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बिहार में आज से चलेगा अतिक्रमण हटाओ अभियान, हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन अलर्ट

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बिहार में 1 अप्रैल से अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू हो गया है। पटना हाईकोर्ट के निर्देश के बाद राजस्व विभाग ने सभी जिलों के अधिकारियों को सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

बिहार में सरकारी जमीन, सार्वजनिक रास्तों और संवेदनशील इलाकों पर बढ़ते कब्जे के खिलाफ अब राज्यव्यापी कार्रवाई शुरू हो गई है। 1 अप्रैल से पूरे बिहार में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाने का फैसला लिया गया है। इसको लेकर राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने सभी जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट और सख्त निर्देश जारी किए हैं।

सरकार की ओर से यह अभियान ऐसे समय में शुरू किया गया है, जब कई मामलों में पटना हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत के निर्देशों के बाद अब राज्य सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलों में प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय कर दिया है।

राजस्व विभाग के प्रधान सचिव की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा हटाने की कार्रवाई कानूनी प्रावधानों के तहत और समयबद्ध तरीके से की जाए, ताकि किसी भी स्तर पर लापरवाही या देरी की गुंजाइश न रहे।

सभी जिलों के अधिकारियों को जारी हुए निर्देश

मिली जानकारी के अनुसार, इस अभियान को प्रभावी बनाने के लिए राज्य के जिलाधिकारियों, अपर समाहर्ताओं, भूमि सुधार उप समाहर्ताओं, अनुमंडल पदाधिकारियों और अंचल अधिकारियों को लिखित निर्देश भेजे गए हैं।

इन निर्देशों में साफ कहा गया है कि जहां-जहां सरकारी जमीन, सड़क, नहर, सार्वजनिक उपयोग की भूमि या अन्य महत्वपूर्ण जगहों पर अवैध कब्जे की शिकायतें हैं, वहां तत्काल कार्रवाई की जाए।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि कार्रवाई केवल कागजी स्तर पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर परिणाम दिखाने वाली होनी चाहिए। यानी केवल नोटिस देकर औपचारिकता पूरी करना पर्याप्त नहीं माना जाएगा, बल्कि वास्तविक रूप से अतिक्रमण हटाना प्राथमिक उद्देश्य होगा।

कानून के तहत होगी कार्रवाई

राज्य सरकार ने इस अभियान के लिए बिहार लोक भूमि अतिक्रमण अधिनियम, 1956 के तहत कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

अधिकारियों से कहा गया है कि धारा 6(1) के प्रावधानों के अनुसार विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि कार्रवाई पूरी तरह कानूनी दायरे में रहे और बाद में किसी तरह का विवाद या तकनीकी अड़चन न आए।

सरकार का जोर इस बात पर है कि कार्रवाई कठोर जरूर हो, लेकिन वह कानूनसम्मत, पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित भी होनी चाहिए।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद बढ़ी सख्ती

इस पूरे अभियान के पीछे एक बड़ा कारण पटना हाईकोर्ट की सख्ती भी मानी जा रही है। कई मामलों में अदालत ने प्रशासन से पूछा था कि सरकारी जमीनों और सार्वजनिक स्थलों पर हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।

इसी के बाद राज्य सरकार ने मामले को प्राथमिकता में लेते हुए विभागीय स्तर पर सभी जिलों को अलर्ट कर दिया।

सरकार का मानना है कि यदि समय रहते अतिक्रमण नहीं हटाया गया, तो आगे चलकर यह सड़क, नहर, सरकारी संस्थानों, सीमावर्ती इलाकों और शहरी विकास योजनाओं के लिए बड़ी बाधा बन सकता है।

यह भी पढ़ें: बिहार में जमीन, सड़क और सरकारी परिसंपत्तियों पर बढ़ते कब्जे को लेकर क्यों बढ़ी प्रशासन की चिंता

सीमावर्ती जिलों पर रहेगा विशेष फोकस

अभियान के दौरान राज्य सरकार ने खास तौर पर भारत-नेपाल सीमा से जुड़े जिलों को अधिक संवेदनशील माना है।

सरकारी स्तर पर यह माना गया है कि सीमा से सटे कुछ इलाकों में नो मैन्स लैंड और अन्य महत्वपूर्ण भूमि पर अतिक्रमण के मामले बेहद गंभीर हैं। ऐसे मामलों का प्रभाव केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनका अंतरराष्ट्रीय और सुरक्षा संबंधी असर भी हो सकता है।

इसी वजह से सीमा से लगे सात जिलों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है।

बताया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में सर्वे ऑफ इंडिया के सहयोग से सीमांकन और संयुक्त सर्वेक्षण की प्रक्रिया भी चल रही है, ताकि वास्तविक सीमा और कब्जे की स्थिति स्पष्ट की जा सके।

सार्वजनिक भूमि पर कब्जा सरकार के लिए बड़ी चुनौती

बिहार के कई जिलों में वर्षों से सरकारी जमीन, पोखर, सड़क किनारे, नहर पटरी, स्कूल परिसर, अस्पताल परिसर और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण की शिकायतें सामने आती रही हैं।

कई बार यह कब्जा धीरे-धीरे स्थायी रूप ले लेता है, जिससे बाद में विकास कार्य, सड़क चौड़ीकरण, जल निकासी, सार्वजनिक उपयोग और प्रशासनिक योजनाएं प्रभावित होती हैं।

इसी वजह से सरकार अब इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि विकास और कानून-व्यवस्था से जुड़ा विषय मानकर आगे बढ़ रही है।

गरीबों और छोटे रोजगार वालों के लिए अलग सोच

हालांकि इस पूरे अभियान में सरकार ने एक मानवीय पहलू को भी साथ रखा है।

राज्य सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि कई गरीब, असहाय और रोज कमाकर खाने वाले लोग आजीविका के लिए सार्वजनिक स्थानों, फुटपाथों या खुले स्थलों का उपयोग करते हैं। ऐसे में बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के सीधे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई उनके रोजगार पर गंभीर असर डाल सकती है।

इसी कारण अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जहां छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले या अन्य कमजोर वर्ग प्रभावित हो सकते हैं, वहां पहले वेंडिंग जोन या पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

यानी सरकार की कोशिश यह है कि जहां एक ओर अवैध कब्जा हटे, वहीं दूसरी ओर गरीबों के रोजगार पर अनावश्यक चोट न पहुंचे।

यह भी पढ़ें: अतिक्रमण हटाओ अभियान में गरीबों और छोटे दुकानदारों के पुनर्वास का मुद्दा क्यों है अहम

प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा

यह अभियान प्रशासन के लिए भी एक बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।

कई जिलों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अक्सर स्थानीय दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, सामाजिक तनाव या विरोध के कारण अटक जाती है। लेकिन इस बार सरकार ने संकेत दिया है कि अभियान को राज्य स्तर की प्राथमिक कार्रवाई के रूप में देखा जाए।

ऐसे में जिलों के अधिकारियों पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे संवेदनशीलता, कानून और प्रशासनिक दृढ़ता—तीनों के बीच संतुलन बनाकर काम करें।

आने वाले दिनों में दिखेगा असर

1 अप्रैल से शुरू हुआ यह अभियान आने वाले दिनों में बिहार के अलग-अलग जिलों में जमीन पर दिखाई देगा। कई जगहों पर नोटिस, माइकिंग, सीमांकन, मापी और फिर बुलडोजर या अन्य संसाधनों के जरिए कार्रवाई की जा सकती है।

फिलहाल राज्य सरकार का स्पष्ट संदेश है कि सरकारी और सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जा अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि जहां कानून का पालन नहीं होगा, वहां प्रशासनिक स्तर पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

कुल मिलाकर बिहार में शुरू हुआ यह अतिक्रमण हटाओ अभियान केवल बुलडोजर कार्रवाई नहीं, बल्कि कानूनी सख्ती, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा से जुड़ा बड़ा कदम माना जा रहा है।

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