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आधी रात खुला सचिवालय, सियासत तेज
- Reporter 12
- 03 Apr, 2026
भोपाल में देर रात विधानसभा सचिवालय खुलने पर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस ने विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म करने की साजिश का आरोप लगाया है। जानिए पूरा मामला।
भोपाल | आलम की खबर,भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में विधानसभा सचिवालय के देर रात खुलने की खबर के बाद सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। कांग्रेस ने इसे सामान्य प्रशासनिक गतिविधि मानने से इनकार करते हुए गंभीर राजनीतिक साजिश बताया है। पार्टी का आरोप है कि यह पूरा घटनाक्रम विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म करने की संभावित प्रक्रिया से जुड़ा हो सकता है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस मामले को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि सत्ता के दबाव में संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है।
रात में सचिवालय खुलने पर कांग्रेस ने जताई आपत्ति
मामले की भनक लगते ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, पूर्व मंत्री पीसी शर्मा के साथ विधानसभा पहुंचे और वहां इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि विधानसभा सचिवालय जैसी संवैधानिक संस्था का देर रात सक्रिय होना कई संदेह पैदा करता है।
पटवारी ने कहा कि अगर किसी विधायक के खिलाफ कोई संवैधानिक या विधिक कार्रवाई की जा रही है, तो उसे पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। आधी रात में सचिवालय खोलकर काम करना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल खड़ा करता है।
कांग्रेस बोली- यह राजनीतिक दबाव की कार्रवाई
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि विधायक राजेंद्र भारती के खिलाफ जो भी कार्रवाई आगे बढ़ाई जा रही है, वह राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित हो सकती है। पार्टी ने इसे “सत्ता का दुरुपयोग” और “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर जनप्रतिनिधियों के खिलाफ इस तरह गुपचुप तरीके से कार्रवाई की जाएगी, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा होगा। पार्टी ने साफ संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर उठाएगी।
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क्या है विधायक राजेंद्र भारती से जुड़ा पूरा मामला?
राजेंद्र भारती से जुड़ा यह विवाद कोई नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें करीब तीन दशक पुरानी बताई जा रही हैं।
जानकारी के मुताबिक, मामला साल 1998 का है। उस समय श्याम सुंदर संस्थान की ओर से एक बैंक में 10 लाख रुपये की एफडी कराई गई थी। आरोप है कि बाद में इस एफडी से जुड़े दस्तावेजों में हेरफेर की गई।
आरोप क्या हैं?
बताया जाता है कि राजेंद्र भारती ने बैंक के एक कर्मचारी रघुवीर प्रजापति के साथ मिलकर एफडी की अवधि में बदलाव कराया। जहां यह जमा राशि सीमित अवधि के लिए थी, वहीं कथित तौर पर रिकॉर्ड में फेरबदल कर इसकी अवधि को कई वर्षों तक बढ़ा दिया गया।
आरोप यह भी है कि इसी बदलाव के आधार पर लंबे समय तक एफडी पर मिलने वाले ब्याज की रकम निकाली जाती रही।
कैसे हुआ पूरे मामले का खुलासा?
बताया जाता है कि जब बैंक प्रबंधन में बदलाव हुआ, तब इस लेनदेन की जांच शुरू हुई। इसी दौरान दस्तावेजों और भुगतान रिकॉर्ड में गड़बड़ी सामने आई। बाद में इस मामले पर ऑडिट आपत्ति भी दर्ज की गई, जिसके बाद विवाद और गंभीर हो गया।
मामला धीरे-धीरे प्रशासनिक और कानूनी जांच से आगे बढ़ते हुए न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद, फिर दर्ज हुआ आपराधिक केस
यह विवाद समय के साथ कई मंचों से होकर गुजरा। पहले यह मामला अन्य कानूनी प्रक्रियाओं से आगे बढ़ा और अंततः उच्च न्यायिक स्तर तक भी पहुंचा, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने के बाद मामला और मजबूत हुआ।
इसके बाद साल 2015 में इस पूरे प्रकरण में आपराधिक मामला दर्ज किया गया। लंबे समय तक चली सुनवाई और जांच के बाद अदालत ने मामले में शामिल आरोपियों को दोषी माना।
अदालत का फैसला बना सियासी भूचाल की वजह
अब जब अदालत की ओर से दोषसिद्धि और सजा का रास्ता साफ हुआ है, तो इसका असर राजनीतिक स्तर पर भी दिखाई देने लगा है। माना जा रहा है कि इसी पृष्ठभूमि में विधायक की सदस्यता पर भी कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
यही वजह है कि भोपाल में देर रात विधानसभा सचिवालय खुलने की घटना ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
भाजपा की ओर से अब तक चुप्पी
इस पूरे विवाद पर भाजपा की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यही चुप्पी अब राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रही है। विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है कि अगर सब कुछ नियमों के तहत हो रहा है, तो फिर इसे पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा।
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फिलहाल नजरें विधानसभा और सियासी बयानबाजी पर
भोपाल में विधानसभा सचिवालय से जुड़ा यह घटनाक्रम अब सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा मध्य प्रदेश की राजनीति में और ज्यादा गर्मा सकता है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि विधानसभा सचिवालय की ओर से क्या आधिकारिक स्थिति सामने आती है और भाजपा इस पूरे आरोप-प्रत्यारोप पर क्या जवाब देती है।
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