और नोएडा तक ले जाया गया। सूत्रों के अनुसार, एक विदेशी महिला को ट्रांसप्लांट के बाद पहले शहर के एक नर्सिंग होम में रखा गया, फिर बाद में दूसरे शहरों के अस्पतालों में इलाज कराया गया।

इस पैटर्न से साफ है कि रैकेट केवल ऑपरेशन तक सीमित नहीं था, बल्कि पोस्ट-ऑपरेटिव केयर और मरीजों को छिपाने के लिए भी अलग-अलग ठिकानों का इस्तेमाल किया जाता था। स्वास्थ्य विभाग की टीम को कुछ ऐसे नर्सिंग होम के बारे में भी जानकारी मिली है, जहां बिना समुचित अनुमति और विशेषज्ञता के इलाज किया जा रहा था।

रिकॉर्ड में नहीं मिला ऑपरेशन का पूरा ब्योरा

मामले को और गंभीर बनाता है अस्पताल के रिकॉर्ड में गड़बड़ी। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि कथित ट्रांसप्लांट से जुड़े कई ऑपरेशन और सर्जरी का पूरा विवरण अस्पताल के दस्तावेजों में दर्ज नहीं था। यानी या तो रिकॉर्ड जानबूझकर छिपाया गया, या फिर ऐसे ऑपरेशन आधिकारिक तौर पर दिखाए ही नहीं गए।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, कुछ स्थानों पर मरीजों के इलाज के लिए केवल साधारण कागजों पर दवाओं, इंजेक्शन और ग्लूकोज जैसी चीजों का उल्लेख किया गया था। इस तरह की कच्ची और अनौपचारिक लिखावट यह दिखाती है कि इलाज को व्यवस्थित मेडिकल रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने से बचा गया।

सात ट्रांसप्लांट की जानकारी, दायरा और बढ़ सकता है

अब तक की जांच में कम से कम सात किडनी प्रत्यारोपण की जानकारी सामने आई है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि यह संख्या और भी अधिक हो सकती है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि पिछले दो वर्षों में कितने मरीज इस नेटवर्क के जरिए गुजरे और कितने डोनरों का इस्तेमाल किया गया।

जांच एजेंसियां अस्पताल के स्टाफ, उससे जुड़े बाहरी डॉक्टरों और सहयोगी नर्सिंग होम के कर्मचारियों से पूछताछ कर रही हैं। कई ऐसे नाम सामने आए हैं जो अधिकृत और अनधिकृत दोनों तरह के संस्थानों से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं। इससे यह आशंका मजबूत हुई है कि यह नेटवर्क कई स्तरों पर फैला हुआ था।

शहर के सर्जन और डॉक्टर भी जांच के घेरे में

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस और स्वास्थ्य विभाग अब उन डॉक्टरों और सर्जनों से भी पूछताछ की तैयारी में हैं, जिन्होंने कथित तौर पर ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों का इलाज किया। आरोप है कि अस्पताल के पास इस तरह के रोगियों के इलाज की भी अधिकृत अनुमति नहीं थी, इसके बावजूद कुछ डॉक्टर वहां मरीजों को देखते रहे।

सीएमओ कार्यालय का कहना है कि अस्पताल में आने वाले “ऑन कॉल” डॉक्टरों से भी पूछताछ होगी। यह भी जांचा जाएगा कि उन्हें मरीज की वास्तविक स्थिति की जानकारी थी या नहीं, और अगर थी, तो उन्होंने इसकी सूचना संबंधित विभागों को क्यों नहीं दी। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि मामले में केवल अस्पताल प्रबंधन ही नहीं, बल्कि मेडिकल नेटवर्क के दूसरे हिस्सों की भूमिका भी सामने आ सकती है।

सरकारी डॉक्टरों और दलालों की भूमिका पर भी नजर

जांच के दौरान कुछ नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों को लेकर यह भी जानकारी मिली है कि वहां सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस और दलालों की सक्रियता लंबे समय से चर्चा में थी। आरोप है कि मरीजों को बेहतर इलाज, जल्दी ऑपरेशन या विशेष सुविधा का लालच देकर निजी संस्थानों की ओर मोड़ा जाता था।

सूत्रों के मुताबिक, यह नेटवर्क खासकर ऐसे लोगों को टारगेट करता था जिन्हें पैसों की जरूरत हो या जो गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे हों। डायलिसिस कराने वाले मरीजों के बारे में जानकारी जुटाकर उनकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जाता था। इसके बाद उन्हें प्रत्यारोपण के विकल्प के नाम पर संपर्क किया जाता था।

डोनर और मरीज की तलाश का संगठित तरीका

पुलिस कमिश्नर के अनुसार, यह पूरा सिंडिकेट बेहद संगठित तरीके से काम करता था। जांच में यह भी सामने आया है कि मरीजों की जानकारी साझा करने और डोनर तलाशने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और बंद ग्रुप का इस्तेमाल किया जाता था। यानी यह कोई बिखरा हुआ स्थानीय खेल नहीं, बल्कि इंटरसिटी नेटवर्क था जो कई शहरों को जोड़कर चल रहा था।

जांच एजेंसियों का मानना है कि यह रैकेट मेडिकल जरूरत, आर्थिक मजबूरी और निजी अस्पतालों की कमजोर निगरानी—तीनों का फायदा उठाकर फल-फूल रहा था। अब इस पूरे मामले में शामिल डॉक्टरों, अस्पताल संचालकों, स्टाफ और बिचौलियों की भूमिका को अलग-अलग स्तर पर खंगाला जा रहा है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल

कानपुर का यह मामला सिर्फ एक अस्पताल या कुछ लोगों की करतूत भर नहीं है। यह निजी स्वास्थ्य संस्थानों की निगरानी, ट्रांसप्लांट जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता और मेडिकल एथिक्स पर गंभीर सवाल उठाता है। यदि किसी अस्पताल के पास अनुमति नहीं थी, विशेषज्ञ नहीं थे, रिकॉर्ड अधूरे थे और फिर भी ऑपरेशन होते रहे, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ भी है।

फिलहाल पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों ने अपनी जांच तेज कर दी है। आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई और मेडिकल नेटवर्क से जुड़े नए खुलासे होने की संभावना है। कानपुर का यह किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट अब सिर्फ स्थानीय अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य तंत्र की निगरानी और जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गया है।

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