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दिल्ली में LPG पर सियासत, जमीन पर संकट

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दिल्ली में एलपीजी सप्लाई को लेकर सरकार सामान्य स्थिति का दावा कर रही है, लेकिन सीमापुरी, सीलमपुर, करावल नगर, भजनपुरा और झुग्गी बस्तियों में छोटे ढाबे, रेहड़ी-पटरी वाले और दिहाड़ी मजदूर गैस की कमी, महंगाई और ब्लैक मार्केटिंग से जूझते नजर आ रहे हैं।

दिल्ली आलम की खबर:नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में एलपीजी की उपलब्धता को लेकर एक अजीब-सी दोहरी तस्वीर सामने आ रही है। एक ओर दिल्ली सरकार यह दावा कर रही है कि शहर में घरेलू गैस की आपूर्ति पूरी तरह सामान्य है, औसत डिलीवरी समय घटा है और जितनी बुकिंग हो रही है, उससे अधिक सिलेंडरों की डिलीवरी दी जा रही है। दूसरी ओर, दिल्ली की गलियों, झुग्गी बस्तियों, छोटे ढाबों, रेहड़ी-पटरी वालों और दिहाड़ी मजदूरों की बस्तियों में हालात कुछ और कहानी कह रहे हैं। वहां कई जगहों पर गैस सिलेंडर की जगह फिर लकड़ी, कोयला और धुएं से भरे चूल्हे लौट आए हैं। सबसे ज्यादा मार उन लोगों पर पड़ी है जिनकी रोजी-रोटी ही छोटे सिलेंडर, सीमित पूंजी और रोज कमाने-रोज खाने की व्यवस्था पर टिकी हुई है।

राजधानी के कई इलाकों में यह संकट सिर्फ एक सप्लाई समस्या भर नहीं रह गया है, बल्कि यह रोजमर्रा की जिंदगी, कमाई, सेहत और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा सवाल बनता जा रहा है। दिल्ली के छोटे कारोबारियों का कहना है कि अगर गैस एजेंसियों पर सिलेंडर समय से मिल जाएं तो उनकी पूरी व्यवस्था पटरी पर लौट सकती है, लेकिन देरी, अनिश्चितता और बढ़ती लागत ने उनका संतुलन बिगाड़ दिया है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि अफवाहों से बचना चाहिए, क्योंकि उपलब्ध आंकड़े किसी बड़े संकट की ओर इशारा नहीं करते। सवाल यही है कि अगर कागज पर स्थिति सामान्य है, तो जमीनी स्तर पर यह बेचैनी क्यों दिखाई दे रही है?

आउटर रिंग रोड के सीमापुरी इलाके में सड़क किनारे ढाबा चलाने वाले छोटे कारोबारियों के लिए यह समस्या सीधे चूल्हे से जुड़ी है। जहां पहले नीली गैस की लौ पर दाल, सब्जी, चाय और रोटी आसानी से पक जाती थी, अब वहां लकड़ी के गट्ठर, कोयले की बोरी और धुएं से भरे बर्तन दिखाई दे रहे हैं। ढाबा संचालकों का कहना है कि गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिलने से उनकी पूरी रसोई व्यवस्था बिगड़ गई है। पहले एक सिलेंडर कई दिनों तक काम देता था, जिससे लागत नियंत्रित रहती थी और खाना जल्दी तैयार हो जाता था। अब लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल करना मजबूरी बन गया है, जो न सिर्फ महंगा पड़ रहा है, बल्कि समय और श्रम भी ज्यादा मांग रहा है।

सीमापुरी के एक ढाबा संचालक ने बताया कि गैस एजेंसी पर कई बार चक्कर लगाने के बाद भी सिलेंडर उपलब्ध नहीं होने की बात कही जाती है। उनका कहना है कि छोटे कारोबारी के लिए हर दिन का काम जरूरी होता है। अगर चूल्हा समय पर नहीं जलेगा, तो ग्राहक नहीं रुकेंगे। लकड़ी खरीदने का अलग खर्च है, उसे जलाने और संभालने का अलग झंझट है, और धुएं के कारण काम करने वाले लोगों की आंखों और सांस पर भी असर पड़ रहा है। पहले जहां गैस पर एक व्यवस्थित, तेज और साफ रसोई चलती थी, अब वहां पुराना, थकाऊ और अस्वस्थ तरीका वापस लौटता दिखाई दे रहा है।

भजनपुरा, करावल नगर, सीलमपुर और पूर्वी दिल्ली के अन्य इलाकों में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही बताई जा रही है। रेहड़ी-पटरी पर खाना बेचने वाले और छोटे ठेले लगाने वाले कारोबारियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके पास न तो ज्यादा स्टॉक रखने की क्षमता है और न ही वे महंगे विकल्पों को लंबे समय तक झेल सकते हैं। कुछ स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि बाजार में सिलेंडर ब्लैक में ऊंचे दामों पर उपलब्ध होने की चर्चा है, लेकिन उस कीमत पर सिलेंडर लेना छोटे दुकानदारों के लिए लगभग असंभव है। उनका कहना है कि अगर वे महंगे दाम पर सिलेंडर खरीदेंगे तो उन्हें खाने की कीमत बढ़ानी पड़ेगी, और अगर खाने की कीमत बढ़ेगी तो ग्राहक कम हो जाएंगे। यानी नुकसान दोनों तरफ से है।

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छोटे ढाबों की मुश्किल सिर्फ गैस की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। खाना पकाने की गति पर भी इसका सीधा असर पड़ा है। लकड़ी और कोयले के चूल्हे पर वही काम करने में अधिक समय लगता है जो गैस पर कुछ ही मिनटों में हो जाता था। ढाबा संचालकों का कहना है कि आज के तेज रफ्तार शहर में ग्राहक इंतजार कम करते हैं। अगर पराठा, चाय, दाल या सब्जी बनने में देरी होगी तो लोग दूसरे ठेले या दुकान पर चले जाते हैं। नतीजा यह है कि सिर्फ लागत ही नहीं बढ़ी, बल्कि ग्राहक भी कम हुए हैं। कुछ कारोबारियों का कहना है कि उनकी आधी कमाई भी अब मुश्किल से निकल रही है।

करावल नगर में चाय और नाश्ता बेचने वाले छोटे व्यापारियों का कहना है कि गैस की अनिश्चितता ने उन्हें कई साल पीछे धकेल दिया है। उनका तर्क है कि एलपीजी ने छोटे कारोबार को इसलिए गति दी थी क्योंकि इससे साफ, तेज और सस्ता संचालन संभव हुआ। अब जब फिर लकड़ी और कोयले का सहारा लेना पड़ रहा है, तो काम का बोझ बढ़ गया है। गर्मी में धुएं और आग के सामने खड़े होकर काम करना पहले से ही कठिन होता है, ऊपर से ग्राहकों का दबाव और लागत का संकट अलग है। कई छोटे दुकानदारों का डर है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो उन्हें अपना काम कुछ दिनों के लिए बंद तक करना पड़ सकता है।

दिल्ली के स्थानीय लोगों का भी कहना है कि एलपीजी की आपूर्ति में थोड़ी-सी भी गड़बड़ी का सबसे ज्यादा असर गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। बड़े होटल, बड़े रेस्तरां और स्थापित व्यवसाय किसी न किसी तरह वैकल्पिक व्यवस्था कर लेते हैं, लेकिन छोटे ढाबे, ठेले, फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले और किराए के एक कमरे में रहने वाले परिवारों के पास इतने संसाधन नहीं होते। उनके लिए एक सिलेंडर का समय पर मिलना सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि जीवन और कमाई का आधार होता है। यही वजह है कि छोटे कारोबारियों और मजदूर परिवारों में बेचैनी ज्यादा दिखाई दे रही है।

गैस की समस्या का दूसरा बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ा है जो छोटे सिलेंडरों या सीमित खपत वाली रसोई पर निर्भर रहते हैं। राजधानी में छोटे सिलेंडरों की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ी है। कई इलाकों में लोगों का कहना है कि बड़े सिलेंडरों के साथ-साथ छोटे सिलेंडर भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। जिन परिवारों की आय सीमित है, जो झुग्गियों, अस्थायी बस्तियों या किराए के छोटे कमरों में रहते हैं, उनके लिए छोटे सिलेंडर ही सबसे व्यावहारिक विकल्प होते हैं। लेकिन जब वही उपलब्ध नहीं होते, तो उनका पूरा घरेलू बजट बिगड़ जाता है।

आरके पुरम, मुनिरका, सादिक नगर और अन्य झुग्गी बस्तियों में रहने वाले परिवारों की स्थिति इस मामले में और ज्यादा संवेदनशील है। इन इलाकों में रहने वाले अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी, रिक्शा चलाने, घरेलू काम, निर्माण कार्य, सफाई, छोटे ठेले और असंगठित श्रम पर निर्भर हैं। इनकी आय नियमित नहीं होती, इसलिए ये आम तौर पर वही विकल्प चुनते हैं जिसमें कम पूंजी लगे और जरूरत के हिसाब से खर्च हो। छोटे सिलेंडर इसी कारण इनके लिए एक उपयोगी साधन रहे हैं। लेकिन जब छोटे सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित होती है, तो इनके पास कोई मजबूत विकल्प नहीं बचता।

इन परिवारों की रसोई पर असर सबसे पहले भोजन की नियमितता में दिखाई देता है। कुछ परिवारों का कहना है कि जहां पहले दिन में दो बार आसानी से खाना बन जाता था, अब वे गैस बचाने या विकल्पों की मजबूरी में दिन में सिर्फ एक बार खाना बना पा रहे हैं। कुछ लोग बाहर से सस्ता खाना खरीदने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब ढाबे और ठेले वाले खुद संकट में हों, तो वहां भी विकल्प सीमित हो जाते हैं। ऐसे में यह संकट सिर्फ एक घरेलू परेशानी नहीं रह जाता, बल्कि पोषण, बच्चों के भोजन, बुजुर्गों की जरूरत और रोजमर्रा की गरिमा से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।

मुनिरका और आसपास की बस्तियों में रहने वाले कई परिवारों का कहना है कि गैस की अनिश्चितता ने उनकी मासिक योजना बिगाड़ दी है। जिन पैसों में पहले कई दिनों तक रसोई चल जाती थी, अब उतने में कम दिन काम चल रहा है। मजदूर वर्ग के लिए यह बहुत बड़ा फर्क है, क्योंकि उनकी आमदनी पहले से ही सीमित और अनिश्चित होती है। ऊपर से यदि गैस न मिले या महंगे विकल्प अपनाने पड़ें, तो परिवारों को राशन, दूध, दवा और बच्चों की जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है।

कुछ मजदूरों का कहना है कि गैस की कमी के कारण उन्हें बाहर ढाबों या छोटे होटलों पर खाना खाना पड़ रहा है, जो घर में खाना बनाने की तुलना में महंगा पड़ता है। जो लोग रोज सुबह जल्दी काम पर निकलते हैं और रात में देर से लौटते हैं, उनके लिए रसोई की अस्थिरता और बड़ी परेशानी बन जाती है। यह वर्ग पहले ही महंगाई, किराया, यातायात खर्च और अनियमित आय से जूझ रहा है; ऐसे में रसोई की बुनियादी सुविधा में व्यवधान उन्हें और कमजोर कर देता है।

गैस की कमी या आपूर्ति में गड़बड़ी के साथ एक और समस्या सामने आती है—ब्लैक मार्केटिंग और जमाखोरी का डर। जब बाजार में यह संदेश जाता है कि किसी जरूरी वस्तु की सप्लाई प्रभावित है, तो कुछ लोग इसका फायदा उठाने लगते हैं। दिल्ली में भी इसी आशंका को लेकर प्रशासन और सरकार की ओर से निगरानी बढ़ाने की बात कही गई है। यह चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि एलपीजी जैसी जरूरी वस्तु में कालाबाजारी का सीधा असर गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में जीवन चला रहे होते हैं।

इसी बीच दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चल रही चिंताओं पर स्पष्ट बयान देते हुए कहा है कि राजधानी में गैस सप्लाई पूरी तरह सामान्य है और लोगों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है। सरकार के अनुसार, तीन अप्रैल को दिल्ली में कुल 1,11,504 एलपीजी बुकिंग दर्ज की गईं, जबकि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने मिलकर 1,26,379 सिलेंडरों की डिलीवरी की। यानी आंकड़ों के हिसाब से बुकिंग से ज्यादा सप्लाई दी गई। सरकार का कहना है कि इससे यह साफ होता है कि शहर में व्यापक स्तर पर कोई आपूर्ति संकट नहीं है।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि दिल्ली में घरेलू गैस सिलेंडर की औसत डिलीवरी समय घटकर 4.37 दिन रह गया है, जो आपूर्ति व्यवस्था के बेहतर होने का संकेत है। उनके मुताबिक, प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए है और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि लोगों को समय पर सिलेंडर मिले। सरकार ने यह भी कहा है कि अफवाहों और गलत सूचनाओं के कारण कृत्रिम घबराहट पैदा हो सकती है, इसलिए नागरिकों को आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करना चाहिए।

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सरकार की ओर से यह भी बताया गया है कि एलपीजी की कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए गए हैं। इसके लिए एक कंट्रोल रूम सक्रिय किया गया है, जहां लोग शिकायत दर्ज करा सकते हैं। शिकायतों और खुफिया सूचनाओं के आधार पर पुलिस और संबंधित एजेंसियों ने अलग-अलग इलाकों में कार्रवाई की है। सरकार के अनुसार, विभिन्न स्थानों पर 22 छापेमारी की गईं। इसी क्रम में रोहिणी के नॉर्थ रोहिणी थाना क्षेत्र में एक मामला दर्ज किया गया, जहां 6 एलपीजी सिलेंडर अवैध रूप से जमा पाए गए। प्रशासन का कहना है कि ऐसे मामलों पर आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

यही वह बिंदु है जहां दिल्ली की यह पूरी कहानी दो हिस्सों में बंट जाती है—एक सरकारी आंकड़ों की तस्वीर और दूसरी जमीनी अनुभवों की सच्चाई। संभव है कि शहर स्तर पर कुल सप्लाई पर्याप्त हो, लेकिन वितरण, डिलीवरी समय, छोटे सिलेंडरों की उपलब्धता, एजेंसी स्तर की देरी, स्थानीय मांग और उपभोक्ता वर्ग के आधार पर कुछ जेबों में संकट अधिक गहरा महसूस हो रहा हो। यही वजह है कि जहां एक ओर सरकार “स्थिति सामान्य” कह रही है, वहीं दूसरी ओर कई छोटे कारोबारी और गरीब परिवार “सामान्य” स्थिति का अनुभव नहीं कर पा रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संकट या आशंका के समय सिर्फ कुल सप्लाई आंकड़े काफी नहीं होते। यह देखना भी जरूरी होता है कि क्या छोटे उपभोक्ताओं, कमजोर तबकों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों तक समय पर और समान रूप से आपूर्ति पहुंच रही है या नहीं। क्योंकि अक्सर सबसे ज्यादा परेशानी उसी वर्ग को होती है जिसकी आवाज सबसे कम सुनाई देती है। दिल्ली के मामले में भी यही दिख रहा है कि बड़े पैमाने पर कोई औपचारिक संकट भले न हो, लेकिन माइक्रो लेवल पर असमान उपलब्धता, लागत और डिलीवरी की समस्या से कई इलाकों में लोग परेशान हैं।

फिलहाल राजधानी में सबसे बड़ी जरूरत यही है कि सरकार के दावों और जनता के अनुभवों के बीच जो दूरी दिख रही है, उसे तेजी से कम किया जाए। गैस एजेंसियों की निगरानी, छोटे सिलेंडरों की उपलब्धता, झुग्गी बस्तियों और छोटे कारोबारियों के लिए विशेष व्यवस्था, और कालाबाजारी पर कठोर कार्रवाई—ये सभी कदम तत्काल असर दिखा सकते हैं। साथ ही, प्रशासन को उन इलाकों की पहचान करनी होगी जहां शिकायतें ज्यादा आ रही हैं, ताकि वहां आपूर्ति को प्राथमिकता के आधार पर सुधारा जा सके।

दिल्ली जैसे महानगर में एलपीजी सिर्फ रसोई ईंधन नहीं, बल्कि लाखों परिवारों और हजारों छोटे कारोबारियों की जीवनरेखा है। जब गैस की लौ कमजोर पड़ती है, तो उसका असर सिर्फ चूल्हे तक सीमित नहीं रहता—वह रोजी-रोटी, सेहत, बच्चों के भोजन, छोटे व्यापार, मजदूरी और शहर की निचली अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। सरकार के आंकड़े राहत का संदेश दे सकते हैं, लेकिन जमीनी शिकायतें यह बताती हैं कि अभी भरोसे और व्यवस्था के बीच की दूरी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दिल्ली में एलपीजी को लेकर उठी यह बेचैनी महज अफवाह साबित होती है या फिर यह शहर के कमजोर तबकों की एक वास्तविक और गंभीर चेतावनी है, जिसे गंभीरता से सुनने की जरूरत है।

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