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कानपुर किडनी कांड की जांच तेज, फरार डॉक्टरों पर शिकंजा कसने में जुटी पुलिस

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कानपुर किडनी कांड में फरार चार डॉक्टरों के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है। पुलिस मेरठ, नोएडा, देहरादून और दिल्ली-एनसीआर में छापेमारी कर रही है। बैंक खातों और संदिग्ध लेनदेन की भी जांच शुरू हो गई है।

कानपुर में सामने आए चर्चित किडनी कांड की जांच अब और गंभीर होती जा रही है। मामले में नाम आने के बाद फरार चल रहे चार डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस ने लुकआउट नोटिस जारी कर दिया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि आरोपी देश छोड़कर भागने की कोशिश कर सकते हैं, इसलिए उनके खिलाफ यह सख्त कदम उठाया गया है। पुलिस अब उनकी तलाश में मेरठ, नोएडा, देहरादून और दिल्ली-एनसीआर तक छापेमारी कर रही है।

इस पूरे मामले में जांच की दिशा अब सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं रह गई है। पुलिस को ऐसे संकेत मिले हैं कि यह मामला अलग-अलग शहरों में फैले एक बड़े नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है। जांच के दौरान डॉ. अफजाल, डॉ. रोहित, डॉ. वैभव और डॉ. अनुराग उर्फ डॉ. अमित के नाम सामने आए हैं। पुलिस को संदेह है कि ये सभी कथित तौर पर गुर्दा प्रत्यारोपण की प्रक्रिया से किसी न किसी स्तर पर जुड़े रहे हैं।

अस्पतालों और नर्सिंग होम के नेटवर्क की जांच

पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस मामले में कई निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के बीच संपर्क की बात भी सामने आई है। यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या यह केवल एक अस्पताल तक सीमित मामला था या फिर अलग-अलग शहरों के कुछ मेडिकल संस्थानों के जरिए एक संगठित नेटवर्क की तरह काम किया जा रहा था।

कानपुर के केशवपुरम स्थित एक निजी अस्पताल में कथित किडनी ट्रांसप्लांट की जानकारी सामने आने के बाद जब पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची, तो कई अहम तथ्य सामने आए। अस्पताल से जुड़े दस्तावेज, मरीजों की फाइलें, स्टाफ की भूमिका और ऑपरेशन से जुड़े रिकॉर्ड अब जांच के दायरे में हैं।

पहले ही हो चुकी हैं कई गिरफ्तारियां

इस मामले में शुरुआती कार्रवाई के दौरान अस्पताल प्रबंधन और उससे जुड़े कुछ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस ने अस्पताल संचालक और अन्य संबंधित आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिसके बाद कई नई जानकारियां सामने आईं। पूछताछ के आधार पर ही अब फरार डॉक्टरों की तलाश और तेज कर दी गई है।

पुलिस का कहना है कि शुरुआती गिरफ्तारी के बाद जो सूचनाएं मिलीं, उन्होंने जांच को नए मोड़ पर पहुंचा दिया। अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि किन-किन लोगों ने कथित ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को अंजाम देने, छिपाने या सुविधा उपलब्ध कराने में भूमिका निभाई।

सीसीटीवी बंद रखने की बात ने बढ़ाई गंभीरता

मामले की जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों से पूछताछ में ऐसे संकेत मिले हैं कि कथित ट्रांसप्लांट के दौरान अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे बंद रखने की सलाह दी गई थी। अगर यह बात जांच में सही साबित होती है, तो यह केवल अवैध ट्रांसप्लांट का मामला नहीं रहेगा, बल्कि साक्ष्य छिपाने की सुनियोजित कोशिश भी मानी जा सकती है।

यही कारण है कि अब पुलिस अस्पताल के तकनीकी स्टाफ, ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों और प्रबंधन से जुड़े अन्य लोगों से भी बारीकी से पूछताछ कर रही है। यह जानने की कोशिश की जा रही है कि कैमरे कब बंद किए गए, किसके कहने पर ऐसा हुआ और उस समय अस्पताल में कौन-कौन मौजूद था।

संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश

फरार डॉक्टरों की तलाश में पुलिस की कई टीमें लगातार अलग-अलग शहरों में दबिश दे रही हैं। मेरठ, नोएडा और देहरादून में उनके संभावित ठिकानों की पहचान कर छापेमारी की गई है, लेकिन अब तक आरोपी हाथ नहीं आए हैं। पुलिस उनके रिश्तेदारों, परिचितों और पुराने संपर्कों से भी पूछताछ कर रही है।

जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि आरोपी डॉक्टर हाल के दिनों में किन लोगों के संपर्क में थे, किस अस्पताल या नर्सिंग होम में आ-जा रहे थे और क्या उन्होंने अपने मोबाइल फोन, बैंकिंग या यात्रा से जुड़ी जानकारी छिपाने की कोशिश की है।

विदेश भागने की आशंका, इसलिए जारी हुआ लुकआउट नोटिस

पुलिस को यह भी शक है कि मुख्य आरोपी डॉक्टर जांच के दबाव से बचने के लिए विदेश भागने की कोशिश कर सकते हैं। इसी आशंका के आधार पर उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर आरोपी देश से बाहर जाने की कोशिश करें, तो उन्हें एयरपोर्ट या अन्य इमिग्रेशन प्वाइंट पर रोका जा सके।

यह कदम आमतौर पर उन्हीं मामलों में उठाया जाता है, जहां आरोपी के फरार रहने और जांच को प्रभावित करने की आशंका गंभीर मानी जाती है। इससे साफ है कि पुलिस इस केस को बेहद संवेदनशील और संगठित अपराध के रूप में देख रही है।

अब पैसों के लेनदेन की भी गहराई से जांच

इस मामले में पुलिस अब वित्तीय जांच को भी आगे बढ़ा रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आरोपियों और उनसे जुड़े अस्पतालों या नर्सिंग होम के खातों में कितनी रकम जमा हुई, किन लेनदेन को संदिग्ध माना जा सकता है, किस अवधि में असामान्य नकद निकासी हुई और क्या किसी ट्रांसप्लांट के बदले अवैध भुगतान लिया गया था।

इसके लिए बैंकों से खातों की जानकारी मांगी गई है और संबंधित अधिकारियों को ईमेल के जरिए विवरण उपलब्ध कराने को कहा गया है। साथ ही, जरूरत पड़ने पर आयकर विभाग और अन्य एजेंसियों की मदद भी ली जा रही है। जांच का यह हिस्सा इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में पैसों का ट्रेल ही पूरे नेटवर्क की असली तस्वीर सामने लाता है।

दूसरे शहरों से जुड़ते तार, बढ़ सकती है जांच की परिधि

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस मामले के तार दूसरे शहरों से भी जुड़ते दिख रहे हैं। पुलिस अब यह भी देख रही है कि क्या इस तरह की गतिविधियां पहले भी अन्य जगहों पर हुई थीं और क्या कुछ अस्पतालों का नाम बार-बार सामने आ रहा है।

अगर यह कड़ी मजबूत हुई, तो मामला केवल कानपुर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अंतरराज्यीय मेडिकल रैकेट के रूप में सामने आ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस केस में और भी नाम जुड़ सकते हैं और जांच का दायरा और बड़ा हो सकता है।

पुलिस का दावा, आरोपी जल्द होंगे गिरफ्तार

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच कई स्तरों पर एक साथ चल रही है और फरार आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने की कोशिश की जा रही है। तकनीकी साक्ष्य, मेडिकल रिकॉर्ड, बैंकिंग डिटेल और पूछताछ के आधार पर पूरे नेटवर्क की परतें खोली जा रही हैं।

इस मामले ने निजी अस्पतालों और ट्रांसप्लांट प्रक्रिया की निगरानी व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह देखना अहम होगा कि जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क तक कितनी जल्दी पहुंचती हैं और क्या इस कांड के पीछे छिपा बड़ा सच सामने आ पाता है या नहीं।

निष्कर्ष

कानपुर किडनी कांड अब एक साधारण आपराधिक मामला नहीं, बल्कि एक गंभीर और संगठित मेडिकल अपराध के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। चार डॉक्टरों पर लुकआउट नोटिस जारी होना, कई शहरों में दबिश, सीसीटीवी और अस्पताल रिकॉर्ड की जांच, और वित्तीय लेनदेन की पड़ताल — ये सभी संकेत बताते हैं कि मामला बेहद गंभीर है। आने वाले दिनों में यह जांच और बड़े खुलासों की ओर बढ़ सकती है।

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