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बिहार में लोन देने से पीछे हटे तो बैंक होंगे ब्लैकलिस्ट, सरकार ने दिखाई सख्ती
- Reporter 12
- 02 Apr, 2026
बिहार सरकार लोन देने में आनाकानी करने वाले बैंकों पर सख्त कार्रवाई की तैयारी में है। ऐसे बैंकों को ब्लैकलिस्ट करने और सरकारी राशि रोकने तक की चेतावनी दी गई है।
आलम की खबर, पटना: बिहार में अब बैंकों की मनमानी पर लगाम लगाने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने साफ संकेत दिया है कि अगर कोई बैंक पात्र लोगों को लोन देने में टालमटोल करता है या अनावश्यक अड़चनें पैदा करता है, तो उसके खिलाफ कड़ा कदम उठाया जाएगा। सरकार ऐसे बैंकों को ब्लैकलिस्ट करने के साथ-साथ उनमें सरकारी योजनाओं की राशि भेजने पर भी रोक लगा सकती है।
सरकार का मानना है कि राज्य में विकास की रफ्तार तेज है, लेकिन उसके अनुपात में बैंकिंग सेक्टर से ऋण वितरण नहीं बढ़ रहा है। यही वजह है कि अब बैंकिंग व्यवस्था की गहन समीक्षा कर सख्त रुख अपनाने की तैयारी की जा रही है।
उच्च स्तरीय समिति करेगी बैंकों की पड़ताल
सूत्रों के अनुसार, अप्रैल के मध्य में एक उच्च स्तरीय समिति की अहम बैठक होने वाली है, जिसमें राज्य के विभिन्न विभागों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे। इस समिति का उद्देश्य यह देखना होगा कि बैंक सरकारी योजनाओं और आम जरूरतमंदों को ऋण उपलब्ध कराने में कितना सहयोग कर रहे हैं।
इस समीक्षा में खास तौर पर यह देखा जाएगा कि किन बैंकों ने ऋण स्वीकृति में सुस्ती दिखाई, किन योजनाओं में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया और किन मामलों में लाभार्थियों को निराश किया गया।
सरकार ने क्यों अपनाया सख्त रुख
बिहार सरकार का मानना है कि राज्य की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हुई है और विकास दर लंबे समय से बेहतर बनी हुई है, लेकिन इसके बावजूद बैंकों ने लोन वितरण का दायरा उसी रफ्तार से नहीं बढ़ाया। यही असंतुलन अब सरकार के लिए चिंता का विषय बन गया है।
वित्तीय जानकारों का कहना है कि जब तक बैंकों की ओर से कारोबार, कृषि, पशुपालन, उद्योग और छोटे उद्यमों के लिए बड़े पैमाने पर ऋण उपलब्ध नहीं कराया जाएगा, तब तक आर्थिक गतिविधियों को अपेक्षित गति नहीं मिल पाएगी।
सरकारी राशि रोकने तक की तैयारी
सरकार ने संकेत दिया है कि अगर किसी बैंक का रवैया लगातार नकारात्मक पाया गया, तो उस बैंक में सरकारी योजनाओं से जुड़ी धनराशि जमा कराने पर रोक लगाई जा सकती है। इतना ही नहीं, सरकार अपने विभागों और योजनाओं की राशि भी ऐसे बैंकों से हटाने पर विचार कर सकती है।
यह कदम बैंकों के लिए बड़ा संदेश माना जा रहा है, क्योंकि सरकारी फंडिंग और योजनाओं की राशि उनके लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
साख-जमा अनुपात बना चिंता का विषय
राज्य में बैंकिंग व्यवस्था को लेकर सबसे बड़ी चिंता साख-जमा अनुपात को लेकर है। इसका मतलब यह है कि बिहार में जितनी राशि बैंकों में जमा हो रही है, उसके मुकाबले ऋण वितरण अभी भी काफी कम है। सरकार चाहती है कि इस अनुपात में उल्लेखनीय सुधार हो, ताकि राज्य की पूंजी का उपयोग बिहार के विकास और रोजगार सृजन में हो सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बैंकों ने ऋण वितरण के लक्ष्य में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं की, तो उद्यमिता, स्वरोजगार और छोटे कारोबारों पर सीधा असर पड़ सकता है।
योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी होगी नजर
आगामी समीक्षा में सिर्फ सामान्य बैंकिंग नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं से जुड़े ऋण वितरण की भी विस्तार से समीक्षा होगी। इसमें कृषि, ग्रामीण विकास, पशुपालन, मत्स्य, स्वास्थ्य, उद्योग और आधारभूत संरचना से जुड़ी योजनाओं के तहत बैंकों की भूमिका पर भी फोकस रहेगा।
सरकार चाहती है कि बैंक सिर्फ जमा लेने तक सीमित न रहें, बल्कि विकास की धारा में सक्रिय भागीदार बनें।
बिहार में बैंकिंग व्यवस्था पर बढ़ेगा दबाव
सरकार के इस सख्त संदेश के बाद साफ है कि आने वाले दिनों में बिहार में बैंकिंग सेक्टर पर जवाबदेही का दबाव बढ़ने वाला है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बैंक अपने ऋण वितरण के रवैये में कितना बदलाव लाते हैं और सरकार की इस चेतावनी का क्या असर दिखता है।
यह भी पढ़ें: बिहार में सरकारी योजनाओं की निगरानी और बैंकिंग सुधार पर सरकार लगातार सख्त रुख अपना रही है।
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