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दिव्यांशु हत्याकांड पर देहरादून कूच करेंगे राकेश टिकैत, किसानों संग आशारोड़ी पहुंचने का ऐलान
- Reporter 12
- 03 Apr, 2026
भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत दिव्यांशु हत्याकांड के आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर किसानों के साथ देहरादून कूच करेंगे। पुलिस ने आशारोड़ी पर बैरिकेडिंग और सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए हैं।
देहरादून, आलम की खबर। दिव्यांशु हत्याकांड को लेकर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में शुक्रवार को बड़ा किसान प्रदर्शन देखने को मिल सकता है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ऐलान किया है कि वह बड़ी संख्या में किसानों के साथ दून कूच करेंगे और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग उठाएंगे। इस प्रस्तावित कूच को देखते हुए पुलिस-प्रशासन भी पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है।
राकेश टिकैत ने कहा है कि वह शुक्रवार सुबह करीब 11 बजे किसानों के साथ आशारोड़ी पहुंचेंगे। उनका कहना है कि दिव्यांशु हत्याकांड केवल एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि यह समाज और खासकर छात्रों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। इसी वजह से किसान संगठन इस मुद्दे को केवल स्थानीय घटना मानकर नहीं छोड़ना चाहते, बल्कि इसे न्याय और सुरक्षा के बड़े सवाल के रूप में उठा रहे हैं।
न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर उतरेंगे किसान
भारतीय किसान यूनियन इस पूरे मामले में आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग कर रही है। संगठन का कहना है कि यदि किसी छात्र की मौत या हत्या जैसे मामले में समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो इससे समाज में गलत संदेश जाएगा। राकेश टिकैत के दून कूच को इसी दबाव की राजनीति के रूप में भी देखा जा रहा है, जहां किसान संगठन प्रशासन और सरकार दोनों को यह संदेश देना चाहते हैं कि इस मामले में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
टिकैत ने अपने बयान में कहा कि देहरादून और आसपास के इलाकों में छात्रों के साथ हो रही आपराधिक घटनाओं को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। उनका कहना है कि इस तरह की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं हैं, बल्कि युवाओं के भीतर असुरक्षा और भय का माहौल भी पैदा कर रही हैं।
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल, युवाओं की सुरक्षा कितना बड़ा मुद्दा?
छात्रों की सुरक्षा पर टिकैत ने जताई चिंता
राकेश टिकैत ने इस मुद्दे को केवल एक आपराधिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक चिंता के रूप में पेश किया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह दिव्यांशु जाटराणा प्रकरण सामने आया, उसने छात्रों और उनके परिवारों के भीतर डर का माहौल पैदा किया है। अगर पढ़ने-लिखने वाले युवाओं को ही सुरक्षा का भरोसा नहीं मिलेगा, तो समाज के लिए यह बेहद गंभीर संकेत होगा।
उन्होंने कहा कि छात्र किसी भी राज्य और समाज का भविष्य होते हैं। यदि उनके साथ हिंसा, उत्पीड़न या संगठित हमले जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल पुलिस का मामला नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन जाता है।
टिकैत की इस टिप्पणी को किसान राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक मुद्दों पर हस्तक्षेप के तौर पर भी देखा जा रहा है। इससे साफ है कि किसान संगठन अब केवल कृषि और एमएसपी जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि जनसुरक्षा और न्याय के मामलों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं।
आशारोड़ी पर रोका जाएगा काफिला
दूसरी ओर, देहरादून पुलिस ने भी प्रस्तावित किसान कूच को लेकर पहले से तैयारी शुरू कर दी है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेंद्र डोबाल ने स्पष्ट किया है कि किसानों के जत्थे को आशारोड़ी पर ही रोका जाएगा और शहर के भीतर प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी।
पुलिस प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। आशारोड़ी पर बैरिकेडिंग की व्यवस्था की जा रही है, ताकि भीड़ को नियंत्रित रखा जा सके और किसी प्रकार की अव्यवस्था न फैले। वहीं प्रशासन की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि अधिकारी मौके पर पहुंचकर किसानों से ज्ञापन लेंगे।
प्रशासन नहीं चाहता शहर में तनाव
देहरादून शहर पहले से ही संवेदनशील माना जाता है, खासकर तब जब बड़ी संख्या में किसी संगठन का प्रदर्शन या मार्च प्रस्तावित हो। ऐसे में प्रशासन नहीं चाहता कि किसान कूच शहर के भीतर जाकर किसी तरह की ट्रैफिक समस्या, भीड़ या तनावपूर्ण स्थिति पैदा करे।
सूत्रों के मुताबिक, पुलिस ने आशारोड़ी और उसके आसपास के इलाकों में अतिरिक्त बल की तैनाती की तैयारी कर ली है। साथ ही, खुफिया और स्थानीय पुलिस इकाइयों को भी अलर्ट रखा गया है। प्रशासन का फोकस इस बात पर है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे और किसी भी प्रकार की झड़प या टकराव की नौबत न आए।
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में बड़े प्रदर्शनों पर पुलिस की रणनीति, कैसे बनता है सुरक्षा प्लान?
किसान आंदोलन का नया सामाजिक एंगल
राकेश टिकैत का यह कूच इस मायने में भी अहम माना जा रहा है कि यह पारंपरिक किसान मुद्दों से हटकर एक सामाजिक न्याय के सवाल पर आधारित है। आमतौर पर टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की पहचान कृषि, गन्ना भुगतान, एमएसपी और किसान अधिकारों से जुड़ी रही है। लेकिन दिव्यांशु हत्याकांड को लेकर उनकी सक्रियता यह संकेत दे रही है कि किसान राजनीति अब व्यापक सामाजिक सरोकारों की ओर भी बढ़ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के मामलों में किसान संगठनों की भागीदारी सरकार और प्रशासन पर नैतिक दबाव बढ़ाती है। क्योंकि जब कोई बड़ा सामाजिक संगठन किसी आपराधिक मामले में खुलकर उतरता है, तो वह उसे केवल पुलिस केस से आगे बढ़ाकर जनभावना का मुद्दा बना देता है।
सरकार और पुलिस पर बढ़ेगा दबाव
राकेश टिकैत के दून कूच से साफ है कि आने वाले समय में यह मामला और अधिक राजनीतिक तथा सामाजिक रूप ले सकता है। यदि बड़ी संख्या में किसान आशारोड़ी पहुंचते हैं और वहां प्रदर्शन होता है, तो सरकार और पुलिस दोनों पर इस केस में तेज और पारदर्शी कार्रवाई का दबाव बढ़ना तय है।
इस प्रदर्शन का सबसे बड़ा असर यह हो सकता है कि दिव्यांशु मामले में जांच की गति, आरोपियों पर कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही पर अब ज्यादा सार्वजनिक निगाह रहेगी। किसान संगठन की मौजूदगी इस केस को लंबे समय तक चर्चा में बनाए रख सकती है।
न्याय की मांग बनाम कानून-व्यवस्था की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ जहां पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग है, वहीं दूसरी ओर पुलिस और प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती भी है। यही कारण है कि प्रशासन संतुलित रणनीति पर काम कर रहा है—एक ओर किसानों को अपनी बात रखने का अवसर देना, दूसरी ओर शहर में स्थिति को नियंत्रण में रखना।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि शुक्रवार का दिन देहरादून के लिए अहम रहने वाला है। एक तरफ किसान संगठन न्याय की आवाज को मजबूत करने की तैयारी में हैं, तो दूसरी ओर पुलिस प्रशासन सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने में जुटा हुआ है।
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निष्कर्ष
दिव्यांशु हत्याकांड को लेकर राकेश टिकैत का देहरादून कूच केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि न्याय, छात्र सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर उभरती बड़ी जनचिंता का संकेत है। यह मामला अब सिर्फ एक एफआईआर या जांच तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक आक्रोश का रूप लेता दिख रहा है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि शुक्रवार को आशारोड़ी पर किसान कितनी संख्या में पहुंचते हैं, प्रशासन उनसे किस तरह संवाद करता है और इस पूरे दबाव का असर मामले की जांच और कार्रवाई पर कितना पड़ता है।
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